प्र1.
क्या आप को कभी आश्चर्य हुआ है कि पृथ्वी पर इतनी वस्तुएँ किस प्रकार संतुलन बनाकर रखती हैं?
उत्तर
संतुलन इसलिए बना रहता है क्योंकि ये वस्तुएँ एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं हैं। भूमि, वायु, जल एवं जीव परस्पर सहायक हैं एवं एक दूसरे को प्रभावित करते हैं, अत: किसी एक स्थान पर पड़ा दबाव शेष तंत्र द्वारा संभाला जाता है।
अध्याय का अपना उदाहरण लेकर उसकी शृंखला देखिए —
जंगल की कटाई
→ जलवाष्प छोड़ने एवं कार्बन डाइऑक्साइड लेने वाले वृक्ष कम
→ वर्षा में कमी एवं अधिक ऊष्मा का रुकना
→ नग्न मृदा बह जाती है, वायु की गुणवत्ता गिरती है
→ वहाँ रहने वाले जंतुओं का भोजन एवं आश्रय समाप्त
→ केवल वृक्ष नहीं, पूरा स्थानीय तंत्र बदल जाता है
→ जलवाष्प छोड़ने एवं कार्बन डाइऑक्साइड लेने वाले वृक्ष कम
→ वर्षा में कमी एवं अधिक ऊष्मा का रुकना
→ नग्न मृदा बह जाती है, वायु की गुणवत्ता गिरती है
→ वहाँ रहने वाले जंतुओं का भोजन एवं आश्रय समाप्त
→ केवल वृक्ष नहीं, पूरा स्थानीय तंत्र बदल जाता है
यही बात उल्टी दिशा में भी सत्य है, और इसीलिए संतुलन टिक पाता है — बढ़ता हुआ वन वायु को ठंडा रखता है, मृदा को थामता है, भूमिगत जल भरता है एवं अधिक प्रजातियों को आश्रय देता है, और इनमें से प्रत्येक स्वयं वन को और सुदृढ़ बनाता है।
ऐसा क्यों होता है: पृथ्वी एक विशाल जीवंत प्रणाली की भाँति कार्य करती है जिसमें एक भाग का निर्गत दूसरे भाग का निवेश होता है। कोई भी वस्तु अकेले संरक्षित करने से नहीं बचती — वह तभी बचती है जब उसके चारों ओर के भाग अपना कार्य करते रहें। इसीलिए अध्याय कहता है कि पृथ्वी पर जीवन किसी एक कारण से नहीं, अपितु सभी तंत्रों के मिलकर संतुलन बनाए रखने से टिका है।
संकेत: यही कारण है कि स्वच्छ वायु, जल, मृदा एवं जीवन के सभी रूपों को संरक्षित रखना अध्याय में केवल ‘महत्त्वपूर्ण’ नहीं, ‘अनिवार्य’ बताया गया है। इन चारों में से एक को संभालकर शेष तीन को छोड़ देना संभव नहीं है।