कुतूहल अध्याय 3 जिज्ञासा बनाए रखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
चित्रों में दर्शाए गए रोगों को संचरणीय अथवा असंचरणीय रोगों के रूप में समूहित करें। सर्दी-जुकाम और फ्लू, आंत्र ज्वर (टाइफॉइड), मधुमेह (डायबीटीज), अस्थमा (दमा), छोटी माता (चिकनपॉक्स)
उत्तर
रोगवर्गकारणक्या यह फैलता है?
सर्दी-जुकाम और फ्लूसंचरणीयविषाणु, श्वसन तंत्र मेंहाँ — वायु द्वारा, खाँसने-छींकने से निकली बूँदों से
आंत्र ज्वर (टाइफॉइड)संचरणीयजीवाणु, आंत्र मेंहाँ — दूषित जल और भोजन द्वारा
मधुमेह (डायबीटीज)असंचरणीयहॉर्मोन असंतुलन तथा जीवनशैली संबंधी कारणनहीं
अस्थमा (दमा)असंचरणीयपर्यावरण से जुड़ा, विशेषकर धुआँ, धूल और प्रदूषित वायुनहीं
छोटी माता (चिकनपॉक्स)संचरणीयविषाणु, श्वसन तंत्र और त्वचा मेंहाँ — वायु द्वारा तथा फफोलों के संपर्क से

संचरणीय: सर्दी-जुकाम और फ्लू, आंत्र ज्वर, छोटी माता।   असंचरणीय: मधुमेह, अस्थमा।

ऐसा क्यों होता है: कसौटी यह नहीं कि रोग कितना गंभीर है या कितने समय चलता है — कसौटी यह है कि उसका कारण कोई रोगजनक है या नहीं। रोगजनक दूसरे शरीर तक जा सकता है, अतः रोग संचरणीय हो जाता है। मधुमेह और अस्थमा में जाने के लिए कोई रोगजनक ही नहीं है, अतः रोगी चाहे कितना ही अस्वस्थ हो, किसी को उससे यह रोग नहीं लगता।
प्र2.
रोगों को व्यापक रूप से संचरणीय और असंचरणीय रोगों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। नीचे दिए गए विकल्पों में से असंचरणीय रोगों को पहचानिए। (i) आंत्र ज्वर (ii) अस्थमा (iii) मधुमेह (iv) खसरा — (क) (i) और (ii) (ख) (ii) और (iii) (ग) (i) और (iv) (घ) (ii) और (iv)
उत्तर

(ख) (ii) और (iii) — अस्थमा और मधुमेह।

रोगकिससे होता हैवर्ग
(i) आंत्र ज्वरजीवाणु — दूषित जल और भोजन से फैलता हैसंचरणीय
(ii) अस्थमापर्यावरण और जीवनशैली — कोई रोगजनक नहींअसंचरणीय
(iii) मधुमेहहॉर्मोन असंतुलन और जीवनशैली — कोई रोगजनक नहींअसंचरणीय
(iv) खसराविषाणु — वायु द्वारा फैलता हैसंचरणीय
शेष विकल्प क्यों गलत हैं: उनमें से प्रत्येक में आंत्र ज्वर अथवा खसरा सम्मिलित है, और ये दोनों रोगजनकों से होते हैं तथा एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते हैं।
प्र3.
आपके विद्यालय में फ्लू का प्रकोप हुआ है। आपके अनेक सहपाठी अनुपस्थित हैं जबकि कुछ खाँसते और छींकते हुए विद्यालय आ रहे हैं। (i) संक्रमण को और अधिक फैलने से रोकने के लिए विद्यालय द्वारा तत्काल क्या उपाय किए जाने चाहिए? (ii) यदि आपके साथ बेंच पर बैठने वाले सहपाठी में फ्लू के लक्षण दिखने लगें तो आप उन्हें दुःख अथवा ठेस पहुँचाए बिना कैसे प्रतिक्रिया देंगे? (iii) इस स्थिति में आप स्वयं को और दूसरों को संक्रमित होने से कैसे बचा सकते हैं?
उत्तर

(i) विद्यालय द्वारा तत्काल किए जाने वाले उपाय। फ्लू वायु द्वारा फैलता है, अतः प्रत्येक उपाय बूँदों को रोकने के लिए होना चाहिए—

  • तुरंत अभिभावकों को सूचित कीजिए और कहिए कि ज्वर, खाँसी या जुकाम वाला विद्यार्थी घर पर रहकर विश्राम करे — अध्याय के अनुसार इससे स्वास्थ्य लाभ में सहायता मिलती है और दूसरों तक रोग का संचरण कम होता है।
  • खाँसने-छींकने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को मास्क दीजिए और सबसे मुँह तथा नाक ढकने को कहिए।
  • प्रत्येक नल पर साबुन और पानी उपलब्ध कराइए तथा हाथ धोने का निश्चित समय तय कीजिए — मध्याह्न भोजन से पहले और खेल के बाद।
  • कक्षाओं में वायु का आवागमन बनाए रखिए, खिड़कियाँ खुली रखिए।
  • पानी की बोतल, टिफ़िन, रुमाल और तौलिया साझा करना बंद कराइए।
  • बार-बार छुई जाने वाली सतहें — दरवाज़ों के हैंडल, डेस्क, नल, खेल का सामान — स्वच्छ रखिए।
  • दिन में अस्वस्थ होने वाले विद्यार्थी को अलग कक्ष में बिठाकर अभिभावकों को बुलाइए; बड़ी सभाएँ और भीड़ वाले कार्यक्रम स्थगित कीजिए।
  • यदि मामले बढ़ते जाएँ तो स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी को सूचित कीजिए।

(ii) सहपाठी के साथ संवेदनशील व्यवहार। उद्देश्य यह है कि दोनों सुरक्षित रहें और मित्र को यह न लगे कि उसे दोषी ठहराया जा रहा है।

  • धीरे और आत्मीयता से कहिए— “तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही, क्या हम मैडम को बता दें?” पूरी कक्षा के सामने घोषणा मत कीजिए।
  • रुमाल या अतिरिक्त मास्क दीजिए और उसके साथ विद्यालय की नर्स अथवा कार्यालय तक जाने की पेशकश कीजिए।
  • उस दिन के लिए थोड़ा दूर बैठने का सुझाव दीजिए और कारण भी बताइए — जिससे उसे पता रहे कि यह विषाणु की बात है, उसकी नहीं।
  • अपनी नोटबुक देने और शाम को फ़ोन करने की बात कहिए। अस्वस्थ होकर घर पर रहना अकेलेपन भरा होता है।
  • घृणा भरे भाव से दूर मत हटिए, चिढ़ाइए मत, और किसी को प्रकोप का “कारण” मत कहिए। फ्लू किसी को भी हो सकता है; इससे उस व्यक्ति के विषय में कुछ सिद्ध नहीं होता।

(iii) स्वयं को और दूसरों को बचाना।

  • साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोइए तथा बिना धुले हाथों से आँख, नाक और मुँह मत छुइए।
  • प्रकोप के दिनों में कक्षा में मास्क पहनिए।
  • खाँसते या छींकते समय अपना मुँह और नाक ढकिए — रुमाल या आस्तीन से, हथेली से नहीं।
  • बोतल, टिफ़िन या रुमाल साझा मत कीजिए।
  • खिड़कियाँ खुली रखिए; अवकाश में खुली हवा में बैठिए।
  • संतुलित आहार लीजिए और पर्याप्त नींद लीजिए जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली अपनी पूरी शक्ति में रहे।
  • यदि आपमें लक्षण दिखें तो घर पर रहिए। शेष कक्षा के लिए यही सबसे प्रभावी कार्य है।
ऐसा क्यों होता है: फ्लू वायु जनित है। ऊपर का प्रत्येक उपाय उसकी यात्रा को किसी एक बिंदु पर काटता है — मास्क और रुमाल निकास पर, वायु का आवागमन मार्ग में, हाथ धोना सतहों पर, और घर पर रहना स्रोत पर।
प्र4.
आपका परिवार ऐसे स्थान पर यात्रा की योजना बना रहा है जहाँ मलेरिया का प्रकोप है। (i) यात्रा से पूर्व, यात्रा के समय और यात्रा के पश्चात आपको कौन-कौन सी सावधानियाँ रखनी चाहिए? (ii) आप अपने भाई अथवा बहन को मच्छरदानी या मच्छर प्रतिकर्षी का महत्त्व कैसे समझाएँगे? (iii) यदि ऐसे क्षेत्रों में यात्री स्वास्थ्य सलाह की अनदेखी करते हैं तो क्या हो सकता है?
उत्तर

मलेरिया प्रोटोजोआ से होता है और हम तक केवल मच्छर के काटने से पहुँचता है, जो रोगवाहक का कार्य करता है। अतः प्रत्येक सावधानी का लक्ष्य एक ही है— मच्छर न काटे

(i) सावधानियाँ

यात्रा से पूर्वयात्रा के समययात्रा के पश्चात
पता कीजिए कि वहाँ मलेरिया कितना और किस ऋतु में फैलता है; क्या साथ ले जाना है, इस विषय में चिकित्सक से परामर्श कीजिएप्रत्येक रात मच्छरदानी लगाकर सोइएअगले कुछ सप्ताह तक तीव्र ज्वर, अत्यधिक पसीना और कंपकंपी पर ध्यान रखिए
मच्छरदानी, मच्छर प्रतिकर्षी तथा पूरी बाँह के कपड़े और पूरी लंबाई की पतलून रखिएमच्छर प्रतिकर्षी लगाइए, विशेषकर सुबह और सायंकालऐसा ज्वर आने पर तुरंत चिकित्सक को दिखाइए और यात्रा के विषय में अवश्य बताइए
देखिए कि ठहरने के स्थान की खिड़कियों पर जाली है या नहीं, अन्यथा मच्छरदानी साथ ले जाइएसायंकाल पूरी बाँह के कपड़े पहनिएचिकित्सक द्वारा दी गई औषधि की पूरी खुराक लीजिए
रुद्ध जल वाले स्थानों से बचिए; ठहरने के स्थान के आस-पास जल एकत्र मत होने दीजिएअपने घर के आस-पास भी रुका हुआ जल हटाइए

(ii) छोटे भाई अथवा बहन को समझाना। बात सरल और सत्य रखिए—

“मलेरिया किसी के पास बैठने से या एक ही हवा में साँस लेने से नहीं फैलता। यह केवल एक विशेष प्रकार के मच्छर के काटने से होता है। इसका अर्थ है कि यदि मच्छर तुम्हारी त्वचा तक पहुँच ही न पाए तो रोग भी तुम तक नहीं पहुँच सकता। मच्छरदानी तुम्हारे बिस्तर के चारों ओर एक दीवार है और प्रतिकर्षी एक ऐसी गंध है जिसके पास मच्छर नहीं आता — और इसके अतिरिक्त उसके पास कोई तीसरा रास्ता है ही नहीं।”

इसे आदेश के स्थान पर साझा कार्य बनाइए — मच्छरदानी लगाने का काम उसे दीजिए, और आस-पास जमा जल ढूँढ़कर हटाने वाला भी वही बने।

(iii) यदि यात्री स्वास्थ्य सलाह की अनदेखी करें।

  • उनके काटे जाने और मलेरिया होने की संभावना कहीं अधिक होती है — तीव्र ज्वर, कंपकंपी और अत्यधिक पसीना, जो इतना गंभीर हो सकता है कि चिकित्सालय जाना पड़े।
  • रोग की पहचान प्रायः देर से होती है, क्योंकि लौटने के बाद चिकित्सक को मलेरिया का ध्यान तभी आता है जब यात्रा की बात बताई जाए। विलंब से रोग और बिगड़ता है।
  • वे रोग को घर तक ले आ सकते हैं। यदि कोई स्थानीय मच्छर संक्रमित यात्री को काटे तो वह परजीवी दूसरों तक पहुँचा सकता है — अर्थात एक व्यक्ति की लापरवाही पूरे मोहल्ले के लिए संकट बन जाती है।
  • यही लापरवाही — अशुद्ध जल पीना, रुके जल की उपेक्षा — उसी यात्रा में डेंगू, आंत्र ज्वर और हैजा को भी निमंत्रण देती है।
ऐसा क्यों होता है: रोगवाहक जनित रोग के पास प्रवेश का ठीक एक ही द्वार होता है। स्वास्थ्य सलाह उसी एक द्वार को बंद रखने का निर्देश मात्र है — इसीलिए यहाँ उसकी अनदेखी दिखने से कहीं अधिक महँगी पड़ती है।
प्र5.
आपके चाचाजी ने अपने मित्रों की संगत में पड़कर धूम्रपान करना आरंभ कर दिया है जबकि यह सर्वविदित है कि धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है और मृत्यु का कारण भी बन सकता है। (i) आप उन्हें ठेस पहुँचाए बिना उनसे ऐसा क्या कहेंगे जिससे कि वे इसे छोड़ दें? (ii) यदि आपके मित्र ने पार्टी में आपको धूम्रपान करने के लिए कहा तो आप क्या करेंगे? (iii) विद्यालय ऐसी हानिकारक आदतों से विद्यार्थियों को बचाने में कैसे सहायता कर सकते हैं?
उत्तर

(i) चाचाजी से क्या कहें। एकांत में, आदर के साथ और चिंता के भाव से बात कीजिए, आरोप के भाव से नहीं। जिस बड़े को लगे कि उस पर आक्रमण हो रहा है, वह सुनना बंद कर देता है।

  • आरंभ संबंध से कीजिए, आदत से नहीं— “चाचाजी, मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि आप बहुत लंबे समय तक हमारे साथ रहें।”
  • उपदेश के स्थान पर एक-दो तथ्य रखिए। अध्याय तंबाकू को उन हानिकारक पदार्थों में गिनाता है जिन्हें ‘ना’ कहना चाहिए। धूम्रपान फेफड़ों और हृदय को हानि पहुँचाता है तथा क्षय रोग जैसे संक्रमणों से लड़ना कठिन बना देता है।
  • यह भी बताइए कि धुआँ कमरे में उपस्थित सभी लोगों तक पहुँचता है — घर के बच्चे और बुजुर्ग भी उसे साँस के साथ लेते हैं।
  • उस कारण की ओर संकेत कीजिए जिससे यह आरंभ हुआ। मित्रों की संगत में बने रहने के लिए स्वास्थ्य की कीमत चुकाना घाटे का सौदा है, और वह कीमत उनके मित्र नहीं चुकाएँगे।
  • निर्णय सुनाने के स्थान पर सहायता दीजिए — उनके साथ चिकित्सक के पास चलिए अथवा साथ बैठकर राष्ट्रीय तंबाकू क्विटलाइन देखिए। छोड़ना कठिन होता है क्योंकि तंबाकू व्यसनकारी है, अतः हर प्रयास को प्रगति मानिए और असफल प्रयास पर उपहास कभी मत कीजिए।

(ii) यदि मित्र सिगरेट का प्रस्ताव दे।

  • सरलता से मना कीजिए— “नहीं, धन्यवाद, मैं धूम्रपान नहीं करता।” छोटा उत्तर लंबे स्पष्टीकरण से अधिक प्रभावी होता है और आप किसी को सफ़ाई देने के लिए बाध्य नहीं हैं।
  • वहाँ से आगे बढ़ जाइए — विषय बदलिए, पानी पीजिए, किसी दूसरे समूह में सम्मिलित हो जाइए। दबाव बना रहे तो वहाँ से चले जाइए।
  • अपना उत्तर पहले से तय रखिए। साथियों का दबाव झिझक पर ही काम करता है और तैयार वाक्य उस झिझक को समाप्त कर देता है।
  • यदि ऐसा बार-बार हो, विशेषकर यदि कक्षा के अन्य विद्यार्थियों पर भी दबाव डाला जा रहा हो, तो माता-पिता, शिक्षक अथवा किसी विश्वसनीय बड़े को बताइए।

ध्यान दीजिए कि आपके चाचाजी के साथ ठीक यही हुआ था। एक बार, आरंभ में ही मना कर देना बाद में छोड़ने से कहीं सरल है।

(iii) विद्यालय कैसे सहायता कर सकते हैं।

  • कक्षा में तथ्य स्पष्ट रूप से पढ़ाएँ और किसी चिकित्सक को बुलाकर विद्यार्थियों के प्रश्नों के उत्तर दिलाएँ।
  • विद्यालय और उसके परिसर को तंबाकू मुक्त रखें तथा द्वार के निकट नाबालिगों को तंबाकू बेचने वाली दुकानों का विषय संबंधित अधिकारियों के समक्ष उठाएँ।
  • पोस्टर प्रतियोगिता, वाद-विवाद, नुक्कड़ नाटक और स्वास्थ्य अभियान चलाएँ जिससे विद्यार्थी एक-दूसरे को समझाएँ — सहपाठी की बात सूचना पट्ट से कहीं दूर तक जाती है।
  • ऐसा परामर्शदाता उपलब्ध कराएँ जिससे विद्यार्थी दंड के भय के बिना एकांत में बात कर सकें, जैसा क्रियाकलाप 3.1 के विद्यालय ने किया।
  • खेल, संगीत, क्लब और एन.एस.एस. जैसी गतिविधियाँ चलाएँ जिससे प्रत्येक विद्यार्थी को अपनापन मिले और उसे किसी हानिकारक आदत को प्रवेश शुल्क के रूप में न अपनाना पड़े।
  • अभिभावकों को जोड़ें, जिससे वही संदेश घर और विद्यालय दोनों जगह सुनाई दे।
ऐसा क्यों होता है: धूम्रपान प्रायः स्वाद के लिए आरंभ नहीं होता। लोग कहीं का हो जाने के लिए आरंभ करते हैं। इसीलिए जो विद्यालय प्रत्येक विद्यार्थी को अपनापन देता है, वह केवल चेतावनी देने वाले विद्यालय से कहीं अधिक हानि रोकता है।
प्र6.
सानिया अपनी सखी विनीता से कहती है, “प्रतिजैविक औषधियाँ किसी भी संक्रमण को ठीक कर सकती हैं इसलिए हमें रोगों की चिंता नहीं करनी चाहिए।” विनीता ऐसे कौन-कौन से प्रश्न पूछ सकती हैं जिससे सानिया समझ सके कि उसका कथन गलत है?
उत्तर

विनीता ऐसे प्रश्न पूछे जिनसे सानिया अपने ही कथन को अपनी ही जानकारी से जाँच ले।

  • प्रतिजैविक औषधियाँ वास्तव में किन रोगाणुओं को नष्ट करती हैं? क्या ये सर्दी, फ्लू, खसरा, चेचक और डेंगू करने वाले विषाणुओं पर काम करती हैं, या मलेरिया करने वाले प्रोटोजोआ पर?”
  • “यदि प्रतिजैविक हर संक्रमण ठीक कर देतीं तो सर्दी-जुकाम में चिकित्सक गोली देने के स्थान पर विश्राम और तरल पदार्थ लेने को क्यों कहते हैं?
  • “क्या तुम्हें प्रतिजैविक प्रतिरोध के विषय में पता है? जब कोई अनावश्यक रूप से प्रतिजैविक ले ले या खुराक बीच में छोड़ दे तो बचे हुए जीवाणुओं का क्या होता है?”
  • “यदि औषधि इतनी पूर्ण रूप से काम करती है तो चिकित्सक पूरी खुराक लेने पर इतना बल क्यों देते हैं?
  • “क्या मधुमेह और अस्थमा का उपचार प्रतिजैविक से होता है? उन रोगों का क्या जो संक्रमण हैं ही नहीं?
  • “यदि प्रतिजैविक से सब कुछ ठीक हो जाता तो पूरे विश्व को टीकों, स्वच्छ जल और शौचालयों की आवश्यकता क्यों पड़ती?

सही स्थिति। प्रतिजैविक औषधियाँ केवल जीवाणु से होने वाले संक्रमणों में प्रभावी हैं, क्योंकि ये जीवाणु कोशिकाओं के केवल उन्हीं भागों को लक्षित करती हैं जो मानव अथवा अन्य जंतु कोशिकाओं से भिन्न होते हैं। ये विषाणु या प्रोटोजोआ से होने वाले रोगों में प्रभावी नहीं हैं, और असंचरणीय रोगों से तो इनका कोई संबंध ही नहीं। इसके अतिरिक्त इनके अनियंत्रित उपयोग से इनकी प्रभावशीलता पहले ही घट रही है। अतः यह कथन दो प्रकार से गलत है — प्रतिजैविक हर संक्रमण ठीक नहीं कर सकतीं, और इन पर निर्भर रहने से ये सबके लिए कम उपयोगी हो जाती हैं।

संकेत: अच्छा प्रति-प्रश्न सामने वाले को यह नहीं बताता कि वह गलत है। वह उसे एक ऐसा तथ्य थमा देता है जिसे वह पहले से मानता है, और उसे स्वयं विरोधाभास दिखाई दे जाता है।
प्र7.
निम्नलिखित तालिका में एक वर्ष की अवधि में एक चिकित्सालय में अंकित किए गए डेंगू के मामलों की संख्या की जानकारी दी गई है— जनवरी 10, फरवरी 12, मार्च 15, अप्रैल 18, मई 22, जून 40, जुलाई 65, अगस्त 65, सितंबर 65, अक्तूबर 30, नवंबर 30, दिसंबर 20। आप एक बार ग्राफ (दंड आलेख) बनाइए जिसमें Y-अक्ष पर मामलों की संख्या और X-अक्ष पर माह के नाम अंकित हों। अपने निष्कर्षों का समीक्षात्मक विश्लेषण कीजिए एवं निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए— (i) किन तीन महीनों में डेंगू के मामले सबसे अधिक थे? (ii) किस महीने अथवा महीनों में मामले सबसे कम थे? (iii) डेंगू के सर्वाधिक प्रकोप वाले महीनों में कौन-से प्राकृतिक या पर्यावरणीय कारण इसके मामलों में वृद्धि का कारण बन सकते थे? (iv) कुछ ऐसे निवारक उपाय सुझाइए जो समुदाय अथवा सरकार द्वारा ऐसे समय से पूर्व किए जा सकते हैं जब डेंगू के मामले सबसे अधिक होते हैं ताकि डेंगू के प्रकोप को कम किया जा सके?
उत्तर
0 10 20 30 40 50 60 70 10 12 15 18 22 40 65 65 65 30 30 20 जन फर मार्च अप्रै मई जून जुल अग सित अक्तू नव दिस माह डेंगू के मामलों की संख्या
चिकित्सालय में अंकित डेंगू के मामले, माह के अनुसार। लाल दंड सर्वाधिक प्रकोप वाले तीन महीने दर्शाते हैं।

(i) सबसे अधिक: जुलाई, अगस्त और सितंबर — तीनों में 65-65 मामले।

(ii) सबसे कम: जनवरी — 10 मामले।

वर्ष भर के कुल मामले = 10 + 12 + 15 + 18 + 22 + 40 + 65 + 65 + 65 + 30 + 30 + 20
= 392
जुलाई + अगस्त + सितंबर के मामले = 65 + 65 + 65 = 195
वर्ष में इनका भाग = 195 ÷ 392 ≈ 0.50, अर्थात वर्ष के केवल एक चौथाई समय में लगभग आधे मामले

(iii) प्रकोप वाले महीनों के प्राकृतिक और पर्यावरणीय कारण। जुलाई से सितंबर मानसून और उसके ठीक बाद का समय है।

  • वर्षा का जल एकत्र होकर रुक जाता है — पुराने टायरों, गमलों, कूलरों, टंकियों, फेंके गए पात्रों, अवरुद्ध नालियों और गड्ढों में। डेंगू का मच्छर इसी प्रकार के स्वच्छ, रुके हुए जल में प्रजनन करता है, और अध्याय का अपना निवारक उपाय भी रुद्ध जल वाले क्षेत्रों से बचना है।
  • गर्म और आर्द्र मौसम मच्छर के जीवन चक्र को तेज़ कर देता है और वयस्क मच्छरों को अधिक समय तक जीवित रखता है, अतः काटने वाले मच्छर कहीं अधिक हो जाते हैं।
  • भारी वर्षा के बाद जल भराव और निकासी की कमी से एक साथ अनेक स्थानों पर प्रजनन स्थल बन जाते हैं।
  • वर्षा और मामलों के बीच अंतराल होता है — अंडों को फूटना है, मच्छरों को वयस्क होकर काटना है और रोग को विकसित होना है। इसीलिए संख्या जून (40) में चढ़ती है और चरम जुलाई से आता है।
  • अक्तूबर तक वर्षा रुक जाती है, जल सूख जाता है और तापमान गिरता है — और संख्या 65 से घटकर आधी, 30, रह जाती है।

(iv) प्रकोप के समय से पूर्व किए जाने वाले निवारक उपाय। ग्राफ का मूल्य यही है कि यह दिखाता है कि चरम प्रत्येक वर्ष एक ही समय पर आता है, अतः उसकी तैयारी की जा सकती है।

  • मानसून से पूर्व ही नालियों की सफाई और गाद निकासी कराइए तथा गड्ढे और नीची भूमि भरवाइए।
  • साप्ताहिक ‘शुष्क दिवस’ अभियान चलाइए — प्रत्येक घर सप्ताह में एक बार कूलर, टंकी, गमले और टायर खाली करके रगड़कर साफ करे, जिससे लार्वा वयस्क बनने से पहले ही नष्ट हो जाएँ।
  • पिछले वर्ष जिन मोहल्लों में मामले आए थे वहाँ धूम्रीकरण (फॉगिंग) और लार्वानाशी छिड़काव कराइए।
  • तालाबों, टंकियों और सजावटी जलाशयों में लार्वाभक्षी मछलियाँ छोड़िए।
  • मच्छरदानी और मच्छर प्रतिकर्षी वितरित कराइए अथवा सस्ते उपलब्ध कराइए और पूरी बाँह के कपड़ों को प्रोत्साहित कीजिए।
  • वर्षा आरंभ होते ही विद्यालयों, स्वास्थ्यकर्मियों, रेडियो और पोस्टरों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाइए।
  • स्वास्थ्य केंद्रों से संदिग्ध मामलों की शीघ्र सूचना दिलवाइए, जिससे मामलों का समूह प्रकोप बनने से पहले पकड़ में आ जाए, और चिकित्सालयों में चरम सप्ताहों के लिए सामग्री तथा कर्मी पहले से तैयार रखिए।
रोकथाम ही पहला उपाय क्यों है: डेंगू के विषाणु को नष्ट करने वाली कोई औषधि नहीं है। पूरा बचाव इसी पर टिका है कि मच्छर न पनपे और न काटे — और यह कार्य मई और जून में करना होता है, अगस्त में नहीं।
प्र8.
कल्पना कीजिए कि आप एक विद्यालय के स्वास्थ्य अभियान के प्रभारी हैं। इस भूमिका में आप संचरणीय और असंचरणीय रोगों को कम करने के लिए कौन-कौन से मुख्य संदेश देंगे?
उत्तर

अभियान तभी सफल होता है जब प्रत्येक संदेश छोटा, स्पष्ट और उसी दिन कर पाने योग्य हो। मैं इसे एक ही सूत्र वाक्य के अंतर्गत चलाऊँगा — “स्वच्छ हाथ, स्वच्छ परिवेश, स्वस्थ आदतें” — और संदेशों के दो समूह रखूँगा, क्योंकि दोनों प्रकार के रोग दो भिन्न तरीकों से रुकते हैं।

संचरणीय रोग कम करने के लिएयह संदेश क्यों
भोजन से पहले और शौचालय के बाद साबुन से हाथ धोइएनियमित रूप से हाथ धोने से संक्रमण 50% तक कम हो जाता है
खाँसते-छींकते समय मुँह और नाक ढकिए; भीड़ में मास्क पहनिएवायु का मार्ग रुकता है — सर्दी, फ्लू, खसरा, टीबी
केवल उबला अथवा सुरक्षित जल पीजिए; भली-भाँति पका भोजन खाइएहैजा, आंत्र ज्वर, यकृतशोथ ए, गोल कृमि रुकते हैं
अपनी बोतल, टिफ़िन, तौलिया या रुमाल कभी साझा मत कीजिएअप्रत्यक्ष संपर्क का मार्ग बंद होता है
कहीं भी रुका हुआ जल नहीं — गमले, कूलर, टायर प्रत्येक सप्ताह देखिएमलेरिया और डेंगू के मच्छर का प्रजनन स्थल समाप्त होता है
अस्वस्थ हों तो घर पर रहकर विश्राम कीजिएस्वास्थ्य लाभ होता है और कक्षा सुरक्षित रहती है
सभी टीके समय पर लगवाइएयह आपकी और आपके आस-पास के लोगों की रक्षा करता है
असंचरणीय रोग कम करने के लिएयह संदेश क्यों
प्रतिदिन संतुलित आहार लीजिए — फल, सब्जियाँ और साबुत अनाजअभावजन्य और जीवनशैली जनित, दोनों प्रकार के रोग रुकते हैं
तेल, चीनी और नमक घटाइए; फास्ट फूड कभी-कभार, दिनचर्या नहींपृष्ठ 28 का सूचना पट्ट फास्ट फूड को मधुमेह के प्रमुख कारणों में गिनाता है
प्रतिदिन एक घंटा बाहर खेलिएशारीरिक सक्रियता की कमी को अध्याय मधुमेह के कारणों में गिनाता है
सुबह का अल्पाहार मत छोड़िएविद्यालय के दिन के लिए ऊर्जा मिलती है
समय पर सोइए; सोने से एक घंटा पहले स्क्रीन बंद कीजिएस्क्रीन टाइम स्थूलता, निद्रा विकार और व्यग्रता से जुड़ा है
तंबाकू, मद्य और मादक पदार्थों को पहली ही बार ‘ना’ कहिएएक बार मना कर देना बाद में छोड़ने से कहीं सरल है
मन उदास हो तो किसी से बात कीजिए; प्रतिदिन दस मिनट योग या प्राणायाम कीजिएमानसिक कल्याण स्वास्थ्य का भाग है; योग से व्यग्रता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है

अभियान कैसे चलाऊँगा: विद्यार्थियों द्वारा प्रति सप्ताह अद्यतन किया जाने वाला स्वास्थ्य पट्ट; प्रत्येक कक्षा में हाथ धोने की सही विधि का दो मिनट का प्रदर्शन; प्रत्येक शुक्रवार ‘शुष्क दिवस’ जिसमें हर कक्षा अपने गलियारे और बगीचे में रुका जल देखे; पोस्टर और नुक्कड़ नाटक प्रतियोगिता; प्रश्नों के उत्तर देने के लिए चिकित्सक को आमंत्रण; और एक सरल मासिक गणना — रोग के कारण होने वाली अनुपस्थितियों की — जिससे विद्यालय देख सके कि अभियान काम कर रहा है या नहीं।

संकेत: प्रत्येक संदेश का अंत चेतावनी से नहीं, किसी कार्य से कीजिए। “रविवार को अपना कूलर खाली कीजिए” व्यवहार बदलता है; “डेंगू खतरनाक है” नहीं बदलता।
प्र9.
यह सलाह दी जाती है कि वायरल संक्रमण, जैसे— सर्दी, खाँसी या फ्लू में प्रतिजैविक औषधियाँ न लें। क्या आप इस सलाह के संभावित कारण बता सकते हैं?
उत्तर

क्योंकि प्रतिजैविक औषधियाँ केवल जीवाणु से होने वाले संक्रमणों में प्रभावी हैं, जबकि सर्दी, खाँसी या फ्लू विषाणु से होते हैं। औषधि को रोगी के भीतर ऐसा कुछ मिलता ही नहीं जिस पर वह कार्य कर सके।

ऐसा क्यों होता है: प्रतिजैविक औषधियाँ जीवाणु कोशिकाओं के उन भागों को लक्षित करती हैं जो मानव अथवा अन्य जंतु कोशिकाओं से भिन्न होते हैं — यही उन्हें हमारे लिए सुरक्षित और जीवाणुओं के लिए घातक बनाता है। विषाणु में ऐसा कोई भाग होता ही नहीं। वह स्वयं एक कोशिका भी नहीं है; वह हमारी ही कोशिकाओं के भीतर गुणन करता है। अतः प्रतिजैविक के पास आक्रमण करने के लिए कुछ है ही नहीं, और कोई भी मात्रा इसे बदल नहीं सकती।

फिर भी लेना केवल व्यर्थ नहीं, हानिकारक है—

  • यह उन अच्छे जीवाणुओं को नष्ट कर देती है जो शरीर को संक्रमण से बचाते हैं (चित्र 3.5 ख), जिससे प्रतिरोधी जीवाणुओं को बढ़ने और छा जाने का अवसर मिल जाता है।
  • यह प्रतिजैविक प्रतिरोध बढ़ाती है, जिससे बाद में जब वास्तविक जीवाण्विक संक्रमण हो तब औषधि काम न करे — आपके लिए भी और शेष सबके लिए भी।
  • इसके दुष्प्रभाव हो सकते हैं और यह ‘कुछ तो कर लिया’ का झूठा संतोष देकर उचित देखभाल में विलंब करा देती है।

विषाणु जनित सर्दी या फ्लू का सही उपचार वही है जो अध्याय बताता है — घर पर विश्राम, तरल पदार्थ, और मुँह तथा नाक ढकना। प्रतिरक्षा प्रणाली कुछ दिनों में विषाणु को स्वयं समाप्त कर देती है।

ध्यान दीजिए: यही तर्क बताता है कि मलेरिया में भी प्रतिजैविक से लाभ नहीं होगा — वह प्रोटोजोआ से होता है और अध्याय स्पष्ट कहता है कि प्रतिजैविक औषधियाँ प्रोटोजोआ से होने वाले रोगों में प्रभावी नहीं हैं।
प्र10.
किसी संक्रमित व्यक्ति के उत्सर्जी पदार्थ द्वारा पेयजल के संदूषित होने पर निम्नलिखित में से कौन-कौन से रोग फैल सकते हैं? यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए, क्षयरोग (टीबी), पोलियोमाइलाइटिस, हैजा, चेचक
उत्तर

यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए, पोलियोमाइलाइटिस और हैजा।

रोगदूषित पेयजल से फैलता है?कारण
यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) एहाँजल और भोजन जनित विषाणु; तालिका 3.1 में इसका निवारक उपाय उबला हुआ पानी पीना बताया गया है
क्षयरोग (टीबी)नहींफेफड़ों का जीवाण्विक रोग, जो संक्रमित व्यक्ति की खाँसी से वायु द्वारा फैलता है
पोलियोमाइलाइटिसहाँपोलियो का विषाणु उत्सर्जी पदार्थ के साथ शरीर से बाहर आता है और दूषित जल अथवा भोजन से नए व्यक्ति में प्रवेश करता है
हैजाहाँआंत्र का जीवाण्विक रोग; तालिका 3.1 में इसकी रोकथाम उबले पेयजल और स्वच्छता संबंधी अच्छी आदतों से बताई गई है
चेचकनहींश्वसन तंत्र और त्वचा का विषाणु जनित रोग, जो वायु द्वारा तथा फफोलों के संपर्क से फैलता है
ऐसा क्यों होता है: इस मार्ग से फैलने के लिए रोगजनक को उत्सर्जी पदार्थ के साथ शरीर से बाहर निकलना और जल में जीवित रहना — दोनों आना चाहिए। यकृतशोथ ए, पोलियो और हैजा — तीनों पाचन तंत्र को संक्रमित करते हैं अथवा उसी से बाहर निकलते हैं। क्षय रोग फेफड़ों में रहता है और चेचक श्वास मार्ग तथा त्वचा में, अतः वे जल तक पहुँचते ही नहीं।
क्या आप जानते हैं? क्रियाकलाप 3.6 का भद्रक स्वच्छता अभियान ठीक इन्हीं तीन रोगों पर कार्य कर रहा था। शौचालय बनाने और उपयोग करने से उत्सर्जी पदार्थ जल तक नहीं पहुँचता — इसीलिए एक ही अभियान से अनेक भिन्न रोग एक साथ घट गए।
प्र11.
जब हमारा शरीर किसी रोगजनक (रोगाणु) का पहली बार सामना करता है तो हमारी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया सामान्यतः कम होती है परंतु जब उसी रोगजनक से पुन: सामना होता है तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पहली बार की तुलना में कहीं अधिक प्रबल होती है। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर

क्योंकि पहली मुठभेड़ के बाद प्रतिरक्षा प्रणाली उस रोगजनक को स्मरण रखती है। दूसरी अनुक्रिया नए सिरे से नहीं, प्रशिक्षित अवस्था से आरंभ होती है।

पहला सामनाउसी रोगजनक से दूसरा सामना
पहचानरोगजनक अपरिचित है; प्रतिरक्षा प्रणाली को पहले उसे पहचानना पड़ता हैपिछली बार से बची हुई कोशिकाएँ उसे तुरंत पहचान लेती हैं
गतिधीमी — विशिष्ट रक्षा तैयार होने में कई दिन लगते हैंतीव्र — रक्षा लगभग तुरंत आरंभ हो जाती है
अनुक्रिया का परिमाणकमकहीं अधिक
परिणामरक्षा तैयार होते-होते व्यक्ति प्रायः रोगग्रस्त हो जाता हैरोगजनक इतना गुणन कर पाने से पहले ही नष्ट हो जाता है कि रोग उत्पन्न कर सके
ऐसा क्यों होता है: पहले संक्रमण के समय प्रतिरक्षा प्रणाली उसी एक रोगजनक के लिए विशिष्ट रक्षा तैयार करती है और उनमें से कुछ कोशिकाओं को बाद के लिए सुरक्षित रख लेती है। वही रोगजनक लौटने पर ये कोशिकाएँ उसे तत्काल पहचानकर गुणन करती हैं, अतः पूरी अनुक्रिया दिनों के स्थान पर घंटों में तैयार हो जाती है। अध्याय इसे उपार्जित प्रतिरक्षा कहता है — वह सुरक्षा जो किसी रोगाणु या टीके के संपर्क में आने के पश्चात विकसित होती है।

टीकाकरण का पूरा सिद्धांत यही है। टीका प्रतिरक्षा प्रणाली को एक सुरक्षित ‘पहला सामना’ करा देता है — क्षीणीकृत अथवा मृत रोगाणुओं से, या रोगाणु के निष्क्रिय अथवा हानिरहित भाग से — जिससे यह स्मृति रोग हुए बिना बन जाती है। जब वास्तविक रोगजनक आता है तो शरीर उसे दूसरा सामना मानकर शीघ्र परास्त कर देता है।

क्या आप जानते हैं? इसी कारण छोटी माता या खसरा प्रायः जीवन में एक ही बार होता है, जबकि सर्दी-जुकाम अनेक बार — सर्दी के विषाणु सैकड़ों प्रकार के होते हैं और एक को स्मरण रखने से अगले के विरुद्ध सहायता नहीं मिलती।
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