गंगा अध्याय 12 साथ-साथ पढ़ें

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पाठ के अंत में ‘साथ-साथ पढ़ें’ के अंतर्गत रामनरेश त्रिपाठी की कविता ‘तब याद तुम्हारी आती है’ दी गई है। इस कविता का भाव-सौंदर्य और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

ध्यान दें — पुस्तक ने इस कविता के साथ कोई प्रश्न नहीं दिया है। यह केवल पढ़ने और ‘घर की याद’ के साथ रखकर सोचने के लिए दी गई है। फिर भी इसे समझ लेना ज़रूरी है, क्योंकि परीक्षा में इस पर आधारित प्रश्न आ सकता है।

कविता (पूरी) —

जब बहुत सुबह चिड़ियाँ उठकर, कुछ गीत खुशी के गाती हैं।
कलियाँ दरवाजे खोल-खोल, जब दुनिया पर मुसकाती हैं।।
जब ठंडी-ठंडी हवा कहीं से, मस्ती ढोकर लाती है।
हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है॥

चुपचाप चमकते तारों की, महफिल जब रात सजाती है।
जब चाँद शान से उठता है, दिल की दुनिया जग जाती है।।
कुछ पता नहीं, लेकिन जरूर, वह संदेशा कुछ पाती है।
हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है!!

सरल अर्थ — जब तड़के चिड़ियाँ जागकर खुशी के गीत गाती हैं, जब कलियाँ अपनी पंखुड़ियों के दरवाज़े खोल-खोलकर दुनिया पर मुसकराती हैं, और जब कहीं से ठंडी हवा मस्ती लेकर आती है — तब, हे संसार के रचयिता प्रभु, आपकी याद आती है। और जब रात चुपचाप चमकते तारों की महफ़िल सजाती है, जब चाँद शान से उठता है और दिल की दुनिया जाग उठती है — तब न जाने कहाँ से, पर ज़रूर कोई संदेश उस तक पहुँचता है — और तब भी, हे प्रभु, आपकी ही याद आती है।

भाव-सौंदर्य: यह प्रकृति-प्रेम और ईश्वर-भक्ति को जोड़ने वाली कविता है। कवि कहता है कि ईश्वर को याद करने के लिए मंदिर, माला या कर्मकांड की ज़रूरत नहीं — सृष्टि की सुंदरता ही उसका सबसे बड़ा प्रमाण है। जो चिड़िया गाती है, जो कली खिलती है, जो हवा बहती है, जो चाँद उगता है — ये सब उसी सिरजनहार के हाथ की बनाई चीज़ें हैं; इसलिए इन्हें देखते ही उसकी याद आ जाती है। कविता का स्वर कहीं भी दुखी नहीं है — वह कृतज्ञता और विस्मय का है। दूसरे अंतरे की तीसरी पंक्ति सबसे सुंदर है — ‘कुछ पता नहीं, लेकिन जरूर, वह संदेशा कुछ पाती है’ — यानी हमारी बात उस तक कैसे पहुँचती है, यह हम नहीं जानते; पर पहुँचती ज़रूर है। यही भक्ति का विश्वास है।
शिल्प का पक्षकविता में कैसे काम कर रहा है
टेक (ध्रुवपद)‘हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है’ दोनों अंतरों के अंत में लौटती है — यही कविता को गेय बनाती है।
मानवीकरण‘कलियाँ दरवाजे खोल-खोल… मुसकाती हैं’, ‘हवा… मस्ती ढोकर लाती है’, ‘रात… महफिल सजाती है’, ‘चाँद शान से उठता है’ — प्रकृति के हर उपादान को मनुष्य की तरह चलता-फिरता दिखाया गया है।
रूपक‘तारों की महफिल’ (आकाश में तारों का जमघट = महफ़िल), ‘दिल की दुनिया’।
पुनरुक्ति प्रकाश‘खोल-खोल’, ‘ठंडी-ठंडी’ — शब्दों का दोहराव, जिससे लय और मिठास दोनों बढ़ती हैं।
संबोधन‘हे जग के सिरजनहार प्रभो!’ — पूरी कविता ईश्वर को सीधे संबोधित है।
संरचनादो अंतरे — पहला दिन का (सुबह, चिड़ियाँ, कलियाँ, हवा), दूसरा रात का (तारे, चाँद)। यानी दिन हो या रात, हर समय याद उसी की।
भाषासरल खड़ी बोली, जिसमें उर्दू के शब्द (महफिल, जरूर) और तत्सम शब्द (सिरजनहार, प्रभो) साथ-साथ चलते हैं।
रचनाकार के बारे में: रामनरेश त्रिपाठी (सन् 1889–1962) द्विवेदी युग के प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं — पथिक, मिलन, स्वप्न। उन्होंने लोकगीतों का बड़ा संग्रह कविता कौमुदी भी तैयार किया और वे भी स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े रहे।
प्र2.
‘घर की याद’ और ‘तब याद तुम्हारी आती है’ — दोनों कविताएँ ‘याद’ पर केंद्रित हैं। इन दोनों की तुलना कीजिए और बताइए कि दोनों में प्रकृति की भूमिका किस प्रकार अलग है।
उत्तर

पुस्तक ने ‘तब याद तुम्हारी आती है’ को ठीक ‘घर की याद’ के बाद रखा है — और यह संयोग नहीं है। दोनों कविताओं का ढाँचा एक है, पर दिशा उलटी

तुलना का आधारघर की याद — भवानीप्रसाद मिश्रतब याद तुम्हारी आती है — रामनरेश त्रिपाठी
किसकी यादघर और परिवार की — पिताजी, माँ, भाई-बहन, भौजी, सरला।ईश्वर की — ‘हे जग के सिरजनहार प्रभो!’
याद जगाने वाली प्रकृतिवर्षा — रात-भर बरसता पानी, बादल, हवा।सुबह और रात का सौंदर्य — चिड़ियाँ, कलियाँ, ठंडी हवा, तारे, चाँद।
प्रकृति की भूमिकाप्रकृति दुख जगाती है और साथ ही दूत भी बन जाती है — ‘हे सजीले हरे सावन… तुम बरस लो वे न बरसें’।प्रकृति कृतज्ञता जगाती है — उसका सौंदर्य देखकर रचयिता याद आ जाता है। वह दूत नहीं, प्रमाण है।
भाव (रस)विरह और करुणा; बीच-बीच में वात्सल्य।भक्ति, विस्मय और प्रसन्नता।
कवि की स्थितिबंदी — वह बाहर नहीं जा सकता, इसलिए बादल से विनती करता है।मुक्त — वह सुबह और रात, दोनों का सौंदर्य खुलकर देख रहा है।
संबोधन किसेसावन और हवा को — ‘हे सजीले हरे सावन’, ‘हवा, उनको धीर देना’।सीधे ईश्वर को — ‘हे जग के सिरजनहार प्रभो!’
टेक‘हे सजीले हरे सावन… पाँचवें को वे न तरसें’ — दो बार।‘तब याद तुम्हारी आती है’ — दोनों अंतरों के अंत में।
लंबाई और शैलीलंबी कविता; बातचीत जैसी सहज खड़ी बोली, बीच-बीच में क्षेत्रीय शब्द।छोटी, गीत-रूप कविता; सरल और मधुर भाषा।
अंतप्रार्थना पर — ‘वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें।’कृतज्ञता पर — ‘तब याद तुम्हारी आती है!!’
सबसे बड़ा अंतर — प्रकृति की भूमिका:
  • ‘घर की याद’ में प्रकृति माध्यम है। वर्षा कवि को घर की याद दिलाती है, और फिर वही वर्षा उसका संदेशवाहक बन जाती है। यानी प्रकृति यहाँ कवि और उसके घर के बीच की कड़ी है।
  • ‘तब याद तुम्हारी आती है’ में प्रकृति गंतव्य की ओर संकेत है। चिड़िया, कली, चाँद — ये किसी तक संदेश नहीं ले जाते; ये स्वयं इस बात के प्रमाण हैं कि कोई रचयिता है। यानी प्रकृति यहाँ ईश्वर तक पहुँचने की सीढ़ी है।
  • एक और अंतर ध्यान देने योग्य है — मिश्र की कविता में प्रकृति का रूप धुँधला, बरसता और बंद है (बादलों की घनेरी अँधेरी, रातवाली छाप); त्रिपाठी की कविता में प्रकृति खिली, चमकती और खुली है (चिड़ियाँ, कलियाँ, चाँद, तारे)। कवि की मन:स्थिति प्रकृति के इसी रंग में दिखाई देती है।
समानताएँ भी कम नहीं: दोनों कविताएँ गीत हैं और दोनों में टेक लौटती है। दोनों में संबोधन-शैली है। दोनों में प्रकृति का मानवीकरण है — मिश्र के यहाँ पेड़ आँखें बंद करके खड़े हैं, त्रिपाठी के यहाँ कलियाँ दरवाज़े खोलकर मुसकराती हैं। और सबसे बड़ी समानता यह कि दोनों कवि यह मानते हैं कि प्रकृति को देखकर मन किसी न किसी की ओर मुड़ ही जाता है — किसी का मन घर की ओर, किसी का ईश्वर की ओर।
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