कुतूहल अध्याय 13 खोजें, अभिकल्पित करें और चर्चा करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एक ‘पृथ्वी जीवन रक्षक किट’ तैयार कीजिए। कल्पना कीजिए कि आप किसी दूसरे ग्रह के लिए पृथ्वी जैसा एक छोटा-सा निदर्श (मॉडल) बना रहे हैं। जीवन सहायक के रूप में वहाँ कौन सी व्यवस्थाएँ होनी चाहिए और क्यों?
उत्तर

कैसे आरंभ करें। वस्तुओं की सूची से आरंभ मत कीजिए। खंड 13.4 के चार तंत्रों से आरंभ कीजिए — वायुमंडल, जलमंडल, भूमंडल, जैवमंडल — और पूछिए कि किट को इनमें से प्रत्येक के स्थान पर क्या देना होगा। फिर वे दो सुरक्षाएँ जोड़िए जो पृथ्वी नि:शुल्क देती है — ऊष्मा एवं कवच। अच्छी किट यह भी बताती है कि प्रत्येक वस्तु की पूर्ति कैसे होगी, क्योंकि जो आपूर्ति समाप्त हो जाए वह जीवन-रक्षा नहीं है।

नमूना उत्तर — पृथ्वी जीवन रक्षक किट:

किट में क्याकिस तंत्र का स्थान लेता हैक्यों आवश्यक है
श्वास योग्य गैस मिश्रण से भरा बंद, दाबयुक्त गुंबदवायुमंडलश्वसन के लिए ऑक्सीजन, प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड, तथा जल को द्रव रखने के लिए दाब
जल की टंकी तथा पुनर्चक्रण एवं शोधन इकाईजलमंडलपीने, भोजन उगाने एवं पोषक तत्वों के संचरण के लिए; प्रत्येक बूँद पुन: उपयोग होनी चाहिए
मृदा अथवा नाइट्रोजन व पोटैशियम युक्त पोषक शय्याभूमंडलपौधों को पोषक तत्व एवं जड़ों को थामने का आधार चाहिए
बीज एवं पौधे, तथा अपघटक सूक्ष्मजीवजैवमंडलपौधे भोजन बनाते एवं ऑक्सीजन देते हैं; अपघटक पोषक तत्व मृदा में लौटाकर चक्र पूरा करते हैं
प्रकाश एवं ऊष्मा का स्रोत (सौर पैनल, हीटर)सूर्य एवं हरितगृह प्रभावप्रकाश संश्लेषण को प्रकाश चाहिए; ऊष्मा के बिना जल जम जाएगा
मोटा कवच — गुंबद के ऊपर कई मीटर मृदा या चट्टानओजोन परत एवं चुंबकीय क्षेत्रपराबैंगनी किरणों एवं उच्च ऊर्जा कणों को रोकने के लिए
ऐसा क्यों होता है: अभिकल्पना का सबसे कठिन भाग कोई एक वस्तु नहीं, अपितु चक्रों को पूरा करना है। पृथ्वी पर कुछ भी सदा के लिए समाप्त नहीं होता — ऑक्सीजन, जल एवं पोषक तत्व सभी चक्र में घूमते हैं। जो किट केवल सामग्री ढोती है उसकी आयु निश्चित है; जिस किट में पौधे, जंतु एवं सूक्ष्मजीव एक दूसरे को पोषित करते हैं वह चलती रह सकती है। इसीलिए अध्याय बार-बार कहता है कि जीवन संसाधनों से नहीं, पारस्परिक संबंधों से सतत रहता है।
प्र2.
भारत एक चुनौतीपूर्ण चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-4’ की योजना बना रहा है जो चंद्रमा से मृदा के प्रतिदर्श (सैंपल) लेकर आएगा। यदि चंद्रमा पर जल होता तो क्या उसकी मृदा में पौधे उग सकते हैं? किसी ऐसे प्रयोग के विषय पर विचार कीजिए जो आपको यह ज्ञात करने में सहायता कर सके कि क्या चंद्रमा पर पौधे उगाना संभव है?
उत्तर

केवल जल पर्याप्त नहीं होता — परंतु चंद्रमा की मृदा के साथ जल, पृथ्वी जैसी वायु, ऊष्मा एवं प्रकाश मिल जाएँ तो संभव है, और प्रयोग को यही जाँचना चाहिए।

चंद्रमा की मृदा में क्या है और क्या नहीं। वह पिसी हुई चट्टान एवं धूल है, अत: उसमें खनिज हैं। जो नहीं है वह पृथ्वी की मृदा का वह भाग है जो जीवन से आता है — पौधों एवं जंतुओं के अवशेषों के विघटन से मिलने वाला नाइट्रोजन एवं अन्य पोषक तत्व। वहाँ अपघटक भी नहीं हैं, और वह मृदा अरबों वर्षों से सीधे सौर कणों के संपर्क में रही है।

एक उचित प्रयोग जिसकी आप अभिकल्पना कर सकते हैं (लौटाए गए प्रतिदर्श की थोड़ी मात्रा से, अथवा पिसी ज्वालामुखीय चट्टान से बनाई गई अनुरूपित चंद्र-मृदा से) —

  1. प्रश्न: जल, वायु एवं प्रकाश मिलने पर क्या बीज चंद्र-मृदा में अंकुरित होकर बढ़ सकते हैं?
  2. व्यवस्था: चार सर्वसमान पारदर्शी बंद पात्र, प्रत्येक में समान द्रव्यमान की मृदा, मूँग या सरसों जैसे शीघ्र उगने वाले पौधे के समान संख्या में बीज, तथा समान जल, ताप एवं प्रकाश।
    • क — चंद्र (या अनुरूपित चंद्र) मृदा
    • ख — सामान्य बगीचे की मृदा, यह नियंत्रण है
    • ग — चंद्र मृदा जिसमें थोड़ी खाद मिलाई गई हो
    • घ — चंद्र मृदा, जिसमें जल नहीं डाला गया, यह पुष्टि के लिए कि सीमित करने वाला कारक जल ही है
  3. शेष सब समान रखिए — केवल मृदा भिन्न हो। एक बार में एक ही वस्तु बदलिए।
  4. मापिए: कितने बीज अंकुरित हुए, किस दिन, दो सप्ताह में ऊँचाई कितनी, पत्तियों की संख्या तथा उनका रंग।
  5. प्रत्येक पात्र को कम-से-कम तीन बार दोहराइए, क्योंकि एक गमला ऐसे कारणों से भी विफल हो सकता है जिनका मृदा से कोई संबंध नहीं।
ऐसा क्यों होता है: बीज अपने संगृहित भोजन से अंकुरित होता है, अत: वह लगभग किसी भी नम माध्यम में — चंद्र धूल में भी — अंकुरित हो सकता है। असली परीक्षा उसके बाद आती है, जब अंकुर को मृदा से पोषक तत्व लेने पड़ते हैं। क एवं ग की तुलना बताती है कि कमी पोषक तत्वों की है या नहीं; क एवं ख की तुलना बताती है कि वह पृथ्वी की मृदा से कितनी पीछे है; घ यह पुष्टि करता है कि आप केवल बीज का अपना भोजन-भंडार नहीं देख रहे थे।
संकेत: परिणाम चाहे जो हो, यह प्रयोग चंद्रमा पर खुले में पौधे उगाने के विषय में कुछ नहीं बताता। वहाँ वायुमंडल है ही नहीं, अत: यह परीक्षण वस्तुत: किसी बंद चंद्र-हरितगृह के विषय में है।
प्र3.
पुष्प प्रायः चमकीले रंग के होते हैं एवं उनमें एक रुचिकर गंध होती है। ये विशेषताएँ पौधे के जनन में कैसे सहायक होती हैं?
उत्तर

ये विज्ञापन हैं — उन कीटों, पक्षियों एवं जंतुओं के लिए जो परागकणों को एक पुष्प से दूसरे तक ले जाएँगे।

पौधा चल नहीं सकता, परंतु उसके नर युग्मकों को निषेचन के लिए दूसरे पुष्प तक पहुँचना ही होता है। परागकण वायु, कीटों या जंतुओं द्वारा ले जाए जाते हैं; इस प्रक्रिया को परागण कहते हैं। चमकीला रंग एवं गंध पौधे की इसी समस्या का हल हैं —

  • रंग दूर से दिखाई देता है और कीट को बता देता है कि कहाँ आना है। यह दिन के प्रकाश में काम करता है।
  • गंध वहाँ काम करती है जहाँ रंग नहीं — रात में एवं पत्तियों के बीच। रात में खिलने वाले पुष्प, जैसे रात की रानी, प्राय: हल्के रंग के पर तीव्र गंध वाले होते हैं।
  • मकरंद वह पुरस्कार है जिससे यात्रा सार्थक बनती है, अत: जंतु बार-बार आता है और उसी प्रकार के अन्य पुष्पों पर भी जाता है।

मकरंद के लिए भीतर घुसते समय परागकोश के परागकण कीट के शरीर पर चिपक जाते हैं और अगले पुष्प में जाकर झड़ जाते हैं। नर एवं मादा युग्मकों का संलयन ही निषेचन है, जिससे युग्मज बनता है जो बीज के रूप में विकसित होता है, तथा बीजांड के चारों ओर पुष्प का मांसल भाग फल बन जाता है।

ऐसा क्यों होता है: रंग एवं गंध बनाने में पौधे की ऊर्जा लगती है, अत: उनसे कुछ मिलता अवश्य होगा। ये केवल उन्हीं पौधों में मिलते हैं जिनका परागण जंतुओं द्वारा होता है। वायु द्वारा परागित पौधों — घास, मक्का, अनेक वृक्ष — के पुष्प छोटे, फीके एवं गंधहीन होते हैं, क्योंकि वायु को विज्ञापन दिखाने से कोई लाभ नहीं। यही विरोधाभास सबसे प्रबल प्रमाण है कि ये लक्षण परागण के लिए ही हैं।
स्वयं जाँचिए: किसी फूलदार पौधे के पास दस मिनट बैठकर आने वाले कीटों को गिनिए। फिर घास के पुष्प या मक्के की मंजरी को ध्यान से देखिए — न पंखुड़ियाँ, न गंध, परंतु हल्के परागकणों की विशाल मात्रा। एक ही समस्या के दो भिन्न हल।
प्र4.
मछली एवं मेंढक जैसे जंतु एक बार में सैकड़ों यहाँ तक कि हजारों अंडे क्यों देते हैं जबकि दूसरे जानवर बहुत कम अंडे देते हैं? इतने सारे अंडे देने के क्या लाभ और हानि हो सकते हैं?
उत्तर

क्योंकि मछली एवं मेंढक के अंडों की रक्षा लगभग कुछ भी नहीं करता — अत: यहाँ जीवित रहना संख्या का प्रश्न है।

स्मरण कीजिए कि इन जंतुओं में निषेचन कैसे होता है — नर एवं मादा मछली या मेंढक अपने शुक्राणु एवं अंडाणु जल में स्खलित करते हैं, जहाँ वे संयोजित होकर युग्मज बनाते हैं और युग्मज से भ्रूण का विकास भी जल में ही होता है। उस क्षण से अंडे अपने भरोसे हैं — खुले जल में तैरते हुए, बिना देखभाल के, और अन्य मछलियों, कीटों एवं पक्षियों द्वारा खाए जाते हुए। हज़ार अंडों में से शायद कुछ ही वयस्क बन पाते हैं। हज़ार देना ही उन कुछ को संभव बनाता है।

बहुत अधिक अंडे देने के लाभहानियाँ
भारी क्षति के बाद भी कुछ बच जाते हैं, अत: प्रजाति बनी रहती हैप्रत्येक अंडे में बहुत कम भोजन भरा जा सकता है, अत: बच्चे छोटे एवं असहाय निकलते हैं
खुले जल में निषेचन अनिश्चित होता है; अधिक अंडे होने से कुछ के निषेचित होने की संभावना बढ़ती हैइतने अधिक की देखभाल संभव नहीं, अत: अधिकांश परभक्षियों के भोजन बन जाते हैं
अधिक अंडे अर्थात अनुदेशों के अधिक मिश्रण, अत: संतति में अधिक विभिन्नताप्रत्येक ऋतु में सहस्रों अंडे बनाने में मादा की बहुत ऊर्जा व्यय होती है
बुरे वर्ष के बाद जनसंख्या शीघ्र पुन: बढ़ सकती हैसंख्या परिस्थितियों के साथ बहुत घटती-बढ़ती रहती है, स्थिर नहीं रहती

अन्य जंतु कम अंडे क्यों देते हैं। पक्षी कम अंडे देते हैं क्योंकि प्रत्येक अंडे में संपूर्ण विकास के लिए पर्याप्त भोजन भरा जाता है और फिर उसे सेया, गरम रखा एवं सुरक्षित किया जाता है। कम पर बहुत अधिक व्यय करके एवं उनकी रक्षा करके वही लक्ष्य विपरीत मार्ग से प्राप्त होता है — कुछ का बच जाना।

ऐसा क्यों होता है: जनक के पास जनन के लिए सीमित ऊर्जा होती है और उसे दो में से एक प्रकार से व्यय किया जा सकता है — अनेक सस्ती संततियाँ बिना सुरक्षा के, अथवा कुछ महँगी संततियाँ पूरी सुरक्षा के साथ। जल पहली विधि को संभव बनाता है, क्योंकि वहाँ अंडे सूखते नहीं और युग्मक केवल छोड़ देने से मिल जाते हैं। स्थल पर पहली विधि विफल हो जाती है, अत: स्थलीय जंतु प्राय: दूसरी विधि अपनाते हैं।
प्र5.
गौरैया जैसे पक्षी घोंसले बनाते हैं एवं अपने अंडों और चूजों की देखभाल करते हैं जबकि साँप जैसे सरीसृप सामान्यत: अपने अंडे देते हैं एवं उन्हें बिना सुरक्षा के छोड़ देते हैं। माता-पिता की देखभाल में यह अंतर प्रत्येक प्रकरण में बच्चों के जीवित रहने की संभावनाओं को कैसे प्रभावित कर सकता है?
उत्तर

गौरैया के प्रत्येक चूजे के बचने की संभावना साँप के प्रत्येक बच्चे से कहीं अधिक होती है — परंतु साँप इसकी भरपाई संख्या से करता है।

गौरैया — देखभाल सहितसाँप — देखभाल रहित
अंडों की संख्याकमप्राय: कहीं अधिक
अंडे के विकास के समयघोंसला उसे छिपाता है, जनक उसे गरम रखते एवं परभक्षियों को भगाते हैंदबाकर या छिपाकर छोड़ दिया जाता है; अनेक खा लिए या नष्ट हो जाते हैं
बच्चे निकलने के बादजनक भोजन एवं आश्रय देते हैं जब तक चूजा उड़ना एवं स्वयं खाना न सीख लेबच्चे को पहले ही दिन से स्वयं भोजन खोजना एवं परभक्षियों से बचना पड़ता है
किसी एक संतति के बचने की संभावनाअधिककम
जनकों पर लागतबहुत अधिक — सप्ताहों तक भोजन जुटाना एवं पहरा देनाकम — अंडे देते ही कार्य समाप्त
ऐसा क्यों होता है: दोनों विधियाँ एक ही कसौटी पर खरी उतरती हैं — इतनी संततियाँ वयस्क बन जाएँ कि जनसंख्या बनी रहे। गौरैया यह संख्या कुछ को भली-भाँति बचाकर प्राप्त करती है; साँप अनेक को जन्म देकर और किसी को न बचाकर। देखभाल केवल ‘बेहतर’ नहीं है — उसकी कीमत जनकों का अपना समय एवं सुरक्षा है, और जो जनक घोंसले की रखवाली में लगा है वह उस समय न खा रहा है न भाग सकता है। कौन-सी विधि सफल होगी, यह इस पर निर्भर है कि परिवेश कितना संकटपूर्ण है और जनक कितना दे सकता है।
क्या आप जानते हैं? यही अदला-बदली पिछले प्रश्न में मछली एवं मेंढक के विषय में दिखी थी, और उससे पहले अंडे देने एवं बच्चे को जन्म देने की तुलना में भी। यह जीव विज्ञान के बार-बार दिखने वाले प्रतिरूपों में से एक है — अनेक पर थोड़ा-थोड़ा, अथवा कुछ पर बहुत अधिक।
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