ध्यान दें — पुस्तक ने इस कविता के साथ कोई प्रश्न नहीं दिया है। यह केवल पढ़ने और ‘घर की याद’ के साथ रखकर सोचने के लिए दी गई है। फिर भी इसे समझ लेना ज़रूरी है, क्योंकि परीक्षा में इस पर आधारित प्रश्न आ सकता है।
कविता (पूरी) —
कलियाँ दरवाजे खोल-खोल, जब दुनिया पर मुसकाती हैं।।
जब ठंडी-ठंडी हवा कहीं से, मस्ती ढोकर लाती है।
हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है॥
चुपचाप चमकते तारों की, महफिल जब रात सजाती है।
जब चाँद शान से उठता है, दिल की दुनिया जग जाती है।।
कुछ पता नहीं, लेकिन जरूर, वह संदेशा कुछ पाती है।
हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है!!
सरल अर्थ — जब तड़के चिड़ियाँ जागकर खुशी के गीत गाती हैं, जब कलियाँ अपनी पंखुड़ियों के दरवाज़े खोल-खोलकर दुनिया पर मुसकराती हैं, और जब कहीं से ठंडी हवा मस्ती लेकर आती है — तब, हे संसार के रचयिता प्रभु, आपकी याद आती है। और जब रात चुपचाप चमकते तारों की महफ़िल सजाती है, जब चाँद शान से उठता है और दिल की दुनिया जाग उठती है — तब न जाने कहाँ से, पर ज़रूर कोई संदेश उस तक पहुँचता है — और तब भी, हे प्रभु, आपकी ही याद आती है।
| शिल्प का पक्ष | कविता में कैसे काम कर रहा है |
|---|---|
| टेक (ध्रुवपद) | ‘हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है’ दोनों अंतरों के अंत में लौटती है — यही कविता को गेय बनाती है। |
| मानवीकरण | ‘कलियाँ दरवाजे खोल-खोल… मुसकाती हैं’, ‘हवा… मस्ती ढोकर लाती है’, ‘रात… महफिल सजाती है’, ‘चाँद शान से उठता है’ — प्रकृति के हर उपादान को मनुष्य की तरह चलता-फिरता दिखाया गया है। |
| रूपक | ‘तारों की महफिल’ (आकाश में तारों का जमघट = महफ़िल), ‘दिल की दुनिया’। |
| पुनरुक्ति प्रकाश | ‘खोल-खोल’, ‘ठंडी-ठंडी’ — शब्दों का दोहराव, जिससे लय और मिठास दोनों बढ़ती हैं। |
| संबोधन | ‘हे जग के सिरजनहार प्रभो!’ — पूरी कविता ईश्वर को सीधे संबोधित है। |
| संरचना | दो अंतरे — पहला दिन का (सुबह, चिड़ियाँ, कलियाँ, हवा), दूसरा रात का (तारे, चाँद)। यानी दिन हो या रात, हर समय याद उसी की। |
| भाषा | सरल खड़ी बोली, जिसमें उर्दू के शब्द (महफिल, जरूर) और तत्सम शब्द (सिरजनहार, प्रभो) साथ-साथ चलते हैं। |