कुतूहल अध्याय 5 खोजबीन और विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
समतल भूमि की तुलना में पहाड़ी पर चढ़ते समय साइकिल चलाना अपेक्षाकृत अधिक कठिन क्यों लगता है?
उत्तर

क्योंकि ढलान पर चढ़ते समय आपको पृथ्वी के खिंचाव के विरुद्ध पैडल मारने पड़ते हैं, जबकि समतल भूमि पर ऐसा नहीं होता।

समतल सड़क पर पृथ्वी साइकिल और आपको सीधे नीचे, सड़क की ओर खींचती है। यह खिंचाव आपकी आगे की गति का विरोध नहीं करता — वहाँ आपके पेशीय बल को केवल सड़क और पहियों का घर्षण तथा वायु का घर्षण बल ही पार करना होता है। पहाड़ी पर पैडल का प्रत्येक चक्कर आपको और साइकिल को थोड़ा और ऊँचा उठाता है, अत: अब आपके पेशीय बल को गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध भी कार्य करना पड़ता है। उसी चाल के लिए पैडल पर कहीं अधिक बड़ा अपकर्षण चाहिए — यही कठिन लगता है।

ऐसा क्यों होता है: किसी वस्तु को गति देने के लिए बल आवश्यक है। ढलान जितनी तीव्र होगी, पृथ्वी के खिंचाव का उतना ही बड़ा भाग ढलान के साथ पीछे की ओर कार्य करके आपका विरोध करेगा। साथ ही पहाड़ी सड़कें प्राय: ऊबड़-खाबड़ होती हैं, जहाँ घर्षण भी अधिक होता है।
स्वयं जाँचिए: कहानी का अगला भाग देखिए। ढलान से नीचे उतरते समय दोनों पैडल मारना बंद कर देती हैं फिर भी साइकिलें तीव्र गति से नीचे आती हैं। जो गुरुत्वाकर्षण बल चढ़ाई पर विरोध कर रहा था, वही अब गति की दिशा में कार्य कर रहा है, अत: पेशीय बल की आवश्यकता ही नहीं रहती।
प्र2.
सूखी सतह की तुलना में गीली सतह पर फिसलना अधिक सरल क्यों होता है?
उत्तर

क्योंकि जल दोनों सतहों की सूक्ष्म अनियमितताओं को भर देता है और उन्हें थोड़ा अलग रखता है, जिससे पैर और फर्श के बीच का घर्षण बल बहुत कम हो जाता है

जो फर्श देखने में पूर्णत: चिकना लगता है उसमें भी बड़ी संख्या में सूक्ष्म उभार और गड्ढे होते हैं (चित्र 5.6), और यही आपके जूते के तले में भी होते हैं। जब दोनों दबकर संपर्क में आते हैं तो ये अनियमितताएँ एक-दूसरे के पाश में फँस जाती हैं और फिसलने का विरोध करती हैं — यही विरोध घर्षण है और यही चलते समय पैर की पकड़ बनाता है। जल की एक पतली परत गड्ढों को भर देती है और दोनों सतहों को अलग-अलग रखती है। अब अनियमितताएँ आपस में फँस नहीं पातीं, घर्षण तेजी से घट जाता है, पैर पकड़ बनाने के स्थान पर फिसल जाता है और आप गिर पड़ते हैं।

क्या आप जानते हैं? इसीलिए स्नानघर की टाइलें खुरदरी और खाँचेदार बनाई जाती हैं तथा टायरों पर गहरे खाँचे काटे जाते हैं — इन खाँचों से जल निकल जाता है और उभरे भाग सड़क को स्पर्श करके घर्षण बनाए रखते हैं।
प्र3.
जब हमारा झूला अपने दोलन के उच्चतम बिंदु पर पहुँचकर नीचे की ओर आने लगता है तो हमें ‘हल्केपन’ की या ‘तैरने’ जैसी अनुभूति क्यों होती है?
उत्तर

क्योंकि उस क्षण आप और झूले की सीट एक साथ नीचे गिर रहे होते हैं, अत: सीट आपको पहले जितने प्रबल बल से ऊपर की ओर नहीं धकेल पाती — और वास्तव में हमें अनुभव सीट के इसी अपकर्षण का होता है, पृथ्वी के खिंचाव का नहीं।

झूले पर स्थिर बैठे रहने पर पृथ्वी आपको नीचे की ओर खींचती है और सीट उतने ही बल से आपको ऊपर की ओर धकेलती है; दोनों बल एक-दूसरे को संतुलित करते हैं और आपको सीट के माध्यम से अपना सामान्य भार अनुभव होता है। उच्चतम बिंदु पर झूला क्षण भर के लिए रुकता है और फिर नीचे आने लगता है। नीचे आते समय सीट आपके नीचे से हटती जाती है और उसका ऊपर की ओर अपकर्षण बहुत कम हो जाता है। नीचे से कम अपकर्षण ही हल्केपन के रूप में अनुभव होता है — ठीक वैसे ही जैसे नीचे जाती हुई लिफ़्ट के आरंभ में लगता है।

ध्यान दीजिए, क्या नहीं बदला: आपका द्रव्यमान वही है और पृथ्वी का आप पर खिंचाव (आपका भार) भी वही है। केवल सीट का संपर्क बल बदला है। हल्का अनुभव होना और भार का कम हो जाना दो अलग बातें हैं।
प्र4.
अपने प्रश्नों को साझा कीजिए
उत्तर

ऐसे प्रश्न बनाइए जो क्यों, कैसे, यदि ऐसा हो तो या कहाँ से आरंभ होते हों — ऐसे प्रश्न जिनके उत्तर में किसी बल का नाम और उसकी दिशा बतानी पड़े। इन्हें अपनी अभ्यास पुस्तिका में लिखिए और कक्षा में साझा कीजिए।

नमूना प्रश्न:

  • हवा साइकिल के पहियों को स्पर्श नहीं करती, फिर भी हवा के विरुद्ध चलते समय पैडल अधिक जोर से क्यों मारने पड़ते हैं?
  • यदि घर्षण सदैव गति को धीमा ही करता है तो हम चल कैसे पाते हैं?
  • किसी ऊँचे पर्वत की चोटी पर उसी वस्तु को तौलने पर कमानीदार तुला का पाठ्यांक क्या बदलेगा?
  • चुंबक लोहे की कील को बिना स्पर्श किए खींच लेता है। क्या कील भी चुंबक को खींचती है?
  • लोहे का विशाल जहाज तैरता है परंतु लोहे की छोटी-सी कील डूब जाती है — ऐसा क्यों?
संकेत: इस अध्याय के सर्वोत्तम प्रश्न वे हैं जिनका परीक्षण किया जा सके। ऊपर दिए पाँच में से दो प्रश्नों की जाँच आप कमानीदार तुला, एक चुंबक और जल से भरी बाल्टी की सहायता से अपनी कक्षा में ही कर सकते हैं।
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