प्र1.
जब हम प्रकृति में हस्तक्षेप करते हैं तो क्या होता है?
उत्तर
एक परिवर्तन दूसरे परिवर्तनों की श्रृंखला छेड़ देता है, और अंतिम कड़ी प्राय: हम पर ही लौटती है। क्रियाकलाप 12.9 इसका वास्तविक भारतीय उदाहरण देता है।
1980 के दशक: मेंढक की टाँगों (भारतीय बुलफ्रॉग, हॉप्लोबैट्राकस टाइगरिनस) का व्यापक निर्यात
→ मेंढकों की जीव संख्या में कमी
→ मेंढक कीट खाते हैं, अत: कृषि पीड़क जीवों की संख्या में वृद्धि
→ किसान अधिक संश्लेषित पीड़कनाशकों का उपयोग करने के लिए बाध्य हुए
→ पर्यावरण, मृदा और जल की गुणवत्ता को हानि
→ समग्र पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव
→ मेंढकों की जीव संख्या में कमी
→ मेंढक कीट खाते हैं, अत: कृषि पीड़क जीवों की संख्या में वृद्धि
→ किसान अधिक संश्लेषित पीड़कनाशकों का उपयोग करने के लिए बाध्य हुए
→ पर्यावरण, मृदा और जल की गुणवत्ता को हानि
→ समग्र पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव
भारत सरकार ने और अधिक पारिस्थितिकीय हानि रोकने के लिए मेंढक की टाँगों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया।
चित्र 12.13 तालाब में इसी आकार की श्रृंखला दिखाता है — प्रदूषण के कारण पादप मरते हैं → जल में ऑक्सीजन का उत्पादन कम होता है → मछलियों की संख्या घटती है → उपभोक्ता कम होने से कीटों की संख्या बढ़ती है → ये कीट आस-पास के खेतों में फैलते हैं → किसान कीटनाशक उपयोग करने के लिए बाध्य होते हैं, जिससे पर्यावरण पर पुन: प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
ऐसा क्यों होता है: पारितंत्र तब संतुलित रहता है जब जीवों और उनके पर्यावरण के बीच परस्पर क्रियाएँ समष्टियों और संसाधनों को स्थिर रखती हैं। यह संतुलन स्थिर नहीं अपितु गतिशील है। एक समष्टि हटाने से अनेक परस्पर क्रियाएँ एक साथ हट जाती हैं, इसलिए उसके ऊपर और नीचे की संख्याएँ बदलती हैं — और हर परिवर्तन अगला परिवर्तन आरंभ कर देता है। मेंढक कृषि से बिलकुल असंबंधित कारण से पकड़े जा रहे थे, फिर भी मूल्य किसानों को चुकाना पड़ा।