कुतूहल अध्याय 6 जिज्ञासा बनाए रखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
सही विकल्प का चयन कीजिए। (i) चित्र 6.21 को ध्यानपूर्वक देखिए। पात्र ‘ग’ में जल भरा जा रहा है। जल भरने की प्रक्रिया रोकने पर पात्रों में जलस्तर होगा — (क) पात्र ‘क’ में उच्चतम (ख) पात्र ‘ख’ में उच्चतम (ग) पात्र ‘ग’ में उच्चतम (घ) सभी पात्रों में समान। (ii) एक रबर चूषक ‘क’ को एक समतल चिकने पृष्ठ पर एवं समान चूषक ‘ख’ को खुरदरे पृष्ठ पर दबाया गया। (क) ‘क’ और ‘ख’ दोनों ही अपने पृष्ठ से चिपक जाएँगे। (ख) ‘क’ और ‘ख’ दोनों अपने पृष्ठ से नहीं चिपकेंगे। (ग) ‘क’ चिपक जाएगा परंतु ‘ख’ नहीं चिपकेगा। (घ) ‘क’ नहीं चिपकेगा परंतु ‘ख’ चिपक जाएगा। (iii) किसी भवन की छत पर एक जल की टंकी को H ऊँचाई पर रखा जाता है। भूतल पर जल को अधिक दाब से प्राप्त करने के लिए हमें करना होगा— (क) जहाँ टंकी रखी है, उस ऊँचाई H को बढ़ा दिया जाए। (ख) जहाँ टंकी रखी है उस स्थान की ऊँचाई H को कम कर दिया जाए। (ग) टंकी को समान ऊँचाई वाली दूसरी टंकी जिसमें अधिक जल आ सके, से परिवर्तित कर दिया जाए। (घ) टंकी को समान ऊँचाई की दूसरी टंकी जिसमें कम जल आ सके, से परिवर्तित कर दिया जाए। (iv) दर्शाए गए चित्र 6.22 में दो पात्र ‘क’ और ‘ख’ में समान स्तर तक जल भरा गया। दोनों पात्रों में लगने वाले दाब क्रमश: P और P तथा बल क्रमश: F और F में संबंध होगा। (क) P = P, F = F (ख) P = P, F < F (ग) P < P, F = F (घ) P > P, F > F
उत्तर

(i) (घ) सभी पात्रों में समान  •  (ii) (ग) ‘क’ चिपक जाएगा परंतु ‘ख’ नहीं चिपकेगा  •  (iii) (क) ऊँचाई H को बढ़ा दिया जाए  •  (iv) (ख) P = P, F < F

(i) चित्र 6.21 में तीनों पात्र ‘क’, ‘ख’ और ‘ग’ भिन्न आकृति एवं चौड़ाई के हैं, परंतु तल के पास नलिकाओं द्वारा एक-दूसरे से जुड़े हैं। अत: ‘ग’ में डाला गया जल तीनों में फैल जाता है। द्रव का दाब केवल स्तंभ की ऊँचाई पर निर्भर करता है, इसलिए जल विराम में तभी रह सकता है जब सर्वत्र स्तंभ की ऊँचाई समान हो — यदि किसी पात्र में स्तंभ ऊँचा होता तो उसका अधिक दाब जल को जोड़ने वाली नलिका से दूसरे पात्रों में धकेल देता। अत: पात्रों की आकृति या चौड़ाई कुछ भी हो, जलस्तर तीनों में समान ही रहेगा।

(ii) चूषक इसलिए चिपकता है कि दबाने पर कप के नीचे की वायु निकल जाती है, भीतर का दाब बाहर के वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है और बाहर की वायु उसे दबाए रखती है। समतल चिकने पृष्ठ पर किनारा भली-भाँति बैठ जाता है, वायु भीतर नहीं आ पाती और चूषक ‘क’ चिपक जाता है। खुरदरे पृष्ठ पर किनारे के नीचे के सूक्ष्म अंतरालों से वायु निरंतर भीतर आती रहती है, भीतर का दाब कम बना ही नहीं रहता, दाब अंतर नहीं बनता और चूषक ‘ख’ गिर जाता है।

(iii) किसी नल पर दाब उसके ऊपर के जल स्तंभ की ऊँचाई पर निर्भर करता है। टंकी ऊँची करने से यह स्तंभ ऊँचा हो जाता है, अत: भूतल पर दाब बढ़ जाता है। विकल्प (ग) और (घ) केवल जल की मात्रा बदलते हैं, ऊँचाई नहीं — और जल की मात्रा से दाब पर कोई अंतर नहीं पड़ता, जैसा क्रियाकलाप 6.1 में चौड़े और संकरे पाइप से सिद्ध हुआ था।

(iv) दोनों पात्रों में जल समान स्तर तक है, अत: जल स्तंभ की ऊँचाई समान है और तल पर दाब भी समान है: P = P। परंतु पात्र ‘ख’ अधिक चौड़ा है, अत: उसके तल का क्षेत्रफल अधिक है। बल = दाब × क्षेत्रफल होने के कारण समान दाब अधिक क्षेत्रफल पर अधिक बल देगा।

P = P   (समान ऊँचाई के जल स्तंभ)
बल = दाब × क्षेत्रफल, तथा क्षेत्रफल > क्षेत्रफल
F < F
प्र2.
बताइए निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य — (i) वायु उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहती है। (ii) द्रव केवल पात्र के तल पर दाब डालते हैं। (iii) चक्रवात अक्षि में मौसम झंझावाती होता है। (iv) तड़ितझंझा के समय हम कार में सुरक्षित रहते हैं।
उत्तर

(i) सत्य  •  (ii) असत्य  •  (iii) असत्य  •  (iv) सत्य

कथनसत्य / असत्यकारण
(i) वायु उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहती है।सत्ययही क्रियाकलाप 6.5 का निष्कर्ष है। वायु फूले हुए गुब्बारे से बिना फूले गुब्बारे में गई और दोनों के दाब समान होते ही रुक गई। पवन इसी प्रवाह का विशाल रूप है।
(ii) द्रव केवल पात्र के तल पर दाब डालते हैं।असत्यक्रियाकलाप 6.2 में जल बोतल की पार्श्व दीवार के छिद्रों से बाहर निकलता है। द्रव तल के साथ-साथ दीवारों पर भी — वस्तुत: सभी दिशाओं में — दाब डालते हैं।
(iii) चक्रवात अक्षि में मौसम झंझावाती होता है।असत्यअक्षि केंद्र में अत्यधिक निम्न दाब का क्षेत्र है और वहाँ वायु शांत रहती है। तीव्र वायु और भारी वर्षा अक्षि के आस-पास के क्षेत्र में होती है।
(iv) तड़ितझंझा के समय हम कार में सुरक्षित रहते हैं।सत्यपुस्तक के अनुसार तड़ित के समय यदि आप बस या कार में सवार हैं तो आप अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित हैं। धातु की बॉडी आवेश को भीतर बैठे व्यक्तियों के स्थान पर अपने चारों ओर से ले जाती है।
प्र3.
चित्र 6.23 (क) में रेतीली सतह पर एक लड़के को क्षैतिज रूप से लेटा हुआ दर्शाया गया है और चित्र 6.23 (ख) में लड़के को ऊर्ध्वाधर खड़ा हुआ दर्शाया है। किस स्थिति में लड़का रेत के अंदर अधिक धँसेगा? कारण दीजिए।
उत्तर

ऊर्ध्वाधर खड़े होने पर लड़का रेत में अधिक धँसेगा (चित्र 6.23 ख)।

दोनों चित्रों में उसका भार बिल्कुल समान है — लेटने से कोई हल्का नहीं हो जाता। जो बदलता है वह है उस भार को सँभालने वाली रेत का क्षेत्रफल। खड़े होने पर वह केवल अपने दोनों पैरों के तलवों से रेत को छूता है, जो बहुत कम क्षेत्रफल है। लेटने पर उसकी पीठ, टाँगें, भुजाएँ और सिर सब रेत पर टिकते हैं, जो कई गुना अधिक क्षेत्रफल है। दाब बल में क्षेत्रफल का भाग देने पर मिलता है, अत: खड़े होने पर रेत पर दाब कहीं अधिक होता है, और ढीली रेत के कण अधिक दाब पर खिसक जाते हैं — इसलिए वह अधिक धँसता है।

लड़के का भार = दोनों स्थितियों में समान
खड़े होने पर: कम संपर्क क्षेत्रफल → अधिक दाबअधिक धँसेगा
लेटने पर: अधिक संपर्क क्षेत्रफल → कम दाब → कम धँसेगा
स्वयं जाँचिए: इसी कारण ढीली रेत या दलदली भूमि पार करते समय चलने के स्थान पर रेंगने या लेटने की सलाह दी जाती है, और ऊँट के पैर रेगिस्तान की रेत पर चलने के लिए चौड़े एवं गद्देदार होते हैं।
प्र4.
एक हाथी अपने चारों पैरों पर खड़ा है। यदि एक पैर द्वारा घेरे जाने वाला क्षेत्रफल 0.25 m2 है और हाथी का भार 20000 N है तो हाथी द्वारा स्थल पर आरोपित दाब की गणना कीजिए।
उत्तर

हाथी स्थल पर 20000 N/m2, अर्थात् 20000 Pa का दाब आरोपित करता है।

हाथी चारों पैरों पर खड़ा है, अत: उसका पूरा भार चारों पैरों के कुल क्षेत्रफल पर बँटता है। पहले कुल क्षेत्रफल निकालिए, फिर भार में उसका भाग दीजिए।

कुल क्षेत्रफल = 4 × 0.25 m2 = 1 m2
भार (बल) = 20000 N
दाब = बल / क्षेत्रफल = 20000 N ÷ 1 m2
= 20000 N/m2 = 20000 Pa
पैरों की संख्या क्यों महत्त्वपूर्ण है: यदि हाथी एक पैर उठा ले और तीन पैरों पर खड़ा हो तो क्षेत्रफल घटकर 0.75 m2 रह जाएगा और दाब बढ़कर लगभग 26667 Pa हो जाएगा। भार तनिक भी नहीं बदला — केवल वह क्षेत्रफल बदला जिस पर वह कार्य करता है।
प्र5.
‘क’ और ‘ख’ दो नाव हैं। नाव ‘क’ के आधार का क्षेत्रफल 7 m2 है और उसमें 5 लोग बैठे हैं। नाव ‘ख’ के आधार का क्षेत्रफल 3.5 m2 है और उसमें 3 लोग बैठे हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति का भार 700 N है तो पता लगाएँ कि किस नाव के आधार पर अधिक दाब लगेगा और कितना?
उत्तर

नाव ‘ख’ के आधार पर अधिक दाब लगेगा — 100 N/m2 (100 Pa) अधिक।

प्रत्येक नाव के लिए पहले उसमें बैठे लोगों का कुल भार जोड़िए, फिर आधार के क्षेत्रफल का भाग दीजिए।

नाव ‘क’
बल = 5 × 700 N = 3500 N
क्षेत्रफल = 7 m2
दाब = 3500 ÷ 7 = 500 N/m2

नाव ‘ख’
बल = 3 × 700 N = 2100 N
क्षेत्रफल = 3.5 m2
दाब = 2100 ÷ 3.5 = 600 N/m2

अंतर = 600 − 500 = 100 N/m2

ध्यान दीजिए कि नाव ‘क’ पर भार अधिक है — 3500 N बनाम 2100 N — फिर भी दाब उस पर कम है। उसका आधार दोगुना चौड़ा है, अत: वही भार दोगुने क्षेत्रफल पर फैल जाता है।

संकेत: दाब के प्रश्न केवल बलों की तुलना से कभी हल नहीं होते। सदैव प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल की तुलना कीजिए। यहाँ प्रश्न के अनुसार केवल व्यक्तियों का भार लिया गया है।
प्र6.
यदि वायु और बादल दोनों विद्युत के सुचालक होते तो क्या तड़ित उत्पन्न होती? अपने उत्तर का कारण दीजिए।
उत्तर

नहीं, तड़ित उत्पन्न नहीं होती। तड़ित के लिए आवश्यक है कि वायु विद्युतरोधी हो और बादल पृथक हुए आवेशों को रोके रख सके।

तड़ित तीन चरणों में बनती है। पहले, ऊर्ध्वगामी और अधोगामी तीव्र पवन हिम कणों और जल की बूँदों में घर्षण उत्पन्न कर बादल को आवेशित कर देती है। दूसरे, आवेशों का पृथक्करण और संचय होता है — हल्के धनावेशित हिम कण बादल के ऊपरी भाग में और भारी ऋणावेशित जल की बूँदें निचले भाग में जमा हो जाती हैं, और बादल का ऋणावेशित निचला भाग नीचे की भूमि को धनावेशित कर देता है। तीसरे, जब संचित आवेश बहुत अधिक हो जाता है तो वायु का विद्युतरोधी गुण समाप्त हो जाता है और आवेशों का आकस्मिक प्रवाह क्षणदीप्त प्रकाश उत्पन्न करता है।

अब पदार्थ बदलकर देखिए। यदि बादल सुचालक होते तो धन और ऋण आवेश उसके भीतर पृथक रह ही नहीं सकते; वे बनते ही एक-दूसरे को उदासीन कर देते, अत: कभी बड़ी मात्रा में आवेश संचित होता ही नहीं। यदि वायु सुचालक होती तो आवेश निरंतर आस-पास की वायु और भूमि में रिसता रहता, वह संचित होकर वायु के अचानक टूटने की प्रतीक्षा नहीं करता। दोनों ही स्थितियों में न बड़ा संचय होता और न आकस्मिक विसर्जन — और तड़ित तो वही आकस्मिक विसर्जन है।

ऐसा क्यों होता है: किसी स्फुलिंग के लिए आवेश का भंडार और एक ऐसी बाधा चाहिए जो अचानक टूटे। सुचालक स्थायी रूप से सरल मार्ग दे देते हैं, अत: आवेश कभी संचित ही नहीं होता और बाधा बनती ही नहीं। तड़ित चालक ठीक इसी सिद्धांत का उपयोग करता है — वह जान-बूझकर सरल चालक मार्ग देता है ताकि आवेश भवन पर प्रहार करने के स्थान पर चुपचाप भूमि में चला जाए।
प्र7.
यदि बोतल में जल एक निश्चित ऊँचाई तक भर दिया जाए तो दर्शाए गए चित्र 6.24 के अनुसार दो समान गुब्बारों ‘क’ और ‘ख’ का क्या होगा? क्या दोनों गुब्बारे फूलेंगे? यदि हाँ, तो क्या वे समान रूप से फूलेंगे? अपने उत्तर को समझाइए।
उत्तर

हाँ, दोनों गुब्बारे फूलेंगे — और समान रूप से फूलेंगे।

चित्र 6.24 में दोनों गुब्बारे बोतल के तल के समीप लगी छोटी पार्श्व नलिकाओं पर बँधे हैं, और दोनों नलिकाएँ तल से समान ऊँचाई पर हैं। कीप से जल डालने पर वह बोतल को भरता है और दोनों पार्श्व नलिकाओं में भी जाता है।

जल अपने पात्र की दीवारों पर सभी दिशाओं में दाब डालता है, अत: वह प्रत्येक पार्श्व नलिका में बाहर की ओर दाब डालकर रबड़ को फैला देता है — इसी कारण दोनों गुब्बारे फूलते हैं। कितना फूलेंगे, यह नलिका के मुख पर लगने वाले दाब से तय होता है, और वह दाब केवल उसके ऊपर खड़े जल स्तंभ की ऊँचाई पर निर्भर करता है। दोनों नलिकाएँ समान ऊँचाई पर हैं, अत: दोनों के ऊपर स्तंभ समान है, दोनों पर दाब समान है, और दोनों समान गुब्बारे समान रूप से फैलते हैं।

दोनों नलिकाएँ बोतल में समान ऊँचाई पर
→ दोनों के ऊपर जल स्तंभ की ऊँचाई समान
→ दोनों मुखों पर समान द्रव दाब
→ समान गुब्बारे समान रूप से फूलेंगे
ऊँचाई ही क्यों, मात्रा क्यों नहीं: क्रियाकलाप 6.1 में यही बात चौड़े और संकरे पाइप से सिद्ध हुई थी। समान ऊँचाई के जल स्तंभों ने समान फैलाव दिया, यद्यपि दोनों पाइपों में जल की मात्रा बहुत भिन्न थी। यहाँ भी बोतल में और जल डालिए तो दोनों गुब्बारे और फूलेंगे, फिर भी समान रूप से, क्योंकि दोनों के ऊपर स्तंभ समान रूप से ऊँचा हुआ है।
प्र8.
व्याख्या कीजिए कि झंझावात चक्रवात में किस प्रकार परिवर्तित हो जाता है।
उत्तर

झंझावात चक्रवात तब बनता है जब वह महासागर के गरम जल के ऊपर बने, जहाँ संघनन से मुक्त होने वाली ऊष्मा उसे निरंतर पोषित करती रहे, जिससे केंद्र का दाब और घटता जाए, और पृथ्वी का घूर्णन भीतर आती वायु को चक्रण करा दे।

चरण इस प्रकार हैं:

  1. गरम आर्द्र वायु का ऊपर उठना। महासागरीय जल गरम होता है, उसके ऊपर की गरम और आर्द्र वायु हल्की होकर ऊपर उठती है और नीचे निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है।
  2. जलवाष्प का संघनन और ऊष्मा का मुक्त होना। ऊपर उठती आर्द्र वायु ठंडी होती है और उसका जलवाष्प संघनित होकर वर्षा की बूँदें बनाता है। वाष्पन के समय जल ने जो ऊष्मा ली थी, संघनन पर वही ऊष्मा वायुमंडल में मुक्त हो जाती है
  3. उठना और तीव्र होना। यह मुक्त ऊष्मा ऊपर उठती वायु को और गरम कर देती है, अत: वह और ऊँचाई तक उठती है और केंद्र का दाब और भी कम हो जाता है।
  4. चारों ओर से वायु का आना। आस-पास के उच्च दाब वाले क्षेत्रों से वायु केंद्र की ओर तीव्र गति से आती है और स्वयं भी ऊपर उठने लगती है — और नमी लाती है, अत: चक्र दोहराता और प्रबल होता जाता है।
  5. पृथ्वी का घूर्णन चक्रण देता है। गतिमान वायु सीधी भीतर नहीं जाती; पृथ्वी के घूर्णन के कारण वह मुड़ती है और पूरा तंत्र निम्न दाब के केंद्र के चारों ओर घूमने लगता है।
  6. चक्रवात का बनना। परिणाम यह होता है कि अत्यधिक निम्न दाब के क्षेत्र के चारों ओर तीव्रगामी वायु घूमने लगती है — बादल, पवन एवं वर्षा का चक्रण करता तंत्र, जिसके केंद्र में शांत चक्रवात अक्षि होती है।
अक्षि 994 mb 996 mb 998 mb 1008 mb उच्च दाब उच्च दाब पवन सबसे कम दाब की ओर चक्रण करती हुई जाती है
चक्रवात के चारों ओर की समदाब रेखाएँ, चित्र 6.19 में दिए गए मानों के साथ। दाब बाहर 1008 mb से घटकर केंद्र में 994 mb रह जाता है और वायु इसी ढाल पर भीतर की ओर चक्रण करती है।
मुख्य अंतर: स्थल पर बना साधारण झंझावात शीघ्र ही गरम आर्द्र वायु से वंचित हो जाता है। चक्रवात ऐसे महासागर के ऊपर होता है जो उसे निरंतर नमी देता रहता है, और संघनन का प्रत्येक चक्र नई ऊष्मा मुक्त कर अगले चक्र को चलाता है। इसीलिए पुस्तक कहती है कि स्थल पर पहुँचते ही चक्रवात क्षीण होने लगता है — नम वायु का स्रोत टूट जाता है।
प्र9.
चित्र 6.25 में गर्मियों की दोपहर के समय में समुद्र तट पर पेड़ों को दर्शाया गया है। पहचानिए ‘क’ अथवा ‘ख’ में स्थल किस ओर है। अपने उत्तर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

‘क’ की ओर स्थल है (और ‘ख’ की ओर समुद्र है)।

पहले पेड़ों से पवन की दिशा पढ़िए। उनके तने ‘क’ की ओर झुके हैं और पत्तियाँ भी ‘क’ की ओर बह रही हैं, अत: पवन ‘ख’ से ‘क’ की ओर चल रही है।

अब समय पर ध्यान दीजिए। यह गर्मियों की दोपहर है, जब स्थल जल की तुलना में कहीं तीव्रता से गरम होता है। स्थल के ऊपर की वायु गरम और हल्की होकर ऊपर उठ जाती है और वहाँ निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है। समुद्र के ऊपर की वायु अपेक्षाकृत ठंडी और उच्च दाब पर रहती है। अत: वायु समुद्र से स्थल की ओर बहती है — यही समुद्र समीर है। यहाँ पवन ‘ख’ से ‘क’ की ओर चल रही है, अत: ‘ख’ समुद्र होगा और ‘क’ स्थल।

स्थल (क) समुद्र (ख) गरम वायु ऊपर उठती है निम्न दाब उच्च दाब समुद्र समीर
गर्मियों की दोपहर में स्थल अधिक गरम होता है, अत: निम्न दाब स्थल पर बनता है और समीर समुद्र (ख) से स्थल (क) की ओर बहकर पेड़ों को ‘क’ की ओर झुका देती है।
स्वयं जाँचिए: रात्रि में चित्र उलट जाता है। जल स्थल की तुलना में अधिक गरम रहता है, निम्न दाब समुद्र पर बनता है और स्थल समीर ‘क’ से ‘ख’ की ओर बहती है — तब पेड़ ‘ख’ की ओर झुके दिखाई देते।
प्र10.
ऐसे किसी क्रियाकलाप का वर्णन कीजिए जो यह दर्शाए कि वायु उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहती है।
उत्तर

क्रियाकलाप 6.5 — दो गुब्बारों और एक नलिका वाला प्रयोग — इसे सीधे दर्शाता है।

सामग्री: पतले रबड़ के बने एक समान दो गुब्बारे, एक नलिका (स्ट्रॉ), रबड़ बैंड अथवा धागा।

विधि:

  1. नलिका का एक सिरा पहले गुब्बारे के मुँह में डालकर रबड़ बैंड या धागे से कसकर बाँध दीजिए, जिससे जोड़ से वायु न रिसे। इस गुब्बारे को बिना फुलाए रहने दीजिए।
  2. दूसरे गुब्बारे को फुलाइए और उसके मुँह को अँगुलियों से पकड़ लीजिए जिससे वायु बाहर न निकले।
  3. नलिका का दूसरा सिरा फूले हुए गुब्बारे में डालकर उसे भी बाँध दीजिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि इस बीच वायु बाहर न निकले। अब नलिका का एक सिरा फूले हुए गुब्बारे में और दूसरा बिना फूले गुब्बारे में है।
  4. अपना अनुमान लिखिए, फिर अँगुलियाँ हटाकर दोनों गुब्बारों का अवलोकन कीजिए।

प्रेक्षण: फूला हुआ गुब्बारा छोटा होता जाता है और बिना फूला गुब्बारा भरता जाता है। कुछ समय पश्चात दोनों लगभग समान आमाप के हो जाते हैं और गति रुक जाती है।

निष्कर्ष: फूले हुए गुब्बारे में वायु का दाब बिना फूले गुब्बारे से अधिक था, अत: वायु नलिका से होकर उच्च दाब वाले गुब्बारे से निम्न दाब वाले गुब्बारे की ओर गई। प्रवाह तभी तक चला जब तक दाब भिन्न थे और दाब समान होते ही रुक गया। बाहर चलने वाली पवन भी ठीक इसी प्रकार बनती है।

संकेत: इसका सरल रूप यह है कि फूले हुए गुब्बारे को बिना बाँधे छोड़ दीजिए, अथवा पंचर हुई साइकिल की ट्यूब से निकलती वायु को अनुभव कीजिए। दोनों में उच्च दाब की वायु निम्न दाब वाले वातावरण में जाती है, परंतु दो गुब्बारों वाली व्यवस्था इसलिए बेहतर है कि उसमें दाब समान होने पर प्रवाह का रुकना भी दिखाई देता है।
प्र11.
तड़ितझंझा क्या है? इसके निर्माण प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

तड़ित एवं गर्जन के साथ आने वाले झंझावात को तड़ित-झंझावात (तड़ितझंझा) कहते हैं। (झंझावात स्वयं तीव्र वायु के साथ होने वाली वर्षा है।)

निर्माण की प्रक्रिया:

  1. गरम होना और ऊपर उठना। स्थल गरम होता है और उसके ऊपर की गरम, आर्द्र वायु हल्की होने के कारण ऊपर उठती है, जिससे निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है।
  2. वायु चक्रण। आस-पास के उच्च दाब क्षेत्रों से ठंडी वायु आकर उसका स्थान लेती है, गरम होकर स्वयं ऊपर उठती है, और इस प्रकार वायु चक्रण की सतत प्रक्रिया चलती रहती है।
  3. बादलों का बनना। ऊपर उठती वायु फैलकर ठंडी होती है, उसकी नमी संघनित होकर जल की बूँदें बनाती है और बादल बनते हैं। छोटी बूँदें मिलकर भारी बूँदें बनाती हैं जो वर्षा, ओले अथवा हिम के रूप में गिरती हैं। तीव्र वायु के साथ यह वर्षा झंझावात कहलाती है। भारत जैसे गरम, आर्द्र एवं उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ऐसे झंझावात प्राय: आते रहते हैं।
  4. हिम कणों का बनना। कुछ निश्चित परिस्थितियों में गरम वायु इतनी ऊँचाई तक पहुँच जाती है कि वहाँ के कम तापमान के कारण जल की बूँदें हिम कणों में परिवर्तित हो जाती हैं।
  5. बादलों का आवेशित होना। ऊर्ध्वगामी और अधोगामी तीव्र पवन हिम कणों तथा जल की बूँदों में परस्पर घर्षण करा देती है। जैसा आपने ‘बलों को जानें’ अध्याय में पढ़ा, घर्षण से वस्तुएँ आवेशित हो जाती हैं — अत: बादलों में स्थिर वैद्युत आवेश उत्पन्न हो जाता है
  6. तड़ित और गर्जन। हल्के धनावेशित हिम कण बादल के ऊपरी भाग में और भारी ऋणावेशित जल की बूँदें निचले भाग में जमा हो जाती हैं। आवेश पर्याप्त मात्रा में संचित हो जाने पर वायु का विद्युतरोधी गुण समाप्त हो जाता है और आवेशों का आकस्मिक प्रवाह तड़ित उत्पन्न करता है; इससे गरम होकर फैलती वायु से तीव्र ध्वनि, अर्थात् गर्जन, उत्पन्न होती है। तड़ित एवं गर्जन के साथ आने वाला झंझावात ही तड़ित-झंझावात है।
क्या आप जानते हैं? भारत में विलगित एवं स्थानीकृत तड़ित-झंझावातों के स्थानीय नाम हैं — पश्चिम बंगाल, बिहार एवं झारखंड में कालबैशाखी और असम में बोदोइसिला। ये मानसून से पूर्व आते हैं और खरीफ फसलों को उगाने में सहायक होते हैं। केरल, कर्नाटक एवं तमिलनाडु में इन्हें आम वर्षा कहते हैं क्योंकि ये आम पकाने में सहायक होते हैं, और कर्नाटक में स्थानीय तड़ित-झंझावात कॉफी के पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं।
प्र12.
उस प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए जिसके कारण तड़ित उत्पन्न होती है।
उत्तर

तड़ित आवेशों का वह आकस्मिक प्रवाह है जो तब होता है जब बादल में संचित आवेश इतना अधिक हो जाए कि वायु उसे और रोक न सके।

  1. घर्षण से आवेशन। ऊँचे झंझा-बादल के भीतर ऊर्ध्वगामी और अधोगामी तीव्र पवन चलती है। वह हिम कणों और जल की बूँदों में परस्पर घर्षण करा देती है, और किन्हीं भी दो वस्तुओं के घर्षण की भाँति वे आवेशित हो जाती हैं।
  2. आवेश का पृथक्करण। धनावेशित हल्के हिम कण ऊपर की ओर जाकर बादल के ऊपरी भाग को घेर लेते हैं। ऋणावेशित भारी जल की बूँदें निचले भाग में रह जाती हैं। इस प्रकार बादल में ऊपर-नीचे आवेश का पृथक्करण हो जाता है।
  3. भूमि पर प्रेरित आवेश। जब बादल का ऋणावेशित निचला भाग स्थल के समीप आता है तो वह भूमि और आस-पास की वस्तुओं — जैसे पेड़-पौधे अथवा इमारतों — को धनावेशित कर देता है।
  4. वायु का विद्युतरोधी गुण समाप्त होना। वायु प्राय: विद्युतरोधी की तरह कार्य करती है और विपरीत आवेशों को मिलने नहीं देती। परंतु जब आवेश अधिकता में संचित हो जाए तो वायु का यह गुण समाप्त हो जाता है।
  5. क्षणदीप्त प्रकाश। आवेशों का आकस्मिक प्रवाह होता है और क्षणदीप्त प्रकाश उत्पन्न होता है — यही तड़ित है। यह बादल के भीतर, बादलों के मध्य अथवा बादल और धरातल के मध्य उत्पन्न हो सकती है। तड़ित आस-पास की वायु को तीव्र गति से गरम कर देती है, वायु फैलती है और तीव्र ध्वनि उत्पन्न होती है जिसे गर्जन कहते हैं।
+ + + + + + + हल्के हिम कण ऊपर − − − − − − − भारी जल की बूँदें नीचे तड़ित + + + + + + + + + भूमि
बादल के भीतर आवेश का पृथक्करण और नीचे भूमि पर प्रेरित धनावेश। संचय पर्याप्त होने पर वायु का विद्युतरोधी गुण समाप्त हो जाता है और आवेश प्रवाहित हो जाता है।
पुस्तक द्वारा दी गई सावधानियाँ: तड़ित के समय ऊँची वस्तुओं से दूर रहें, किसी निम्न एवं खुले स्थान पर छिप कर बैठ जाएँ और भूमि से सीधे संपर्क को कम रखें। भूमि पर न लेटें। धातु की छड़ी वाला छाता उपयोग न करें। यदि आप जल के भीतर हैं तो तुरंत बाहर निकल जाएँ। यदि आप बस या कार में सवार हैं तो आप अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित हैं।
प्र13.
व्याख्या कीजिए कि प्रदर्शपट्ट (बैनर) और विज्ञापन पट्ट (होर्डिंग्स) में छिद्र क्यों बनाए जाते हैं।
उत्तर

छिद्र इसलिए बनाए जाते हैं कि पवन बैनर के आर-पार निकल सके और उससे टकराकर रुके नहीं — इससे बैनर के दोनों पृष्ठों के बीच दाब का अंतर कम बना रहता है और बैनर न फटता है, न उड़ता है।

बैनर खुले में लगी एक बड़ी चपटी चादर है। जब तीव्र पवन उससे टकराती है तो उसके अगले पृष्ठ पर बहती वायु की चाल अधिक होने से वहाँ दाब घट जाता है, जबकि पीछे की ओर की आश्रय पाई वायु सामान्य वायुमंडलीय दाब पर बनी रहती है। दोनों पृष्ठों के दाब का यह अंतर बैनर के पूरे बड़े क्षेत्रफल पर कार्य करता है, अत: बहुत बड़ा बल उत्पन्न होता है — इतना कि कपड़ा फट जाए, रस्सियाँ टूट जाएँ या ढाँचा गिर जाए।

छिद्र वायु को उच्च दाब वाली ओर से निम्न दाब वाली ओर आर-पार जाने देते हैं। तब दोनों पृष्ठों का दाब लगभग समान हो जाता है, बैनर पर लगने वाला परिणामी बल बहुत घट जाता है और बैनर अपने स्थान पर टिका रहता है।

छिद्र न हों: पवन रुकी → दोनों पृष्ठों का दाब भिन्न → बड़े क्षेत्रफल पर बड़ा बल
छिद्र हों: वायु आर-पार निकली → दाब लगभग समान → कम बल → बैनर सुरक्षित
यह तर्क आप पहले भी देख चुके हैं: झंझावात के समय दरवाजे-खिड़कियाँ खुली रखने का कारण भी यही है। वायु को केवल छत के ऊपर से नहीं, घर के भीतर से भी जाने देने पर भीतर और छत के ऊपर के दाब का अंतर घट जाता है और छत उड़ने से बच जाती है (चित्र 6.14 ख)।
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