(i) (घ) सभी पात्रों में समान • (ii) (ग) ‘क’ चिपक जाएगा परंतु ‘ख’ नहीं चिपकेगा • (iii) (क) ऊँचाई H को बढ़ा दिया जाए • (iv) (ख) Pक = Pख, Fक < Fख
(i) चित्र 6.21 में तीनों पात्र ‘क’, ‘ख’ और ‘ग’ भिन्न आकृति एवं चौड़ाई के हैं, परंतु तल के पास नलिकाओं द्वारा एक-दूसरे से जुड़े हैं। अत: ‘ग’ में डाला गया जल तीनों में फैल जाता है। द्रव का दाब केवल स्तंभ की ऊँचाई पर निर्भर करता है, इसलिए जल विराम में तभी रह सकता है जब सर्वत्र स्तंभ की ऊँचाई समान हो — यदि किसी पात्र में स्तंभ ऊँचा होता तो उसका अधिक दाब जल को जोड़ने वाली नलिका से दूसरे पात्रों में धकेल देता। अत: पात्रों की आकृति या चौड़ाई कुछ भी हो, जलस्तर तीनों में समान ही रहेगा।
(ii) चूषक इसलिए चिपकता है कि दबाने पर कप के नीचे की वायु निकल जाती है, भीतर का दाब बाहर के वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है और बाहर की वायु उसे दबाए रखती है। समतल चिकने पृष्ठ पर किनारा भली-भाँति बैठ जाता है, वायु भीतर नहीं आ पाती और चूषक ‘क’ चिपक जाता है। खुरदरे पृष्ठ पर किनारे के नीचे के सूक्ष्म अंतरालों से वायु निरंतर भीतर आती रहती है, भीतर का दाब कम बना ही नहीं रहता, दाब अंतर नहीं बनता और चूषक ‘ख’ गिर जाता है।
(iii) किसी नल पर दाब उसके ऊपर के जल स्तंभ की ऊँचाई पर निर्भर करता है। टंकी ऊँची करने से यह स्तंभ ऊँचा हो जाता है, अत: भूतल पर दाब बढ़ जाता है। विकल्प (ग) और (घ) केवल जल की मात्रा बदलते हैं, ऊँचाई नहीं — और जल की मात्रा से दाब पर कोई अंतर नहीं पड़ता, जैसा क्रियाकलाप 6.1 में चौड़े और संकरे पाइप से सिद्ध हुआ था।
(iv) दोनों पात्रों में जल समान स्तर तक है, अत: जल स्तंभ की ऊँचाई समान है और तल पर दाब भी समान है: Pक = Pख। परंतु पात्र ‘ख’ अधिक चौड़ा है, अत: उसके तल का क्षेत्रफल अधिक है। बल = दाब × क्षेत्रफल होने के कारण समान दाब अधिक क्षेत्रफल पर अधिक बल देगा।
बल = दाब × क्षेत्रफल, तथा क्षेत्रफलख > क्षेत्रफलक
→ Fक < Fख