गंगा अध्याय 12 व्याकरण की बात

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. “आज सबका मन चुआ होगा।” — उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द कवि की क्षेत्रीय/स्थानीय भाषा का शब्द है। कविता में स्थानीय भाषा के शब्दों का सहज प्रयोग हुआ है। कविता से कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। उनमें रेखांकित शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए। • एक छिन सौ बरस है रे • तुझे बतलाता कि बेला / ने फलानी फूल झेला • और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला • मन कि बड़ का झाड़ जैसे
उत्तर

पहले उदाहरण वाला शब्द देखिए — चुआ (‘आज सबका मन चुआ होगा।’)। ‘चुआ’ का अर्थ है टपका, बूँद-बूँद गिरा; यहाँ भाव है ‘सबका मन भर आया, सबकी आँखें भीग गईं’। मानक हिंदी में हम ‘टपका’ कहेंगे, पर कवि की बोली का ‘चुआ’ यहाँ कहीं अधिक सहज लगता है। अब चारों रेखांकित शब्द —

पंक्तिरेखांकित शब्दअर्थ (मानक हिंदी रूप)नया वाक्य
“एक छिन सौ बरस है रे”छिनक्षण, पल, बहुत थोड़ा-सा समय। ‘क्षण’ का देशज/बोलचाल रूप।दादी को देखते ही थकान एक छिन में उतर गई।
“तुझे बतलाता कि बेला / ने फलानी फूल झेला”फलानीअमुक, कोई विशेष (व्यक्ति या वस्तु), फलाँ। शब्द-संपदा में — ‘कोई आदिष्ट (व्यक्ति या वस्तु), अमुक’। यहाँ अर्थ है — बेला के फलाँ पौधे ने फूल दिया।वह हर बार यही कहता है कि फलाना काम कल कर दूँगा, और कल कभी आता नहीं।
“और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला”भौजीभाभी, भाई की पत्नी। ‘भाभी’ का घरेलू, स्नेह भरा बोली-रूप।भौजी ने आते ही रसोई सँभाल ली और सबके लिए चाय बना दी।
“मन कि बड़ का झाड़ जैसे”बड़बरगद, वट (शब्द-संपदा — ‘बरगद, वट’)। ‘वट’ से बना बोली-रूप।गाँव के बड़ के नीचे हर शाम बुज़ुर्ग बैठकर बातें करते हैं।
ऐसे शब्द कविता में क्यों हैं: भवानीप्रसाद मिश्र मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) के हैं, और यह कविता उनके अपने घर की कविता है। घर की बात घर की भाषा में ही सच्ची लगती है। यदि कवि ‘छिन’ की जगह ‘क्षण’, ‘भौजी’ की जगह ‘भ्रातृजाया’ और ‘बड़’ की जगह ‘वटवृक्ष’ लिख देता, तो अर्थ वही रहता पर अपनापन चला जाता। इसी को पुस्तक ‘लोकभाषा की सहजता’ कहती है।
और भी देखिए: कविता में ऐसे कई शब्द हैं — नद्दी (नदी), हेटे (तुच्छ, कमतर), बिचकें (सहमें), पूर (भरपूर, बाढ़), झारी (टोंटीदार बर्तन), मुगदर (व्यायाम का उपकरण), तरला (तरल, चंचल)। इनके साथ-साथ उर्दू के रोज़मर्रा शब्द भी हैं — निहायत, फिक्र, ख्याल, शक, मस्त, वजन। इसी मिली-जुली भाषा से कविता बातचीत जैसी बन जाती है।
प्र2.
2. नीचे दी गई कविता की पंक्तियों में आए शब्दों की व्याकरणिक पहचान लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है। — (क) “बहुत पानी गिर रहा है” • ‘पानी’ शब्द है — संज्ञा • ‘बहुत’ शब्द है — विशेषण • ‘गिर रहा है’ है — क्रिया
उत्तर

यह पुस्तक का अपना दिया हुआ उदाहरण है। इसे ठीक से समझ लेने पर आगे के सारे उत्तर आसान हो जाएँगे।

शब्दशब्द-भेदउपभेदकारण
पानीसंज्ञाद्रव्यवाचक संज्ञायह किसी वस्तु का नाम है — और ऐसी वस्तु का, जिसे गिना नहीं, नापा-तौला जाता है। इसीलिए इसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं। (कुछ पुस्तकें इसे जातिवाचक के अंतर्गत भी रखती हैं।)
बहुतविशेषणपरिमाणवाचक विशेषण (अनिश्चित परिमाणवाचक)यह ‘पानी’ की मात्रा बता रहा है — कितना पानी? बहुत। संज्ञा की विशेषता बताने वाला शब्द विशेषण होता है; यहाँ विशेष्य ‘पानी’ है। मात्रा अनिश्चित है, इसलिए अनिश्चित परिमाणवाचक।
गिर रहा हैक्रियाअकर्मक क्रिया, अपूर्ण वर्तमान कालयह काम होने का बोध कराती है। ‘गिर’ मुख्य क्रिया है और ‘रहा है’ सहायक क्रिया, जो बताती है कि काम अभी चल रहा है। इसका कोई कर्म नहीं है (‘क्या गिर रहा है?’ का उत्तर कर्ता ‘पानी’ ही है), इसलिए अकर्मक।
पहचानने का सरल तरीका:
  • संज्ञा — किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, भाव या जाति का नाम। (पानी, बदन, पत्ता, सावन)
  • सर्वनाम — संज्ञा के बदले आने वाला शब्द। (वह, जिनको, मेरे)
  • विशेषण — संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाला शब्द। (बहुत, खुले, एक, सजीले)
  • क्रिया — किसी काम के होने या करने का बोध कराने वाला शब्द। (गिर रहा है, व्यापा, फिरता, फूट जाए)
सबसे आसान जाँच यह है — शब्द से पहले या बाद में प्रश्न लगाकर देखिए: ‘कौन/क्या?’ का उत्तर मिले तो संज्ञा या सर्वनाम; ‘कैसा/कितना/कौन-सा?’ का उत्तर मिले तो विशेषण; ‘क्या हुआ/क्या किया?’ का उत्तर मिले तो क्रिया।
प्र3.
(ख) “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा” • ‘बुढ़ापा’ शब्द है — • ‘व्यापा’ शब्द है — • ‘जिनको’ शब्द है —
उत्तर

पूरी पहचान इस प्रकार है —

शब्दशब्द-भेदउपभेदकारण
बुढ़ापासंज्ञाभाववाचक संज्ञायह किसी वस्तु या व्यक्ति का नाम नहीं, एक अवस्था या दशा का नाम है, जिसे छुआ या देखा नहीं जा सकता — केवल अनुभव किया जा सकता है। यह विशेषण ‘बूढ़ा’ में ‘पा’ प्रत्यय जोड़कर बना है (बूढ़ा + पा = बुढ़ापा), और विशेषण से बनी संज्ञा प्राय: भाववाचक ही होती है। इसी तरह — मीठा → मिठास, बच्चा → बचपन।
व्यापाक्रियाअकर्मक क्रिया, सामान्य भूतकाल (यहाँ निषेध के साथ — ‘नहीं व्यापा’)‘व्यापना’ का अर्थ है — फैलना, समा जाना, असर करना। यह काम होने का बोध कराता है, इसलिए क्रिया है। इसका कर्ता ‘बुढ़ापा’ है और इसका अपना कोई कर्म नहीं है, इसलिए अकर्मक। ‘नहीं’ के कारण यह निषेधवाचक वाक्य बन गया है — अर्थात् बुढ़ापे का असर उन पर एक क्षण भी नहीं हुआ।
जिनकोसर्वनामसंबंधवाचक सर्वनाम (‘जो’ का बहुवचन रूप + ‘को’ विभक्ति)यह ‘पिताजी’ के स्थान पर आया है और आगे के वाक्यांश को पहले से जोड़ता है — ‘पिताजी, जिनको बुढ़ापा नहीं व्यापा’। जो सर्वनाम दो उपवाक्यों में संबंध जोड़ता है, वह संबंधवाचक सर्वनाम कहलाता है (जो–सो, जिसे, जिनको, जिनका)। यहाँ आदर के कारण बहुवचन रूप ‘जिनको’ प्रयुक्त हुआ है।
पंक्ति का अर्थ भी देख लीजिए: “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा” — अर्थात् वे पिताजी, जिन पर बुढ़ापे का एक क्षण के लिए भी असर नहीं हुआ। यही पंक्ति कविता में दो बार आती है — पहली बार उनकी ताकत बताने के लिए और दूसरी बार उनके रोने से ठीक पहले।
ध्यान दीजिए: ‘एक’ (संख्यावाचक विशेषण), ‘क्षण’ (संज्ञा), ‘भी’ (निपात) और ‘नहीं’ (निषेधवाचक क्रिया-विशेषण) — इसी पंक्ति के ये शब्द भी पहचानने का अच्छा अभ्यास हैं।
प्र4.
(ग) “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह” • ‘खुले’ शब्द है — • ‘वह’ शब्द है — • ‘बदन’ शब्द है — • ‘फिरता’ शब्द है —
उत्तर

पूरी पहचान इस प्रकार है —

शब्दशब्द-भेदउपभेदकारण
खुलेविशेषणगुणवाचक विशेषणयह ‘सिर’ की अवस्था/गुण बता रहा है — कैसा सिर? खुला हुआ (यानी बिना पगड़ी या टोपी के)। संज्ञा की विशेषता बताने वाला शब्द विशेषण है; यहाँ विशेष्य ‘सिर’ है। ‘नंगे’ भी ठीक इसी तरह ‘बदन’ का गुणवाचक विशेषण है।
वहसर्वनामपुरुषवाचक सर्वनाम (अन्य पुरुष, एकवचन)यह किसी व्यक्ति के नाम के बदले आया है — यहाँ ‘भवानी’ के बदले। जो सर्वनाम बोलने वाले, सुनने वाले या किसी तीसरे के लिए आते हैं, वे पुरुषवाचक कहलाते हैं; ‘वह’ अन्य पुरुष (तीसरे व्यक्ति) का सर्वनाम है। (यही ‘वह’ यदि किसी संज्ञा से पहले आ जाए — जैसे ‘वह लड़का’ — तो निश्चयवाचक/सार्वनामिक विशेषण बन जाता है; यहाँ ऐसा नहीं है, यह अकेला खड़ा है।)
बदनसंज्ञाजातिवाचक संज्ञा‘बदन’ का अर्थ है शरीर, देह। यह किसी एक व्यक्ति के शरीर का नाम नहीं, पूरी जाति (हर प्राणी के शरीर) का नाम है, इसलिए जातिवाचक संज्ञा है।
फिरताक्रियाअकर्मक क्रिया; यहाँ ‘घूमता फिरता’ के रूप में संयुक्त क्रियायह काम होने का बोध कराता है — इधर-उधर चलना-भटकना। इसका कोई कर्म नहीं है, इसलिए अकर्मक। ध्यान दीजिए कि कविता में ‘घूमता फिरता’ एक साथ आया है; ऐसे दो क्रिया-रूप मिलकर एक ही अर्थ देते हैं, तो उसे संयुक्त क्रिया कहा जाता है।
पंक्ति का अर्थ: “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह” — वह (भवानी) खुले सिर और नंगे बदन, मस्ती में घूमता-फिरता रहता था। यह वर्षा में भीगते हुए घूमने का चित्र है, जो पिता की स्मृति में आज तक ताज़ा है।
अभ्यास के लिए: इसी पंक्ति का ‘मगन’ शब्द भी विशेषण है (गुणवाचक — कैसा घूमता है? मगन होकर), और ‘सिर’ जातिवाचक संज्ञा है।
प्र5.
(घ) “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” • ‘एक’ शब्द है — • ‘फूट जाए’ है — • ‘पत्ता’ शब्द है —
उत्तर

पूरी पहचान इस प्रकार है —

शब्दशब्द-भेदउपभेदकारण
एकविशेषणसंख्यावाचक विशेषण (निश्चित संख्यावाचक)यह ‘पत्ता’ की संख्या बता रहा है — कितने पत्ते? एक। संख्या स्पष्ट और निश्चित है, इसलिए निश्चित संख्यावाचक विशेषण। (यदि ‘कुछ पत्ते’ होता तो अनिश्चित संख्यावाचक कहलाता।)
फूट जाएक्रियासंयुक्त क्रिया, अकर्मक; संभावनार्थ रूप‘फूट’ मुख्य क्रिया है और ‘जाए’ सहायक (रंजक) क्रिया, जो काम के पूरा हो जाने का भाव जोड़ती है। दो क्रियाएँ मिलकर एक ही अर्थ दे रही हैं, इसलिए यह संयुक्त क्रिया है। इसका कोई कर्म नहीं (धारा स्वयं फूटती है), इसलिए अकर्मक। ‘जाए’ रूप के कारण इसमें संभावना का भाव है — ‘यदि फूट जाए तो’।
पत्तासंज्ञाजातिवाचक संज्ञायह किसी एक विशेष पत्ते का नाम नहीं, पूरी जाति (सभी पेड़ों के पत्तों) का नाम है, इसलिए जातिवाचक संज्ञा। इसी पंक्ति का ‘धारा’ भी जातिवाचक संज्ञा है।
पंक्ति का अर्थ और महत्त्व: “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” — बरगद का एक पत्ता टूटे और उसमें से दूध-सी धारा फूट पड़े। यह पिताजी की भावुकता का प्रतीक है, और ‘मेरे उत्तर मेरे तर्क’ के प्रश्न 5 का आधार भी यही पंक्ति है (सही उत्तर — पिता की भावुकता)।
अभ्यास के लिए: इसी पंक्ति में ‘टूट जाए’ भी संयुक्त अकर्मक क्रिया है, और ‘बस’ यहाँ क्रिया-विशेषण/निपात की तरह प्रयुक्त हुआ है (अर्थ — केवल इतना ही होना काफ़ी है)।
प्र6.
(ङ) “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन” • ‘सजीले’ शब्द है — • ‘मेरे’ शब्द है — • ‘सावन’ शब्द है —
उत्तर

पूरी पहचान इस प्रकार है —

शब्दशब्द-भेदउपभेदकारण
सजीलेविशेषणगुणवाचक विशेषणयह ‘सावन’ का गुण बता रहा है — कैसा सावन? सजीला, यानी सजा-धजा, शोभायमान। इसी पंक्ति का ‘हरे’ भी सावन का गुणवाचक विशेषण है। संबोधन में आने के कारण दोनों का रूप ‘सजीले, हरे’ हो गया है।
मेरेसर्वनामपुरुषवाचक सर्वनाम ‘मैं’ का संबंधकारक (संबंधवाचक) रूप; यहाँ संज्ञा से पहले आने के कारण यह सार्वनामिक विशेषण की भूमिका निभा रहा है‘मेरे’ बना है उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम ‘मैं’ से — मैं → मेरा/मेरे/मेरी। इसलिए मूल रूप से यह सर्वनाम है। पर यहाँ यह अकेला नहीं खड़ा; यह ‘पुण्य पावन (सावन)’ से पहले आकर बता रहा है कि वह किसका है — यानी विशेषण का काम कर रहा है। ऐसे सर्वनाम को व्याकरण में सार्वनामिक विशेषण कहते हैं।
सावनसंज्ञाव्यक्तिवाचक संज्ञा‘सावन’ (श्रावण) एक विशेष महीने का नाम है, कोई जाति या वर्ग नहीं। महीनों, दिनों, नदियों, पर्वतों और व्यक्तियों के नाम व्यक्तिवाचक संज्ञा होते हैं। यहाँ कवि इसी सावन को संबोधित कर रहा है, इसलिए यह मानो एक व्यक्ति बन गया है।
पंक्ति का अर्थ: “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन” — हे सजे-धजे, हरे-भरे सावन! हे मेरे पवित्र और पुण्यमय सावन! यह पूरी कविता की टेक है और संबोधनात्मकता का सबसे स्पष्ट उदाहरण भी। यहाँ ‘हे’ संबोधनसूचक अव्यय (विस्मयादिबोधक) है, और ‘पुण्य’, ‘पावन’ भी सावन के गुणवाचक विशेषण हैं।
याद रखिए: कोई शब्द अपने आप में किसी भेद का नहीं होता — वाक्य में उसकी भूमिका से उसका भेद तय होता है। ‘मेरे’ अकेला आए (‘यह मेरे लिए है’) तो सर्वनाम; संज्ञा से पहले आए (‘मेरे सावन’) तो सार्वनामिक विशेषण। इसी तरह ‘वह’ अकेला आए तो सर्वनाम, संज्ञा से पहले आए तो निश्चयवाचक विशेषण।
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