आपका मित्र पहली बात में सही है और निष्कर्ष में गलत। पृथ्वी की जलवायु पहले भी बदली है — परंतु आज जो हो रहा है उसका कारण एवं उसकी गति दोनों भिन्न हैं।
1. कारण भिन्न है। अध्याय स्पष्ट बताता है कि आज की अतिरिक्त ऊष्मा कहाँ से आ रही है। कोयला एवं तेल जैसे जीवाश्म ईंधन जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड एवं मेथेन जैसी हरितगृह गैसें उत्सर्जित होती हैं जो पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित ऊष्मा को और अधिक रोक लेती हैं। सामान्यत: पेड़-पौधे एवं समुद्री प्लवक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर संतुलन बनाए रखते हैं। परंतु जीवाश्म ईंधन जलाने से वह कार्बन मुक्त होता है जो लाखों वर्षों से पृथ्वी के भीतर संगृहीत था, और पृथ्वी उसे उतनी शीघ्रता से अवशोषित नहीं कर पाती — अत: ऊष्मा बढ़ती चली जाती है।
2. गति भिन्न है। अतीत के परिवर्तन प्राय: बहुत लंबे कालखंडों में हुए। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अनुकूलन, जैसा इसी अध्याय में पढ़ा, जनन द्वारा अनेक पीढ़ियों में होता है। जो परिवर्तन जीवों के अनुकूलन से अधिक तेज़ी से आए वह उन्हें बदलने का नहीं, विलुप्त होने का अवसर देता है।
3. आज दाँव पर वह तंत्र है जिस पर हम निर्भर हैं। तापमान में थोड़ी-सी वृद्धि से भी हिमछत्रक पिघल सकते हैं, समुद्र का जल-स्तर बढ़ सकता है जिससे अनेक तटीय शहरों में बाढ़ आ सकती है, मौसम में बड़े परिवर्तन हो सकते हैं और अनेक पौधे व जीव-जंतु विलुप्त हो सकते हैं। जैव विविधता के हनन एवं प्रदूषण के साथ मिलकर यही त्रिग्रहीय संकट कहलाता है।
क्या आप जानते हैं? इसीलिए विश्व के देशों ने वैश्विक समझौते किए हैं। पेरिस समझौते (2015) ने वैश्विक तापन को 1.5 °C से नीचे रखने का लक्ष्य रखा; पुस्तक के अनुसार 2025 तक भी विश्व इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है और अभी बहुत अधिक प्रयास आवश्यक हैं।
ऐसा क्यों होता है: ‘यह पहले भी हुआ है’ से केवल इतना पता चलता है कि जलवायु बदल सकती है; यह नहीं पता चलता कि इस बार उसे कौन बदल रहा है। विज्ञान में उपयोगी प्रश्न यह नहीं होता कि प्रभाव नया है या नहीं, अपितु यह कि उसका कारण क्या है — और यहाँ कारण पहचाना जा सकता है, मापा जा सकता है, तथा ज्वालामुखी या कक्षा के विपरीत, मनुष्य चाहे तो उसे बदल भी सकता है।