क्योंकि प्रतिजैविक औषधियाँ केवल जीवाणु से होने वाले संक्रमणों में प्रभावी हैं, जबकि सर्दी, खाँसी या फ्लू विषाणु से होते हैं। औषधि को रोगी के भीतर ऐसा कुछ मिलता ही नहीं जिस पर वह कार्य कर सके।
ऐसा क्यों होता है: प्रतिजैविक औषधियाँ जीवाणु कोशिकाओं के उन भागों को लक्षित करती हैं जो मानव अथवा अन्य जंतु कोशिकाओं से भिन्न होते हैं — यही उन्हें हमारे लिए सुरक्षित और जीवाणुओं के लिए घातक बनाता है। विषाणु में ऐसा कोई भाग होता ही नहीं। वह स्वयं एक कोशिका भी नहीं है; वह हमारी ही कोशिकाओं के भीतर गुणन करता है। अतः प्रतिजैविक के पास आक्रमण करने के लिए कुछ है ही नहीं, और कोई भी मात्रा इसे बदल नहीं सकती।
फिर भी लेना केवल व्यर्थ नहीं, हानिकारक है—
- यह उन अच्छे जीवाणुओं को नष्ट कर देती है जो शरीर को संक्रमण से बचाते हैं (चित्र 3.5 ख), जिससे प्रतिरोधी जीवाणुओं को बढ़ने और छा जाने का अवसर मिल जाता है।
- यह प्रतिजैविक प्रतिरोध बढ़ाती है, जिससे बाद में जब वास्तविक जीवाण्विक संक्रमण हो तब औषधि काम न करे — आपके लिए भी और शेष सबके लिए भी।
- इसके दुष्प्रभाव हो सकते हैं और यह ‘कुछ तो कर लिया’ का झूठा संतोष देकर उचित देखभाल में विलंब करा देती है।
विषाणु जनित सर्दी या फ्लू का सही उपचार वही है जो अध्याय बताता है — घर पर विश्राम, तरल पदार्थ, और मुँह तथा नाक ढकना। प्रतिरक्षा प्रणाली कुछ दिनों में विषाणु को स्वयं समाप्त कर देती है।
ध्यान दीजिए: यही तर्क बताता है कि मलेरिया में भी प्रतिजैविक से लाभ नहीं होगा — वह प्रोटोजोआ से होता है और अध्याय स्पष्ट कहता है कि प्रतिजैविक औषधियाँ प्रोटोजोआ से होने वाले रोगों में प्रभावी नहीं हैं।