गंगा अध्याय 12 गतिविधियाँ

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. कवि ने कविता में अपने परिवार का उल्लेख किया है। आप भी अपना एक परिवार-वृक्ष तैयार कीजिए और प्रत्येक सदस्य के व्यक्तित्व के बारे में कुछ पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर

पहले देखिए कि कवि का अपना परिवार-वृक्ष कविता से किस तरह बनता है — यही आपका आदर्श नमूना है।

सदस्यकविता का प्रमाणव्यक्तित्व
पिताजी“पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर”; “आज गीता-पाठ करके, दंड दो सौ साठ करके”बाहर से कठोर, भीतर से मक्खन-सा कोमल; निर्भय, अनुशासित और गहरे वात्सल्य से भरे।
माँ“और माँ बिन-पढ़ी मेरी, दुख में वह गढ़ी मेरी”; “पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता”अनपढ़ पर सबसे समझदार; स्नेहमयी और अत्यंत दृढ़; पूरे घर को सँभालने वाली।
चार भाई“चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें”घर की ‘भुजा’ यानी बल; खेलते-कूदते, और भाई की याद में ‘पागल’ हो जाने वाले।
चार बहनें“मायके में बहिन आई”; “भाई पागल, बहिन पागल”घर का ‘प्यार’; मायके आई बहन, जिसे आज उसी घर में परिताप मिला।
भौजी“और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला”सहज, कोमल, भावुक — पानी की तरह तरल।
सरला“और भौजी और सरला”घर की एक और सदस्या, जो भौजी की तरह ही चुपचाप भीतर-भीतर दुख सह रही है।
कवि स्वयं (‘पाँचवाँ’)“पाँचवाँ मैं हूँ अभागा, जिसे सोने पर सुहागा”पिता का सबसे दुलारा, जो आज जेल में है और अपना दुख छिपाकर घर को धीरज बँधा रहा है।
अपना परिवार-वृक्ष कैसे बनाएँ:
  1. एक बड़ा कागज़ लीजिए। सबसे ऊपर दादा-दादी/नाना-नानी, बीच में माता-पिता, चाचा-चाची, बुआ, और नीचे अपनी पीढ़ी — भाई-बहन, चचेरे-ममेरे भाई-बहन।
  2. पति-पत्नी को क्षैतिज रेखा से और माता-पिता तथा संतान को खड़ी रेखा से जोड़िए।
  3. हर नाम के नीचे 2–3 पंक्तियाँ लिखिए — पर केवल गुण मत गिनाइए; कवि की तरह कोई छोटी-सी असली बात लिखिए, जिससे वह व्यक्ति दिखाई देने लगे।
  4. घर के बुज़ुर्गों से पूछकर एक-दो पुराने नाम और जोड़िए — इससे वृक्ष एक पीढ़ी और ऊपर तक जाएगा।

नमूना उत्तर (दो सदस्यों का विवरण):

दादाजी — उम्र अस्सी के करीब है, पर आज भी सुबह पाँच बजे उठ जाते हैं। बिना छड़ी के मंदिर तक जाते हैं और लौटते समय पड़ोस के हर बच्चे से नाम लेकर बात करते हैं। उन्हें गुस्सा बहुत कम आता है, पर जब कोई झूठ बोलता है तो वे केवल चुप हो जाते हैं — और वह चुप्पी डाँट से ज़्यादा असर करती है।

माँ — माँ स्कूल में पढ़ाती हैं, पर घर में सबसे पहले उठती हैं और सबसे बाद में सोती हैं। उन्हें हिसाब बहुत साफ़ रखना पसंद है; पुरानी कॉपियों तक का हिसाब उनके पास है। जब भी घर में कोई परेशान होता है, वे बिना पूछे उसकी पसंद का खाना बना देती हैं — यही उनका ढाढ़स बँधाने का तरीका है।

प्र2.
2. कविता में प्रयुक्त ध्वनि आधारित शब्द (जैसे– झरा-झर, थर-थर, सर-सर) को पढ़कर एक छोटी-सी ऑडियो रिकॉर्डिंग या मौखिक पाठ तैयार कीजिए। बताइए कि ये शब्द कविता में कैसे वातावरण का निर्माण करते हैं?
उत्तर

यह गतिविधि दो हिस्सों की है — पहले पाठ करना, फिर यह बताना कि ये शब्द वातावरण कैसे बनाते हैं।

ऑडियो रिकॉर्डिंग/मौखिक पाठ कैसे तैयार करें:
  1. पहले पूरा अंश दो-तीन बार धीरे-धीरे पढ़िए — “गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, / बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर”
  2. हर पंक्ति के अंत वाले ध्वनि-शब्द पर ज़रा-सा ठहरिए और उसे थोड़ा खींचकर बोलिए — झ-रा-झर, ह-रा-हर।
  3. स्वर बदलिए: ‘झरा-झर’ में पानी जैसी गति, ‘सर-सर’ में हल्की फुसफुसाहट, और ‘थर-थर’ में हल्की काँपती आवाज़ — तीनों अलग सुनाई देनी चाहिए।
  4. चौथी पंक्ति (‘काँपते हैं प्राण थर-थर’) पहली तीन से धीमी पढ़िए, क्योंकि वहाँ कविता बाहर से भीतर मुड़ जाती है।
  5. चाहें तो पीछे बहुत हल्की बारिश की आवाज़ रख सकते हैं — पर इतनी नहीं कि शब्द दब जाएँ।
  6. रिकॉर्डिंग 30–45 सेकंड की रखिए। एक बार सुनकर देखिए — यदि आँख बंद करने पर बारिश सुनाई दे, तो पाठ सफल है।

नमूना उत्तर — ये शब्द वातावरण कैसे बनाते हैं:

शब्दकिसकी ध्वनिवातावरण पर असर
झरा-झरलगातार गिरते पानी की‘झ’ की तीखी ध्वनि पानी के तेज़ गिरने का बोध कराती है; लगता है बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही।
हरा-हरहिलते हुए गीले पत्तों की‘ह’ की हल्की, साँस-सी ध्वनि से पत्तों का धीमे-धीमे हिलना सुनाई देने लगता है।
सर-सरबहती हवा कीयह ध्वनि दृश्य को खुला और गतिशील बना देती है — हवा अब चित्र में शामिल हो जाती है।
थर-थरकाँपते हुए प्राणों कीयही सबसे महत्त्वपूर्ण है — पहली तीन ध्वनियाँ बाहर की थीं, यह भीतर की है। इससे बाहर की बारिश सीधे कवि के मन में उतर आती है।

इन शब्दों को ध्वन्यात्मक या अनुकरणात्मक शब्द कहा जाता है — जो किसी वस्तु की आवाज़ की नकल करके बने हों। पुस्तक ने स्वयं इन्हीं पंक्तियों के बारे में लिखा है कि ‘यहाँ शब्दों का चयन और संयोजन इस प्रकार किया गया है कि कविता में ध्वन्यात्मकता और नाद सौंदर्य की सृष्टि हुई है’। इनका सबसे बड़ा असर यह है कि पाठक कविता को पढ़ता नहीं, सुनता है — और सुनते ही वह उस बरसती हुई रात में पहुँच जाता है जहाँ कवि बैठा है। यही वातावरण-निर्माण है।

और उदाहरण खोजिए: कविता में ‘अंग-अंग’ जैसी पुनरुक्तियाँ यद्यपि नहीं हैं, पर ऐसे कई शब्द-युग्म मिलेंगे — ‘झड़ी झारी’, ‘झुकें-झाँकें’, ‘घूमता फिरता’, ‘दश-दिशा’, ‘बिन-पढ़ी’। इनमें भी ध्वनि की आवृत्ति से लय बनती है।
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