सरल अर्थ — (माँ की बात सुनकर) पिताजी ने कहा होगा — हाय, उस बेचारे ने कितना सहा होगा! और फिर तुरंत सँभलकर कहा होगा — कहाँ, मैं कहाँ रो रहा हूँ? मैं अपना धीरज कहाँ खो रहा हूँ?
| शिल्प का पक्ष | पंक्ति में कैसे काम कर रहा है |
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| अलंकार | वक्रोक्ति-सा प्रभाव — कथन का अर्थ उसके शब्दों से उलटा है। साथ ही पुनरुक्ति — ‘कहाँ … कहाँ हूँ … कहाँ हूँ’। |
| शब्द-संपदा | धीर = जिसका चित्त विचलित न हो, दृढ़, गंभीर। ‘धीर खोना’ यानी धैर्य छोड़ देना। |
| संवाद-शैली | छंद पूरा का पूरा पिता की बोली में है, और उसमें दो अलग स्वर हैं — पहले टूटना, फिर सँभलना। यही कविता की नाट्यात्मकता है। |
| तुक | कहा होगा – सहा होगा; कहाँ हूँ – कहाँ हूँ (आवृत्तिमूलक तुक)। |