नहीं। प्रकृति में कुछ भी व्यर्थ नहीं होता और प्रत्येक प्राकृतिक वस्तु का पुन: उपयोग हो जाता है।
जिसे हम अपशिष्ट कहते हैं — गिरी पत्तियाँ, मृत जंतु, मल — वह किसी और का भोजन है। मशरूम जैसे कवक और जीवाणु मृत पादपों तथा जंतुओं के जटिल पदार्थों को अपेक्षाकृत सरल पदार्थों में विघटित कर देते हैं, और हाथी जैसे जंतुओं के मल पर भृंग तथा मक्खियाँ यही कार्य करते हैं। इस प्रक्रिया को अपघटन कहते हैं और इसे संपन्न करने वाले जीवों को अपघटक या मृतजीवी कहते हैं (मृत + जीवी)।
अपघटक इस चक्र को पूरा करते हैं, इसीलिए प्रकृति में अंतत: कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।
ऐसा क्यों होता है: पारितंत्र जिन पोषक तत्वों का उपयोग करता है वे बार-बार वही परमाणु हैं। पादप मृदा में उगते हैं और मृदा में कई पोषक तत्व अपघटन प्रक्रिया से आते हैं। यदि यह चक्र कभी टूट जाए तो पोषक तत्व मृत शरीरों में ही बंद रह जाएँगे और उत्पादक भूखे रह जाएँगे। ऊर्जा इससे भिन्न है — वह सूर्य से एक बार आती है और ऊष्मा बनकर निकल जाती है, इसलिए उसकी पूर्ति प्रतिदिन होनी चाहिए, जबकि पदार्थ केवल घूमता रहता है।
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