सरल अर्थ — (अरे मन!) तू तो ज़रा-सा है — इतना बड़ा दुख भला कितना सह सकेगा? और इस दुख पर किसी का वश भी नहीं चलता; और जिस चीज़ पर वश न हो, उसमें कोई रस भी नहीं रह जाता।
| शिल्प का पक्ष | पंक्ति में कैसे काम कर रहा है |
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| शब्द-चमत्कार | बस (वश/अधिकार) और रस की तुक। यह ‘बस’ आगे चलकर ‘घर नहीं हूँ बस यही है / यह बस बड़ा बस है’ में फिर लौटेगा और अर्थ बदल लेगा — यह यमक जैसा प्रयोग है। |
| आत्म-संबोधन | कवि अपने ही मन को ‘तू’ कहकर पुकारता है — इससे कविता में संबोधनात्मकता और आत्म-संवाद, दोनों आ जाते हैं। |
| प्रश्न-शैली | ‘सह सकेगा क्या कि इतना’ — प्रश्न पूछकर कहना, ताकि उत्तर पाठक स्वयं दे। इससे पीड़ा और तीखी हो जाती है। |