कक्षा ९ हिंदी अध्याय 12 घर की याद के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
रचनाकार — भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में हुआ था। साहित्य के साथ-साथ स्वाधीनता आंदोलन में जिन कवियों की सक्रिय भागीदारी थी, उनमें ये प्रमुख हैं। उनकी मुख्य रचनाएँ हैं — गीत-फ़रोश, खुशबू के शिलालेख, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी, कवितांतर, शतदल, गांधी-पंचशती, त्रिकाल संध्या । कविता-संग्रह बुनी हुई रस्सी पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में काम किया, सन् 1952–55 तक हैदराबाद से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका कल्पना का संपादन किया, सन् 1955–58 तक आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों से जुड़े रहे और संपूर्ण गांधी वाङ्मय का भी संपादन किया। सन् 1985 में उनका निधन हुआ। कविता कहाँ लिखी गई — पुस्तक स्वयं बताती है कि भवानीप्रसाद मिश्र ने सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय भाग लिया, जिसके चलते ब्
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| शब्द | अर्थ | पाठ की पंक्ति | अपने वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|---|
| घनेरा/घना | गाढ़ा, गुंजान, जिसके अवयव पास-पास सटे हों | “है अभी तक भी घनेरी,” | आम के घने पेड़ के नीचे दोपहर भी ठंडी लगती है। |
| तिर/तिरना/तरना | तैरना, उतराना, पार होना | “घर नजर में तिर रहा है,” | बचपन का गाँव आज भी आँखों में तिरता रहता है। |
| परिताप | अत्यधिक दुख, शोक, भय, बहुत गर्मी, अत्यधिक ताप | “हाय रे परिताप के घर!” | बेटे की खबर न मिलने का परिताप माँ के चेहरे पर साफ़ था। |
| चतुर्दिक् | चारों ओर, चौखूँट | “घर चतुर्दिक् घिर रहा है,” | मैदान के चतुर्दिक् ऊँचे पेड़ लगे हैं। |
| वज्र | बहुत कठोर, जिस पर किसी का प्रभाव न पड़े | “वज्र-भुज नवनीत-सा उर,” | पहलवान की वज्र-सी भुजाएँ देखकर सब दंग रह गए। |
| नवनीत | ताजा मक्खन | “वज्र-भुज नवनीत-सा उर,” | दादी का मन नवनीत-सा कोमल है। |
| उर | हृदय, श्रेष्ठ, उत्तम, मन | “घाव उर के खोलता है,” | उसकी बात सुनकर मेरे उर में हूक-सी उठी। |
| झंझा | तेज हवा, आँधी-पानी, खोई हुई वस्तु, झंकार | “काम में झंझा लरजता,” | रात-भर झंझा चलती रही और सुबह आँगन पत्तों से भरा था। |
| लरजता/लरजना | काँपना, हिलना-डुलना, दहल जाना, भयभीत | “काम में झंझा लरजता,” | डर के मारे उसका स्वर लरज रहा था। |
| मूठ | मुट्ठी-भर चीज, कब्जा, मुट्ठी, दस्ता | “मूठ उनकी मिला लेकर,” | तलवार की मूठ पर सोने का काम था। |
| अभागा | भाग्यहीन | “पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,” | अभागा किसान सूखे में अपनी पूरी फसल खो बैठा। |
| धीर | जिसका चित्त विकारजनक कारणों के रहते हुए भी विचलित न हो, दृढ़, गंभीर | “धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,” | विपत्ति में भी धीर बने रहना ही सच्चा साहस है। |
| झारी | पानी परसने, हाथ मुँह धुलाने आदि के लिए काम में लाया जाने वाला टोटीदार बर्तन | “रात दिन की झड़ी झारी,” | दादी पीतल की झारी से तुलसी में पानी देती थीं। |
| बेला | एक सुगंधित फूल, मोगरा, कटोरा | “तुझे बतलाता कि बेला / ने फलानी फूल झेला,” | शाम होते ही बेला की महक पूरे आँगन में भर गई। |
| फलानी/फलाना/फलाँ | कोई आदिष्ट (व्यक्ति या वस्तु), अमुक | “ने फलानी फूल झेला,” | वह हर बात में ‘फलाँ ने ऐसा कहा’ कहकर बहाना बना देता है। |
| निहायत | बहुत ज्यादा, अत्यधिक | “मन निहायत नम गया है,” | यह काम निहायत आसान है, तुम कर लोगे। |
| लुनाई | सुंदरता, सलोनापन, फसल काटने की क्रिया | “गगन-आँगन की लुनाई” | भोर की धूप में खेतों की लुनाई देखते ही बनती थी। |
| क्षितिज | वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिले दिखाई देते हैं, वृक्ष | “क्षितिज पर जैसे जड़े हैं” | सूरज धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे उतर गया। |
| तृषा | तीव्र इच्छा, अभिलाषा, लोभ, प्यास | “किसलिए इतनी तृषा रे,” | ज्ञान की तृषा कभी नहीं बुझती। |
| अश्रु | आँसू | “अश्रु सिंचित हास तेरे!” | विदाई के समय उसकी आँखों में अश्रु भर आए। |
| हास | हँसने की क्रिया, प्रसन्नता, खुशी, चौंध पैदा करने वाली सफेदी | “अश्रु सिंचित हास तेरे!” | बच्चों का निर्दोष हास सुनकर मन हल्का हो गया। |
| क्लेश | दुख, पीड़ा, क्रोध, राग, द्वेष | “दे रहा है क्लेश मुझको,” | छोटी-सी बात को लेकर घर में क्लेश खड़ा हो गया। |
| बड़ | बरगद, वट | “मन कि बड़ का झाड़ जैसे,” | गाँव के बड़ के नीचे हर शाम पंचायत जुटती है। |
| उमग | उल्लास, मौज, जोश, आकांक्षा | “दूध की नद्दी उमग ले,” | परिणाम सुनते ही उसके मन में उमग भर गई। |
| ख़म | झुका हुआ, टेढ़ा, वक्र, घुमाव, टेढ़ापन | “कम कहाँ कि ख़म न हो ले,” | इतनी चोट लगी, फिर भी उसके इरादों में ख़म नहीं आया। |
| विरस | नीरस, अप्रिय, जी उबाने वाला, कष्टकर | “इसी बस से सब विरस है,” | उसके बिना पूरी यात्रा विरस हो गई। |
| कातने/कातना | चरखे या तकली पर रुई या ऊन से धागा निकालना, सन से सुतली बनाना | “कातने में व्यस्त हूँ मैं,” | गांधीजी जेल में भी रोज़ सूत कातते थे। |
| अस्त | डूबा हुआ, फेंका हुआ, समाप्त, (सूर्य-चंद्र का) डूबना, अदृश्य होना, पतन, अंत | “यों न कहना अस्त हूँ मैं,” | सूर्य के अस्त होते ही घाट पर दीये जल उठे। |
| छिन (क्षण) | पल, बहुत थोड़ा समय — कवि की स्थानीय बोली का रूप | “एक छिन सौ बरस है रे,” | एक छिन के लिए भी उसने हिम्मत नहीं हारी। |
| भौजी (भाभी) | भाई की पत्नी — स्थानीय बोली का रूप | “और भौजी और सरला,” | भौजी ने आते ही सबके लिए चाय चढ़ा दी। |
| चुआ (चूना/टपकना) | टपकना, बूँद-बूँद गिरना — यहाँ ‘मन भर आना’ | “आज सबका मन चुआ होगा।” | पुरानी चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते उसका मन चुआ जा रहा था। |
| हेटे | तुच्छ, कमतर, हीन | “लगे होंगे उन्हें हेटे,” | किसी को हेटा समझना अच्छी बात नहीं। |
| सुहागा | सोने की अशुद्धि दूर करने वाला खनिज; मुहावरे में — जो पहले से अच्छे को और निखार दे | “जिसे सोने पर सुहागा,” | मेहनती छात्र को अच्छा शिक्षक मिल जाए तो सोने पर सुहागा। |
| मुगदर | व्यायाम के लिए प्रयुक्त लकड़ी का भारी उपकरण | “खूब मुगदर हिला लेकर,” | अखाड़े में सुबह से मुगदर हिलाने की आवाज़ आ रही थी। |
| बिचकना | डरकर सहम जाना, मुँह बनाना | “शेर के आगे न बिचकें,” | खतरे के सामने भी वह बिचका नहीं। |
| पूर | भरा हुआ, बाढ़, भरपूरता | “घर खुशी का पूर है जो,” | त्योहार के दिन घर उल्लास का पूर बन जाता है। |
| व्यापना | फैलना, असर करना, समा जाना | “एक क्षण भी नहीं व्यापा,” | बुढ़ापा उनके उत्साह में कभी नहीं व्यापा। |
| नद्दी (नदी) | नदी — कवि की बोली का रूप | “दूध की नद्दी उमग ले,” | बरसात में छोटी-सी नद्दी भी उफन जाती है। |
अभ्यास
- कविता की व्याख्या (1)
- कविता की व्याख्या (2)
- कविता की व्याख्या (3)
- कविता की व्याख्या (4)
- मेरे उत्तर मेरे तर्क
- मेरी समझ मेरे विचार
- कविता का सौंदर्य
- कविता की संरचना
- विषयों से संवाद
- सृजन
- व्याकरण की बात
- गतिविधियाँ
- भाषा संगम
- खोजबीन
- साथ-साथ पढ़ें