‘घर की याद’ में पिता का चित्र इतने पक्षों से बनाया गया है कि वे किसी एक विशेषण में नहीं समाते — वे एक साथ वज्र भी हैं और नवनीत भी। उनकी प्रमुख विशेषताएँ ये हैं —
| विशेषता | कविता का प्रमाण | इससे क्या पता चलता है |
|---|---|---|
| 1. देह से बलिष्ठ, संकल्प से अटल | “पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर”; “देह एक पहाड़ जैसे” | ‘वज्र’ यानी जिस पर किसी का प्रभाव न पड़े। भुजाएँ और इरादे, दोनों कठोर हैं। |
| 2. हृदय से अत्यंत कोमल | “नवनीत-सा उर”; “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” | नवनीत = ताज़ा मक्खन। बरगद की तरह ज़रा-सी चोट पर भीतर से स्नेह की धार बह निकलती है। |
| 3. निर्भय | “मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें” | डर के दो सबसे बड़े प्रतीकों के सामने भी वे नहीं डिगते। |
| 4. वाणी और कर्म में तेजस्वी | “बोल में बादल गरजता, काम में झंझा लरजता” | बोली में बादल-सी गूँज और काम में आँधी-सी गति — व्यक्तित्व में प्रभाव और वेग दोनों। |
| 5. आस्थावान और अनुशासित | “आज गीता-पाठ करके, दंड दो सौ साठ करके, खूब मुगदर हिला लेकर” | रोज़ का नियम — पहले गीता-पाठ (आत्मा का अभ्यास), फिर दंड और मुगदर (देह का अभ्यास)। |
| 6. वृद्ध होकर भी युवा | “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा, जो अभी भी दौड़ जाएँ, जो अभी भी खिलखिलाएँ” | उम्र ने उनके उत्साह को नहीं छुआ; वे आज भी दौड़ और खिलखिला सकते हैं। |
| 7. वात्सल्य से भरे | “पाँचवाँ मैं हूँ अभागा, जिसे सोने पर सुहागा, पिताजी कहते रहे हैं, प्यार में बहते रहे हैं” | बेटे को ‘सोने पर सुहागा’ कहना — पिता का दुलार मुहावरे में ढलकर आया है। |
| 8. भावुक, पर आँसू छिपाने वाले | “रो पड़े होंगे बराबर, पाँचवें का नाम लेकर”; “कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ, धीर मैं खोता, कहाँ हूँ” | वे रोते हैं और फिर उसी साँस में मुकर जाते हैं — यही उनका सबसे मानवीय पक्ष है। |
| 9. हर संतान की चिंता करने वाले | “एक टहनी कम न हो ले, कम कहाँ कि ख़म न हो ले, ध्यान कितना फिक्र कितनी, डाल जितनी जड़ें उतनी!” | बरगद की तरह — जितनी डालें (संतानें), उतनी ही जड़ें (चिंताएँ)। |