कुतूहल अध्याय 9 खोजबीन और विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपको क्या लगता है कि उपर्युक्त चित्र में क्या हो रहा है।
उत्तर

चित्र में लोग समुद्र तट से प्राकृतिक नमक एकत्रित कर रहे हैं। पीछे समुद्र है, सामने गीली रेत पर नमक की सफेद परत जमी है और धोती पहने एक व्यक्ति झुककर मुट्ठी भर नमक उठा रहा है।

इस चित्र का विज्ञान वही है जो पूरे अध्याय का है। समुद्र का जल शुद्ध जल नहीं है — वह एक विलयन है जिसमें साधारण नमक और अन्य लवण विलेय हैं तथा जल विलायक है। धूप और वायु जल को वाष्पित कर देती है परंतु नमक वाष्पित नहीं हो सकता। जैसे-जैसे जल घटता है, शेष विलयन अधिक से अधिक सांद्र होता जाता है और अंततः संतृप्त हो जाता है। इसके पश्चात जितना भी जल वाष्पित होता है, उतना नमक ठोस रूप में पीछे छूट जाता है और रेत पर सफेद क्रिस्टलों के रूप में दिखाई देने लगता है। लोग वही नमक उठा रहे हैं जो समुद्र ने छोड़ दिया।

ऐसा क्यों होता है: वाष्पन से केवल विलायक निकलता है। घुले हुए नमक का द्रव्यमान वही रहता है जबकि जल का आयतन घटता जाता है, अतः सांद्रता निरंतर बढ़ती है — और संतृप्त हो जाने के बाद अतिरिक्त नमक के पास क्रिस्टल बनकर बाहर आने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं बचता।
क्या आप जानते हैं? यह दृश्य अप्रैल 1930 की दांडी यात्रा से लिया गया है, जब महात्मा गांधी दांडी के समुद्र तट पर पहुँचकर नमक कानून तोड़ने के लिए मुट्ठी भर नमक उठाया था। यही वाष्पन आज भी गुजरात और तमिलनाडु के नमक क्षेत्रों में तथा मणिपुर के निंगेल गाँव में (देखिए अध्याय के अंत का हमारी वैज्ञानिक परंपरा बॉक्स) प्रयोग होता है।
प्र2.
क्या होता है जब आप चाय में चीनी अधिक डाल देते हैं और वह घुलना बंद कर देती है? आप इस समस्या का समाधान किस प्रकार कर सकते हैं?
उत्तर

चाय उस तापमान पर चीनी का संतृप्त विलयन बन चुकी है। अब वह और चीनी नहीं रख सकती, इसलिए अतिरिक्त चीनी कण के रूप में प्याले की तली पर बैठ जाती है।

दो उपाय काम करेंगे और एक नहीं करेगा —

  • चाय को गरम कीजिए (या गरम चाय मिलाइए)। तापमान बढ़ने पर ठोस की विलेयता बढ़ती है, अतः संतृप्त विलयन गरम होते ही असंतृप्त की भाँति व्यवहार करने लगता है और तली की चीनी घुल जाती है।
  • और चाय अर्थात और विलायक मिलाइए। उतनी ही चीनी अब अधिक जल में फैलेगी, इसलिए विलयन संतृप्त नहीं रह जाएगा।
  • केवल विलोडित करने से कुछ नहीं होगा। विलोडन घुलने की क्रिया को केवल तेज़ करता है, सीमा को नहीं बढ़ाता। सीमा पर पहुँच जाने के बाद आप घंटों चम्मच चलाइए, कण तली पर ही रहेंगे।
ऐसा क्यों होता है: घुलने का अर्थ है कि जल के कण चीनी के कणों को क्रिस्टल से खींचकर अलग करें और उन्हें अलग-अलग बनाए रखें। किसी निश्चित तापमान पर जल के कणों के पास ऊर्जा निश्चित होती है, इसलिए जल की एक निश्चित मात्रा में चीनी के केवल एक निश्चित संख्या के कण ही अलग रखे जा सकते हैं — यही विलेयता है। गरम करने से कणों को अधिक ऊर्जा और अधिक स्थान मिलता है, अतः अधिक चीनी सँभाली जा सकती है; और जल बढ़ाने से पकड़ने वाले कण अधिक हो जाते हैं।
प्र3.
चीनी और नमक जल में क्यों घुल जाते हैं जबकि तेल में नहीं घुलते? जल को एक अच्छा विलायक क्यों माना जाता है?
उत्तर

क्योंकि घुलना आकर्षण की रस्साकशी है, और इसमें जल जीत जाता है जबकि तेल हार जाता है।

नमक या चीनी के दाने में कण एक नियमित व्यवस्था में एक-दूसरे से कसकर बँधे रहते हैं। दाने के घुलने के लिए द्रव के कणों को उन कणों को एक-एक करके खींचकर अलग करना होता है और फिर उन्हें अलग-अलग तथा समान रूप से फैलाए रखना होता है। जल के कण यह कर सकते हैं — जल के प्रत्येक कण का एक सिरा कुछ धनात्मक और दूसरा कुछ ऋणात्मक होता है, इसलिए वह क्रिस्टल की सतह के कणों को पकड़ता है, खींचकर अलग करता है और उन्हें चारों ओर से घेर लेता है। तेल के कणों में ऐसा खिंचाव नहीं होता। वे आपस में तो एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, परंतु नमक या चीनी के कणों को लगभग बिलकुल नहीं — अतः क्रिस्टल कभी टूटता ही नहीं और ज्यों का त्यों तेल में पड़ा रहता है।

जल को अच्छा विलायक क्यों कहते हैं:

  • यह पदार्थों की बहुत विस्तृत श्रेणी को घोलता है — लवण, शर्कराएँ, ओ.आर.एस. का चूर्ण, अनेक औषधियाँ और ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें भी।
  • यह सामान्य तापमानों की पूरी परास में द्रव रहता है, सस्ता है, विषैला नहीं है और आग नहीं पकड़ता।
  • यह जीवधारियों में घुले पदार्थों का वहन करता है — पौधों में रस, शरीर में रुधिर और आँत में पचा हुआ भोजन।
क्या आप जानते हैं? आयुर्वेद, सिद्ध और अन्य भारतीय चिकित्सा पद्धतियाँ शताब्दियों से औषधि संरूपण बनाने में मुख्य विलायक के रूप में जल का उपयोग करती आई हैं, और जहाँ कोई पदार्थ उनमें अधिक घुलता है वहाँ तेल, घी और दूध का भी।
प्र4.
जल की बोतलें गोलाकार होने की अपेक्षा प्राय: लंबी और बेलनाकार आकृति की क्यों होती हैं?
उत्तर

क्योंकि लंबा बेलन सरलता से खड़ा रहता है, सरलता से पकड़ में आता है और सरलता से रखा जाता है, जबकि गोला इनमें से कुछ भी नहीं कर पाता।

आवश्यकतालंबा बेलनगोला
मेज़ या बैग में खड़ा रहनासमतल वृत्ताकार तली — सीधा खड़ा रहता हैलुढ़क जाता है; अलग आधार चाहिए
एक हाथ की पकड़कम व्यास, उँगलियाँ चारों ओर मिल जाती हैंउतने ही आयतन के लिए व्यास बड़ा — पकड़ना कठिन
रैक या डिब्बे में रखनाबेलन अगल-बगल सटकर रखे जाते हैं, स्थान कम व्यर्थ होता हैगोलों के बीच बड़े खाली स्थान छूट जाते हैं
शेष जल का अनुमानआयतन = πr²h, अतः जल की ऊँचाई सीधे मात्रा बताती हैसबसे चौड़े भाग के पास स्तर से कुछ पता नहीं चलता
भरना और उँडेलनाएक सिरे पर सँकरी गर्दन प्रवाह को नियंत्रित करती हैबिना छलकाए उँडेलना कठिन
ऐसा क्यों होता है: गोले का एक लाभ अवश्य है — किसी दिए गए आयतन के लिए उसमें सामग्री सबसे कम लगती है। परंतु बोतल को खड़ा भी होना है, पकड़ में भी आना है, रखा भी जाना है और उससे उँडेला भी जाना है। आकृति उपयोग को देखकर चुनी जाती है, केवल सामग्री को देखकर नहीं। ठीक इसी कारण मापक सिलिंडर भी सँकरा और लंबा बनाया जाता है (पृष्ठ 144)।
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