पहले पुस्तक की सूची को पूरी भरी हुई तालिका के रूप में देखिए —
| विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
|---|---|
| स्मृति और दृश्य बिंब | “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह, / बड़े बाड़े में कि जाता, बीज लौकी का लगाता,” |
| लोकभाषा की सहजता | “और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला,” / “आज सबका मन चुआ होगा।” |
| पंक्तियों का दोहराव | “चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें,” (कविता में दो बार) तथा “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा,” (दो बार) |
| आलंकारिक प्रयोग | “पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर,” / “लग रहे हैं वे मुझे यों, माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;” |
| प्राकृतिक दृश्यों और भावों का संयोजन | “आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, / रात-भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है,” |
| संबोधनात्मकता | “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन, / तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें,” |
हर पंक्ति क्यों चुनी गई —
स्मृति और दृश्य बिंब — “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह, बड़े बाड़े में कि जाता, बीज लौकी का लगाता,”
यह पूरा चित्र याद से बना है — पिता अपने बेटे के बचपन को याद कर रहे हैं। और वह याद इतनी साफ़ है कि आँखों के सामने खड़ी हो जाती है: खुला सिर, नंगा बदन, बारिश में घूमता लड़का, बाड़े में लौकी का बीज बोता हुआ। यही दृश्य बिंब है। ‘लौकी का बीज’ जैसा छोटा ब्योरा ही इस चित्र को असली बनाता है।
वैकल्पिक उदाहरण: “तुझे बतलाता कि बेला / ने फलानी फूल झेला,” — इसमें दृश्य के साथ गंध का बिंब भी है।लोकभाषा की सहजता — “और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला,” और “आज सबका मन चुआ होगा।”
‘भौजी’ (भाभी) और ‘चुआ’ (टपका) कवि की क्षेत्रीय बोली के शब्द हैं — पुस्तक ने ‘व्याकरण की बात’ में इन्हीं को उदाहरण बनाया है। ये शब्द कविता में बिना किसी झिझक के आ जाते हैं और कहीं खटकते नहीं; उलटे उनसे घर जैसा अपनापन आ जाता है। यही ‘लोकभाषा की सहजता’ है।
वैकल्पिक उदाहरण: “एक छिन सौ बरस है रे” (छिन = क्षण); “मन कि बड़ का झाड़ जैसे” (बड़ = बरगद); “दूध की नद्दी उमग ले” (नद्दी = नदी)।पंक्तियों का दोहराव — “चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें,” तथा “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा,”
ये दोनों पंक्ति-जोड़ियाँ कविता में दो-दो बार आती हैं, और हर बार अर्थ बदल जाता है। ‘चार भाई चार बहिनें’ पहले घर की खुशी बताने आती है, दूसरी बार पिता के दुख का कारण बनकर। ‘पिताजी जिनको बुढ़ापा’ पहले उनकी ताकत बताती है, दूसरी बार उनके रोने से पहले आकर करुणा पैदा करती है। इसके अलावा ‘हाय, पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा है’ और अंतिम टेक ‘हे सजीले हरे सावन…’ भी लौटती हैं। यह दोहराव गीत में टेक जैसा काम करता है।आलंकारिक प्रयोग — “पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर,” और “लग रहे हैं वे मुझे यों, माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;”
पहली पंक्ति में एक साथ दो अलंकार हैं — ‘वज्र-भुज’ में रूपक (कोई वाचक शब्द नहीं, सीधा आरोप) और ‘नवनीत-सा उर’ में उपमा (वाचक शब्द ‘सा’ मौजूद)। दूसरी पंक्ति में ‘ज्यों’ वाचक शब्द के साथ उपमा है — बादल ऐसे लगते हैं जैसे माँ ने आँगन लीप दिया हो।
और उदाहरण: अनुप्रास — “बोल में बादल गरजता”; मानवीकरण — “झाड़ आँखें बंद करके साँस सुस्थिर मंद करके”; अतिशयोक्ति — “एक छिन सौ बरस है रे”; विरोधाभास — “आज का दिन दिन नहीं है”।प्राकृतिक दृश्यों और भावों का संयोजन — “आज पानी गिर रहा है… प्राण मन घिरता रहा है,”
यह कविता की पहली ही चौपाई है और इसमें प्रकृति तथा भाव एक-दूसरे में गुँथे हुए हैं। तीन पंक्तियाँ बाहर के पानी की हैं और चौथी भीतर के मन की; और दोनों को जोड़ने वाला शब्द है — गिरता / घिरता। यही ढाँचा पूरी कविता में लौटता है।
वैकल्पिक उदाहरण: “अभी पानी थम गया है, मन निहायत नम गया है,” — बाहर थमना, भीतर नम होना। और “गिर रहा पानी झरा-झर… काँपते हैं प्राण थर-थर”।संबोधनात्मकता — “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन, / तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें,”
यहाँ कवि सावन को सीधे पुकार रहा है — और वह भी दो बार ‘हे’ लगाकर। यही कविता की संबोधनात्मकता का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। इसी कारण सावन एक जड़ मौसम न रहकर एक जीवित दूत बन जाता है।
वैकल्पिक उदाहरण: “हवा, उनको धीर देना, यह नहीं जी चीर देना,” (हवा को संबोधन); “आदमी के उर बिचारे, किसलिए इतनी तृषा रे,” (अपने ही हृदय को संबोधन); “तू कि प्रिय से दूर होकर, बह चला रे पूर होकर,” (अपने मन को ‘तू’ कहकर)।