यह प्रश्न कविता की सबसे मार्मिक पंक्ति से निकला है — “उसे लिखना नहीं आता, जो कि उसका पत्र पाता।” अब कल्पना कीजिए कि उसे लिखना आता तो वह पत्र कैसा होता।
- पत्र का रूप — स्थान, तिथि, संबोधन (‘मेरे प्यारे भवानी’), विषय-वस्तु, समापन और हस्ताक्षर।
- माँ की भाषा — सरल, बोलचाल की, जिसमें ‘छिन’, ‘भौजी’ जैसे घर के शब्द आएँ। बहुत साहित्यिक हिंदी न लिखिए, वरना वह माँ की नहीं रहेगी।
- माँ का स्वभाव — कविता के अनुसार वह स्नेहमयी भी है और दृढ़ भी। इसलिए पत्र में ममता भी हो और हौसला भी। वह रोएगी नहीं, बेटे को कमज़ोर नहीं पड़ने देगी।
- कविता के ब्योरे — पिताजी का गीता-पाठ और दंड, बहन का मायके आना, बेला का फूल, बाड़े की लौकी, भौजी और सरला — इनमें से कुछ का उल्लेख अवश्य कीजिए। इसी से पत्र इसी कविता का पत्र बनेगा।
नमूना उत्तर:
सावन की तीज, सन् 1942
मेरे प्यारे भवानी,
यहाँ सब कुशल है। तुम अपनी कुशल लिखना, और सच लिखना — बनाकर मत लिखना, मैं तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारे अक्षरों से ही पढ़ लूँगी।
आज सवेरे से पानी बरस रहा है। तुम्हें बरसात कितनी प्यारी थी, यह सोचकर सारा दिन तुम्हारी याद आती रही। बाड़े में जो लौकी तुमने बोई थी, उसकी बेल अब मुँडेर तक चढ़ गई है। बेला में भी फूल आए हैं। तुम्हारे पिताजी रोज़ की तरह आज भी गीता पढ़कर, दंड लगाकर, मुगदर हिलाकर नीचे आए — पर आते ही चुप हो गए। मैंने पूछा तो कहने लगे, ‘कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ।’ बेटा, वे रोए थे। तुम्हें बताने को मना किया था, फिर भी लिख रही हूँ, क्योंकि मुझसे छिपाया नहीं जाता।
घर में सब जुड़े हैं। तुम्हारी बहन मायके आई है। भौजी और सरला दिन-भर काम में लगी रहती हैं, पर बात-बात पर आँख भर लेती हैं। छोटे भाई अब भी वही खेल खेलते हैं, बस उनमें एक खिलाड़ी कम है।
अब एक बात कान खोलकर सुन लो। तुम जहाँ हो, ठीक जगह हो। जो रास्ता तुमने पकड़ा है, वह तुम्हारे पिताजी का ही रास्ता है। अगर तुम डरकर पाँव पीछे हटा लेते तो मेरी कोख लजाती। इसलिए वहाँ मन छोटा मत करना, तबीयत का ध्यान रखना, समय पर खाना खाना और रात को जागते मत रहना।
मुझे लिखना नहीं आता था, यह तुम जानते हो। पड़ोस की बिटिया से पूछ-पूछकर यह पत्र लिखवाया है। जितना तुम पढ़ोगे, उससे ज़्यादा जितना मैंने नहीं लिखा, वह समझ लेना।
तुम्हारी राह देखती,
तुम्हारी माँ