गंगा अध्याय 12 मेरे उत्तर मेरे तर्क

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं? 1. भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता कहाँ और क्यों लिखी? (क) विदेश से मित्र के लिए (ख) युद्धभूमि से जनता के लिए (ग) जेल से परिवार के लिए (घ) यात्रा से किसी संबंधी के लिए
उत्तर

सटीक उत्तर — (ग) जेल से परिवार के लिए

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: पाठ के आरंभ में पुस्तक ने स्वयं यह जानकारी दी है — भवानीप्रसाद मिश्र ने सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय भाग लिया, जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन वर्ष के कारावास का दंड दिया, और जेल में रहते हुए ही उन्होंने ‘घर की याद’ कविता लिखी। कविता का भीतरी प्रमाण भी यही कहता है — कवि बाहर नहीं निकल सकता, इसलिए उसे यह भी पता नहीं चलता कि सबेरा कब हुआ (“ठीक से मैंने न जाना, बहुत सोकर सिर्फ माना”); वह अपने ही मन से कहता है “घर नहीं हूँ बस यही है”; और वह हवा तथा सावन को दूत बनाकर संदेश भिजवाता है, क्योंकि वह स्वयं जा नहीं सकता। और यह संदेश किसे भेजा जा रहा है? पिताजी, माँ, चार भाइयों, चार बहनों, भौजी और सरला को — यानी परिवार को। इसलिए ‘जेल से, परिवार के लिए’ ही पूरी तरह सही है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) विदेश से मित्र के लिएग़लतकविता में कहीं विदेश का संकेत नहीं है — सावन, बरगद, लौकी का बीज, लीपा हुआ आँगन, ये सब भारतीय गाँव के चित्र हैं। और संबोधन मित्र को नहीं, माता-पिता और भाई-बहनों को है।
(ख) युद्धभूमि से जनता के लिएग़लतकविता में कोई युद्ध, शस्त्र या सैनिक नहीं है, और न ही यह ‘जनता’ को संबोधित है। इसमें एक ही आदमी अपने घर को याद कर रहा है।
(ग) जेल से परिवार के लिएसही ✓पुस्तक स्वयं बताती है कि यह कविता 1942 के आंदोलन में मिले तीन वर्ष के कारावास के दौरान जेल में लिखी गई और इसकी केंद्रीय संवेदना ‘परिवार की स्मृति’ है।
(घ) यात्रा से किसी संबंधी के लिएग़लतयात्रा में आदमी आ-जा सकता है; यहाँ कवि की विवशता ही मूल भाव है — “और इस पर बस नहीं है”। यह विवशता यात्रा की नहीं, बंदी होने की है।
प्र2.
2. लगातार बरसता पानी कवि के मन की किस भावना का परिचायक है? (क) उत्साह और आवेग (ख) भय और क्रोध (ग) साहस और उमंग (घ) चिंता और बेचैनी
उत्तर

सटीक उत्तर — (घ) चिंता और बेचैनी

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: कविता की पहली ही चार पंक्तियाँ बाहर के पानी को भीतर के मन से जोड़ देती हैं — “रात-भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है”। ‘गिरना’ बाहर की क्रिया है और ‘घिरना’ भीतर की; जितनी देर पानी गिरता रहा, उतनी देर मन घिरता रहा। इसके तुरंत बाद आता है — “काँपते हैं प्राण थर-थर”, जो बेचैनी का सीधा चित्र है। फिर “आज का दिन दिन नहीं है… एक छिन सौ बरस है रे” — समय का न कटना बेचैनी का सबसे पक्का लक्षण है। और जब बारिश थमती भी है तो कवि कहता है “मन निहायत नम गया है” — यानी भीतर की बरसात नहीं थमी। पूरी कविता में वर्षा कभी उत्सव नहीं बनती; वह हर बार याद, चिंता और छटपटाहट ही जगाती है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) उत्साह और आवेगग़लतहिंदी कविता में वर्षा प्रायः उल्लास का प्रतीक होती है, पर यहाँ नहीं। यहाँ कवि बंद कोठरी में है और वर्षा उसे घर की याद दिलाकर और अकेला कर देती है।
(ख) भय और क्रोधग़लतकविता में कहीं डर या गुस्सा नहीं है — न ब्रिटिश सरकार पर, न भाग्य पर। स्वर शिकायत का नहीं, विनती का है — “उन्हें देते धीर रहना”।
(ग) साहस और उमंगग़लतसाहस कविता में है ज़रूर (“दुख डटकर ठेलता हूँ”), पर वह वर्षा से नहीं जुड़ा। वर्षा तो हर बार घर का चित्र सामने ले आती है — “घर नजर में तिर रहा है”।
(घ) चिंता और बेचैनीसही ✓‘प्राण मन घिरता रहा है’, ‘काँपते हैं प्राण थर-थर’, ‘एक छिन सौ बरस है रे’, ‘मन निहायत नम गया है’ — चारों प्रमाण एक ही दिशा में जाते हैं।
प्र3.
3. कविता में माँ की कैसी छवि उभरती है? (क) कमजोर और निष्क्रिय (ख) स्नेहमयी और दृढ़ (ग) शिक्षित और अनुशासनप्रिय (घ) सरल और उदासीन
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) स्नेहमयी और दृढ़

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: माँ के दोनों पक्ष कविता में साथ-साथ चलते हैं। स्नेह का प्रमाण — “माँ कि जिसकी गोद में सिर, रख लिया तो दुख नहीं फिर” और “माँ कि जिसकी स्नेह-धारा का यहाँ तक भी पसारा”; उसका प्यार जेल तक पसरा हुआ है। दृढ़ता का प्रमाण — जब पिताजी रो पड़ते हैं तो सँभालने वाली माँ ही होती है: “आँख में किसलिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी”; और फिर वह वाक्य, जो पूरी कविता का सबसे मज़बूत वाक्य है — “पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता”। यानी वह बेटे के जेल जाने को अपनी कोख का गौरव मानती है। साथ ही वह पिता को टूटने से रोकती है — “इस तरह होओ न कच्चे, रो पड़ेंगे और बच्चे”। इस तरह वह ममता भी है और घर का सहारा भी।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) कमजोर और निष्क्रियग़लतयह उलटा है। पूरे घर में जो एक व्यक्ति टूटता नहीं और दूसरों को सँभालता है, वह माँ ही है।
(ख) स्नेहमयी और दृढ़सही ✓‘गोद में सिर रख लिया तो दुख नहीं फिर’ (स्नेह) और ‘कोख को मेरी लजाता’ (दृढ़ता) — दोनों प्रमाण कविता में मौजूद हैं।
(ग) शिक्षित और अनुशासनप्रियग़लतकविता तो साफ़ कहती है — “और माँ बिन-पढ़ी मेरी… उसे लिखना नहीं आता”। वह शिक्षित नहीं है; उसकी ताकत पढ़ाई से नहीं, अनुभव और दुख से आई है — “दुख में वह गढ़ी मेरी”।
(घ) सरल और उदासीनग़लतसरल तो वह है, पर उदासीन बिलकुल नहीं। उदासीन माँ यह नहीं कहती कि ‘रो पड़ेंगे और बच्चे’ — यह तो पूरे घर की चिंता है।
प्र4.
4. “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” पंक्ति के माध्यम से पिता के व्यक्तित्व की कैसी छवि प्रस्तुत की गई है? (क) कर्मठ और सृजनशील (ख) साहसी और पराक्रमी (ग) दृढ़ और संवेदनशील (घ) प्रसन्नचित्त और सक्रिय
उत्तर

सटीक उत्तर — (ग) दृढ़ और संवेदनशील

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: पंक्ति के दो हिस्से जान-बूझकर एक-दूसरे के उलट रखे गए हैं। ‘वज्र-भुज’ — शब्द-संपदा के अनुसार वज्र वह है जो ‘बहुत कठोर हो, जिस पर किसी का प्रभाव न पड़े’; यानी पिता की भुजाएँ और उनका संकल्प अटल हैं। और ‘नवनीत-सा उर’ — नवनीत यानी ताज़ा मक्खन; यानी हृदय इतना कोमल कि ज़रा-सी गरमी में पिघल जाए। एक ही पंक्ति में सबसे कठोर और सबसे कोमल वस्तु को जोड़कर कवि पिता का बहुआयामी रूप गढ़ देता है। कविता आगे इसे प्रमाणित भी करती है — जो पिता ‘मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें’, वही ‘रो पड़े होंगे बराबर, पाँचवें का नाम लेकर’। बरगद वाली उपमा भी यही कहती है — “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए”।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) कर्मठ और सृजनशीलग़लतकर्मठ वे हैं ज़रूर (गीता-पाठ, दो सौ साठ दंड, मुगदर), पर यह बात इस पंक्ति से नहीं निकलती। और ‘सृजनशील’ का कोई संकेत पूरी कविता में नहीं है।
(ख) साहसी और पराक्रमीग़लतयह विकल्प पंक्ति के केवल आधे हिस्से (वज्र-भुज) को पकड़ता है और ‘नवनीत-सा उर’ को छोड़ देता है। अधूरा उत्तर सटीक उत्तर नहीं होता।
(ग) दृढ़ और संवेदनशीलसही ✓‘वज्र’ = दृढ़ता, ‘नवनीत’ = कोमलता/संवेदनशीलता। यही एकमात्र विकल्प है जो पंक्ति के दोनों हिस्सों को समेटता है।
(घ) प्रसन्नचित्त और सक्रियग़लत‘जो अभी भी दौड़ जाएँ, जो अभी भी खिलखिलाएँ’ से यह भाव ज़रूर निकलता है, पर वह अगली पंक्तियों से निकलता है — प्रश्न में दी गई इसी पंक्ति से नहीं।
प्र5.
5. “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” पंक्ति किस ओर संकेत करती है? (क) पिता की कठोरता (ख) पिता की भावुकता (ग) वर्षा की तीव्रता (घ) पिता की निर्बलता
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) पिता की भावुकता

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इस पंक्ति से ठीक पहले कवि पिता के मन को बरगद कह चुका है — “मन कि बड़ का झाड़ जैसे” (‘बड़’ का अर्थ शब्द-संपदा में दिया है — बरगद, वट)। बरगद का एक पत्ता तोड़िए तो उसमें से दूध जैसा सफ़ेद रस तुरंत निकल आता है। कवि इसी प्राकृतिक बात को पिता पर लागू करता है: देह भले पहाड़ जैसी हो, पर ज़रा-सी चोट लगते ही भीतर से स्नेह की धार बह निकलती है। अगली पंक्ति इसे और खोल देती है — “एक हल्की चोट लग ले, दूध की नद्दी उमग ले”। यानी कारण छोटा और प्रतिक्रिया बड़ी — यही भावुकता की पहचान है। इसका प्रमाण कविता में घटित भी होता है: इतना कठोर आदमी पाँचवें का नाम लेकर लगातार रो पड़ता है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) पिता की कठोरताग़लतकठोरता दूसरी पंक्तियों में है — ‘वज्र-भुज’, ‘देह एक पहाड़ जैसे’। यह पंक्ति तो ठीक उसके उलट, भीतर की कोमलता दिखा रही है।
(ख) पिता की भावुकतासही ✓बरगद-रूपक की सीधी व्याख्या — छोटी-सी चोट पर दूध की धार का फूट पड़ना, यानी ज़रा-सी बात पर स्नेह का उमड़ आना।
(ग) वर्षा की तीव्रताग़लतयहाँ ‘धारा’ वर्षा की नहीं, बरगद के दूध की है। संदर्भ पिता के मन का है, आकाश का नहीं।
(घ) पिता की निर्बलताग़लतभावुक होना और निर्बल होना एक बात नहीं। जो ‘मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें’, उन्हें निर्बल कहना कविता के साथ अन्याय होगा।
प्र6.
6. “बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर” पंक्ति में ‘परिताप’ शब्द से क्या संकेत मिलता है? (क) घर का समृद्ध होना (ख) घर की सजावट (ग) घर में दुख का वातावरण (घ) घर की शांति
उत्तर

सटीक उत्तर — (ग) घर में दुख का वातावरण

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: पुस्तक की शब्द-संपदा में ‘परिताप’ का अर्थ दिया है — अत्यधिक दुख, शोक, भय, बहुत गर्मी, अत्यधिक ताप। यहाँ पहला ही अर्थ लागू होता है। पंक्ति की बनावट पर ध्यान दीजिए: पहले कवि कहता है ‘बाप के घर’ — यानी वह घर जहाँ बहन को खुशी-खुशी आना चाहिए था; और तुरंत उसी घर को नाम दे देता है ‘परिताप के घर’। बीच में लगा ‘हाय रे’ बताता है कि यह पीड़ा का उद्गार है। कारण भी स्पष्ट है — घर का पाँचवाँ बेटा जेल में है, इसलिए मायके आई बहन को भी वहाँ खुशी नहीं मिलती। आगे की पंक्तियाँ इसकी पुष्टि करती हैं — “शर्म से रो भी न पाएँ, खूब भीतर छटपटाएँ… आज सबका मन चुआ होगा।”
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) घर का समृद्ध होनाग़लत‘परिताप’ का समृद्धि से कोई संबंध नहीं। कविता में घर की संपत्ति की चर्चा है ही नहीं, केवल संबंधों की है।
(ख) घर की सजावटग़लतयह शब्द के अर्थ से बिलकुल दूर है। ‘ताप’ की ध्वनि सुनकर धोखा हो सकता है, पर शब्द-संपदा का अर्थ ‘अत्यधिक दुख, शोक’ है।
(ग) घर में दुख का वातावरणसही ✓शब्द-संपदा का दिया अर्थ और ‘हाय रे’ का उद्गार, दोनों इसी ओर ले जाते हैं — घर खुशी का घर नहीं, शोक का घर बन गया है।
(घ) घर की शांतिग़लतशांति होती तो ‘हाय रे’ न कहा जाता। और उसी घर के लिए कवि पहले ‘खुशी का पूर’ कह चुका है — यह विरोध ही बताता है कि अब वहाँ शांति नहीं, संताप है।
प्र7.
7. “और कहना मस्त हूँ मैं” पंक्ति में कवि का ऐसा कहना किस बात की ओर संकेत करता है? (क) कवि अपने जीवन में बहुत खुश है। (ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है। (ग) घर के लोगों के प्रति उदासीन है। (घ) कवि प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत है।
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है।

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: ध्यान दीजिए कि कवि यह नहीं कहता कि ‘मैं मस्त हूँ’; वह सावन से कहता है — ‘और कहना मस्त हूँ मैं’। यानी यह उसकी हालत नहीं, वह संदेश है जो घर तक पहुँचाना है। और इसी संदेश के आसपास की पंक्तियाँ सच्चाई खोल देती हैं — “किंतु उनसे यह न कहना”, “हाय रे, ऐसा न कहना, है कि जो वैसा न कहना”, “कह न देना जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ”, “कह न देना मौन हूँ मैं”, “उन्हें कोई शक न देना”। यानी असली हालत यह है कि वह रात-भर जागता है, लोगों से कटा रहता है और चुप हो गया है — और वह चाहता है कि इनमें से कुछ भी घर तक न पहुँचे। पुस्तक की भूमिका भी यही कहती है कि कवि बादल से आग्रह करता है कि वह उन्हें जेल के कष्टों के विषय में न बताए और सांत्वना दे
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) कवि अपने जीवन में बहुत खुश है।ग़लतठीक इसी पंक्ति के पास लिखा है — “यों न कहना अस्त हूँ मैं”। ‘अस्त’ यानी डूबा हुआ। जो सचमुच खुश हो, उसे यह मना करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
(ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है।सही ✓पूरा अंतिम भाग ‘कहना’ और ‘न कहना’ के जोड़े पर टिका है। कवि सच्चाई जानता है, पर उसे घर तक नहीं पहुँचने देना चाहता।
(ग) घर के लोगों के प्रति उदासीन है।ग़लतउदासीन आदमी घर का इतना बारीक चित्र नहीं खींचता — पिताजी का व्यायाम, माँ की गोद, बहन का मायके आना, बेला का फूल। यह तो अत्यधिक लगाव है।
(घ) कवि प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत है।ग़लतप्रकृति के सुंदर चित्र कविता में हैं (‘माँ कि आँगन लीप दे ज्यों’), पर यह पंक्ति प्रकृति की नहीं, घर भेजे जाने वाले संदेश की है।
प्र8.
8. इस कविता में किस बात को प्रमुखता से वर्णित किया गया है? (क) घर की शांति और सुरक्षा (ख) घर के सदस्यों के बीच का संबंध (ग) घर के निर्माण की प्रक्रिया (घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा
उत्तर

सटीक उत्तर — (घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: कविता का शीर्षक ही ‘घर की याद’ है, और पुस्तक ने भूमिका में स्पष्ट लिखा है — “परिवार की स्मृति ही इस कविता की केंद्रीय संवेदना है।” पूरी कविता का ढाँचा भी यही है: बाहर पानी गिरता है → ‘घर नजर में तिर रहा है’ → परिजन एक-एक करके याद आते हैं → और अंत में कवि सावन से विनती करता है कि वे मेरे लिए न तरसें। साथ ही अकेलेपन की पीड़ा भी जगह-जगह फूटती है — “एक छिन सौ बरस है रे”, “घर नहीं हूँ बस यही है”, “कह न देना जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ”, “खुद न समझूँ कौन हूँ मैं”। यानी कविता में याद और अकेलापन — दोनों साथ-साथ चलते हैं, और यही विकल्प (घ) कहता है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) घर की शांति और सुरक्षाग़लतकविता का घर इस समय शांत नहीं है — वह ‘परिताप के घर’ है, जहाँ सब रो रहे हैं। और सुरक्षा की बात कहीं नहीं आती।
(ख) घर के सदस्यों के बीच का संबंधग़लतयह आधा सच है — संबंधों का चित्र ज़रूर है, पर वह अपने आप में विषय नहीं। वे संबंध याद आते हैं, क्योंकि कवि उनसे दूर है। कारण छोड़कर केवल परिणाम बताना अधूरा उत्तर है।
(ग) घर के निर्माण की प्रक्रियाग़लतकविता में मकान बनाने की कोई बात नहीं। यहाँ ‘घर’ ईंट-गारे का नहीं, संबंधों और भावनाओं का घर है।
(घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ासही ✓शीर्षक, पुस्तक की भूमिका (‘परिवार की स्मृति ही केंद्रीय संवेदना है’) और कविता की टेक — तीनों इसी उत्तर की पुष्टि करते हैं।
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