प्र1.
‘घर की याद’ कवि के भीतर उठते भावों की यात्रा है। कविता में प्रकृति के माध्यम से व्यक्त इस यात्रा के प्रमुख चरणों का वर्णन करें। (संकेत– पानी का गिरना, सबेरा होना)
उत्तर
‘घर की याद’ को यदि एक ही वाक्य में कहना हो तो यह कहा जा सकता है — बाहर की वर्षा जैसे-जैसे बदलती है, भीतर का भाव भी वैसे-वैसे बदलता है। कविता कुल आठ चरणों से होकर गुज़रती है —
| चरण | प्रकृति की अवस्था | कविता की पंक्ति | भाव की अवस्था |
|---|---|---|---|
| 1. आरंभ | रात-भर पानी का गिरना | “आज पानी गिर रहा है… प्राण मन घिरता रहा है,” | बेचैनी का जागना — बाहर गिरना, भीतर घिरना। |
| 2. सबेरा होना | बादलों की अँधेरी, चुप्पी | “अब सबेरा हो गया है, कब सबेरा हो गया है… रातवाली छाप है सब,” | समय का ठहर जाना, दिशाहीनता — सबेरा हुआ भी तो पता न चला। |
| 3. ध्वनियों का जागना | झरा-झर, हरा-हर, सर-सर | “गिर रहा पानी झरा-झर… काँपते हैं प्राण थर-थर,” | बाहर की हलचल का प्राणों तक उतरना — काँपना। |
| 4. स्मृति का खुलना | पानी का पर्दा | “बहुत पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा है,” | घर का तैरता चित्र — परिजन एक-एक करके याद आने लगते हैं। |
| 5. कल्पना का विस्तार | वर्षा घर पर भी हो रही है | “और अम्मा ठीक बादल… आज सबका मन चुआ होगा।” | कवि घर के भीतर पहुँच जाता है — पिता का रोना, माँ का सँभालना, भाई-बहनों की छटपटाहट। |
| 6. वर्षा का थमना | पानी थमा, बादल जमे, पेड़ निश्चल | “अभी पानी थम गया है, मन निहायत नम गया है,”; “झाड़ आँखें बंद करके… क्षितिज पर जैसे जड़े हैं” | बाहर ठहराव, भीतर भीगापन। एक क्षण के लिए मन शांत होता-सा लगता है। |
| 7. पंछी की आवाज़ | चुप्पी का टूटना | “एक पंछी बोलता है, घाव उर के खोलता है,” | शांति टूटती है, घाव फिर खुल जाते हैं — और बात ‘मैं’ से बढ़कर ‘आदमी’ तक पहुँच जाती है। |
| 8. संदेश और प्रार्थना | सावन दूत बन जाता है | “हे सजीले हरे सावन… पाँचवें को वे न तरसें।” | दुख से निकलकर दूसरों की चिंता तक — ‘मैं ठीक हूँ, बस उन्हें दुख न हो’। |
इस यात्रा में तीन बातें ध्यान देने योग्य हैं:
- प्रकृति ही कड़ी है। कवि कहीं यह नहीं कहता कि ‘अब मुझे यह लग रहा है’। वह हर बार पहले मौसम बताता है, और भाव अपने आप उसमें से निकल आता है।
- यात्रा भीतर से बाहर की ओर जाती है। कविता अपने दुख (‘प्राण मन घिरता रहा है’) से शुरू होकर दूसरों के दुख की चिंता (‘वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें’) पर खत्म होती है। यही इसका नैतिक विकास है।
- अंत चक्रीय है। जिस टेक से संदेश-भाग शुरू हुआ था, कविता उसी टेक पर लौटकर समाप्त होती है — गीत की परंपरा के अनुसार।