प्र1.
1. “आज सबका मन चुआ होगा।” — उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द कवि की क्षेत्रीय/स्थानीय भाषा का शब्द है। कविता में स्थानीय भाषा के शब्दों का सहज प्रयोग हुआ है। कविता से कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। उनमें रेखांकित शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए। • एक छिन सौ बरस है रे • तुझे बतलाता कि बेला / ने फलानी फूल झेला • और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला • मन कि बड़ का झाड़ जैसे
उत्तर
पहले उदाहरण वाला शब्द देखिए — चुआ (‘आज सबका मन चुआ होगा।’)। ‘चुआ’ का अर्थ है टपका, बूँद-बूँद गिरा; यहाँ भाव है ‘सबका मन भर आया, सबकी आँखें भीग गईं’। मानक हिंदी में हम ‘टपका’ कहेंगे, पर कवि की बोली का ‘चुआ’ यहाँ कहीं अधिक सहज लगता है। अब चारों रेखांकित शब्द —
| पंक्ति | रेखांकित शब्द | अर्थ (मानक हिंदी रूप) | नया वाक्य |
|---|---|---|---|
| “एक छिन सौ बरस है रे” | छिन | क्षण, पल, बहुत थोड़ा-सा समय। ‘क्षण’ का देशज/बोलचाल रूप। | दादी को देखते ही थकान एक छिन में उतर गई। |
| “तुझे बतलाता कि बेला / ने फलानी फूल झेला” | फलानी | अमुक, कोई विशेष (व्यक्ति या वस्तु), फलाँ। शब्द-संपदा में — ‘कोई आदिष्ट (व्यक्ति या वस्तु), अमुक’। यहाँ अर्थ है — बेला के फलाँ पौधे ने फूल दिया। | वह हर बार यही कहता है कि फलाना काम कल कर दूँगा, और कल कभी आता नहीं। |
| “और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला” | भौजी | भाभी, भाई की पत्नी। ‘भाभी’ का घरेलू, स्नेह भरा बोली-रूप। | भौजी ने आते ही रसोई सँभाल ली और सबके लिए चाय बना दी। |
| “मन कि बड़ का झाड़ जैसे” | बड़ | बरगद, वट (शब्द-संपदा — ‘बरगद, वट’)। ‘वट’ से बना बोली-रूप। | गाँव के बड़ के नीचे हर शाम बुज़ुर्ग बैठकर बातें करते हैं। |
ऐसे शब्द कविता में क्यों हैं: भवानीप्रसाद मिश्र मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) के हैं, और यह कविता उनके अपने घर की कविता है। घर की बात घर की भाषा में ही सच्ची लगती है। यदि कवि ‘छिन’ की जगह ‘क्षण’, ‘भौजी’ की जगह ‘भ्रातृजाया’ और ‘बड़’ की जगह ‘वटवृक्ष’ लिख देता, तो अर्थ वही रहता पर अपनापन चला जाता। इसी को पुस्तक ‘लोकभाषा की सहजता’ कहती है।
और भी देखिए: कविता में ऐसे कई शब्द हैं — नद्दी (नदी), हेटे (तुच्छ, कमतर), बिचकें (सहमें), पूर (भरपूर, बाढ़), झारी (टोंटीदार बर्तन), मुगदर (व्यायाम का उपकरण), तरला (तरल, चंचल)। इनके साथ-साथ उर्दू के रोज़मर्रा शब्द भी हैं — निहायत, फिक्र, ख्याल, शक, मस्त, वजन। इसी मिली-जुली भाषा से कविता बातचीत जैसी बन जाती है।