प्र1.
चित्र 4.3 (ग) में दर्शाए अनुसार कुंडली के दोनों सिरे सेल के सिरों से संयोजित कीजिए और चुंबकीय दिक्सूचकों का अवलोकन कीजिए। क्या आप दिक्सूचकों की सुइयों में कोई विक्षेपण देखते हैं?
उत्तर
हाँ। कुंडली को सेल से जोड़ते ही दोनों दिक्सूचकों की सुइयाँ विक्षेपित हो जाती हैं — यद्यपि कुंडली केवल कागज के बेलन पर लपेटी है और उसमें लोहा है ही नहीं।
ऐसा क्यों होता है: अब कुंडली धारावाही है, अतः वह चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। 50 फेरों में से प्रत्येक अपना क्षेत्र देता है और सभी फेरे एक ही दिशा में लपेटे होने के कारण ये क्षेत्र बेलन के अक्ष के अनुदिश जुड़ जाते हैं। परिणामी क्षेत्र इतना प्रबल होता है कि दोनों सिरों पर रखी सुइयाँ घूम जाएँ। कागज का बेलन इसमें कोई भूमिका नहीं निभाता — वह केवल कुंडली का आकार बनाए रखने का आधार है।
स्वयं जाँचिए: दोनों सुइयाँ विपरीत दिशाओं में घूमती हैं क्योंकि वे कुंडली के दो भिन्न सिरों के सामने हैं। यही पहला संकेत है कि छड़ चुंबक की भाँति कुंडली के भी दो विपरीत प्रकार के सिरे होते हैं।