प्र1.
क्या आप अब समझा सकते हैं कि प्रतिदर्श ‘ब’ पर चुंबक का कोई प्रभाव क्यों नहीं पड़ता?
उत्तर
क्योंकि प्रतिदर्श ‘ब’ में लोहा अब लोहे के रूप में शेष ही नहीं है। गरम करने पर लोहा और सल्फर रासायनिक रूप से संयोजित होकर एक नया पदार्थ — आयरन सल्फाइड — बना चुके हैं, और यौगिक के गुणधर्म उसे बनाने वाले तत्वों से पूर्णतया भिन्न होते हैं।
आयरन + सल्फर (गरम करने पर) → आयरन सल्फाइड
ऐसा क्यों होता है: चुंबक द्वारा आकर्षित होना लोहे का गुणधर्म है, आयरन सल्फाइड का नहीं। प्रतिदर्श ‘अ’ में लोहे के कण सल्फर के साथ केवल मिश्रित थे, अत: उन्होंने वह गुणधर्म बनाए रखा और चुंबक उन्हें खींच सका। प्रतिदर्श ‘ब’ में लोहे के कण सल्फर के कणों से एक निश्चित अनुपात में रासायनिक रूप से बँधे हैं और अब मुक्त नहीं हैं; उनसे बना यौगिक अपने ही गुणधर्मों वाला भिन्न पदार्थ है और चुंबकीय आकर्षण उनमें सम्मिलित नहीं। यही कारण है कि प्रतिदर्श ‘ब’ से आयरन और सल्फर को अब किसी भी भौतिक विधि से पृथक भी नहीं किया जा सकता।