कुतूहल अध्याय 4 क्रियाकलाप 4.3

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
चित्र 4.3 (ग) में दर्शाए अनुसार कुंडली के दोनों सिरे सेल के सिरों से संयोजित कीजिए और चुंबकीय दिक्सूचकों का अवलोकन कीजिए। क्या आप दिक्सूचकों की सुइयों में कोई विक्षेपण देखते हैं?
उत्तर

हाँ। कुंडली को सेल से जोड़ते ही दोनों दिक्सूचकों की सुइयाँ विक्षेपित हो जाती हैं — यद्यपि कुंडली केवल कागज के बेलन पर लपेटी है और उसमें लोहा है ही नहीं।

ऐसा क्यों होता है: अब कुंडली धारावाही है, अतः वह चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। 50 फेरों में से प्रत्येक अपना क्षेत्र देता है और सभी फेरे एक ही दिशा में लपेटे होने के कारण ये क्षेत्र बेलन के अक्ष के अनुदिश जुड़ जाते हैं। परिणामी क्षेत्र इतना प्रबल होता है कि दोनों सिरों पर रखी सुइयाँ घूम जाएँ। कागज का बेलन इसमें कोई भूमिका नहीं निभाता — वह केवल कुंडली का आकार बनाए रखने का आधार है।
स्वयं जाँचिए: दोनों सुइयाँ विपरीत दिशाओं में घूमती हैं क्योंकि वे कुंडली के दो भिन्न सिरों के सामने हैं। यही पहला संकेत है कि छड़ चुंबक की भाँति कुंडली के भी दो विपरीत प्रकार के सिरे होते हैं।
प्र2.
सेल से तार को वियोजित कीजिए। देखिए कि क्या दिक्सूचकों की सुइयाँ अपनी प्रारंभिक स्थितियों में वापस आ जाती हैं?
उत्तर

हाँ। दोनों सुइयाँ घूमकर पुनः उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहर जाती हैं।

ऐसा क्यों होता है: सेल वियोजित होने पर धारा नहीं रहती, अतः कुंडली कोई चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न नहीं करती। सुइयों पर केवल पृथ्वी का चुंबकत्व शेष रह जाता है और पृथ्वी के क्षेत्र में स्वतंत्र सुई उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरती है। कुंडली केवल तभी तक चुंबक रहती है जब तक धारा प्रवाहित होती है।
प्र3.
कागज के बेलन के अंदर एक कील प्रविष्ट कीजिए (चित्र 4.3, घ) और उपरोक्त चरणों को दोहराइए। क्या दिक्सूचक सुइयों के विक्षेपण में कोई अंतर आता है?
उत्तर

हाँ — कील प्रविष्ट करने पर विक्षेपण पहले की तुलना में बहुत अधिक होता है, जबकि सेल और कुंडली वही के वही हैं।

कुंडली के भीतर क्रोडदिक्सूचक सुइयों का विक्षेपणक्या क्लिपें थाम सकती है?
कुछ नहीं (केवल कागज का बेलन)कमनहीं, अथवा नाममात्र
लोहे की कीलबहुत अधिकहाँ
लोहा इतना अंतर क्यों लाता है: लोहा चुंबकीय पदार्थ है। कुंडली के चुंबकीय क्षेत्र के भीतर रखी कील स्वयं चुंबक बन जाती है और उसका चुंबकत्व कुंडली के पहले से उत्पन्न क्षेत्र में जुड़ जाता है। इस प्रकार कुल क्षेत्र अकेली कुंडली की तुलना में कहीं अधिक प्रबल हो जाता है — इसीलिए व्यावहारिक अनुप्रयोगों हेतु अधिकांश विद्युत-चुंबकों में लौह क्रोड लगाया जाता है।
केवल कुंडली कम विक्षेपण लोहे की कील सहित कुंडली कहीं अधिक विक्षेपण कुंडली का प्रत्येक फेरा अपना क्षेत्र उत्पन्न करता है। सभी फेरे एक ही दिशा में होने से ये क्षेत्र कुंडली के भीतर जुड़ जाते हैं। इस क्षेत्र से चुंबकित हुआ लौह क्रोड अपना चुंबकत्व भी इसमें जोड़ देता है।
विद्युत-चुंबक प्रबल क्यों होता है — अनेक फेरों के क्षेत्रों का जुड़ना, और साथ में स्वयं चुंबक बन गया लौह क्रोड।
प्र4.
कील के दोनों सिरों के समीप लोहे से बनी कुछ कागज-क्लिपें रखिए। क्या क्लिपें कील के सिरों की ओर आकर्षित होती हैं?
उत्तर

हाँ। क्लिपें कील के दोनों सिरों की ओर खिंचती हैं और धारा प्रवाहित रहने तक वहीं लटकी रहती हैं (चित्र 4.3, ङ)। धारा रोकते ही वे गिर जाती हैं।

वे सिरों पर ही क्यों एकत्र होती हैं: लौह क्रोड सहित कुंडली अब चुंबक की भाँति व्यवहार कर रही है, और किसी भी चुंबक में चुंबकीय प्रभाव दोनों ध्रुवों पर सर्वाधिक प्रबल होता है। कुंडली से लिपटा कील का मध्य भाग बहुत कम आकर्षण करता है। इसलिए क्लिपें वहीं एकत्र होती हैं जहाँ खिंचाव सबसे अधिक है — सिरों पर।
यह कीजिए: प्रत्येक सिरे पर लटकी क्लिपों की गिनती कीजिए। फिर एक और सेल जोड़कर पुनः गिनिए। आपने अभी-अभी मोटे तौर पर यह माप लिया कि विद्युत-चुंबक की प्रबलता धारा पर किस प्रकार निर्भर करती है।
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