गंगा अध्याय 12 सृजन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. कल्पना कीजिए कि कवि की माँ को पत्र लिखना आता है। कविता में वर्णित उनकी छवि और अनुमान के आधार पर लिखिए कि वे कवि के लिए पत्र में क्या-क्या लिखतीं?
उत्तर

यह प्रश्न कविता की सबसे मार्मिक पंक्ति से निकला है — “उसे लिखना नहीं आता, जो कि उसका पत्र पाता।” अब कल्पना कीजिए कि उसे लिखना आता तो वह पत्र कैसा होता।

अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए:
  • पत्र का रूप — स्थान, तिथि, संबोधन (‘मेरे प्यारे भवानी’), विषय-वस्तु, समापन और हस्ताक्षर।
  • माँ की भाषा — सरल, बोलचाल की, जिसमें ‘छिन’, ‘भौजी’ जैसे घर के शब्द आएँ। बहुत साहित्यिक हिंदी न लिखिए, वरना वह माँ की नहीं रहेगी।
  • माँ का स्वभाव — कविता के अनुसार वह स्नेहमयी भी है और दृढ़ भी। इसलिए पत्र में ममता भी हो और हौसला भी। वह रोएगी नहीं, बेटे को कमज़ोर नहीं पड़ने देगी।
  • कविता के ब्योरे — पिताजी का गीता-पाठ और दंड, बहन का मायके आना, बेला का फूल, बाड़े की लौकी, भौजी और सरला — इनमें से कुछ का उल्लेख अवश्य कीजिए। इसी से पत्र इसी कविता का पत्र बनेगा।

नमूना उत्तर:

ग्राम — टिगरिया, होशंगाबाद
सावन की तीज, सन् 1942

मेरे प्यारे भवानी,

यहाँ सब कुशल है। तुम अपनी कुशल लिखना, और सच लिखना — बनाकर मत लिखना, मैं तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारे अक्षरों से ही पढ़ लूँगी।

आज सवेरे से पानी बरस रहा है। तुम्हें बरसात कितनी प्यारी थी, यह सोचकर सारा दिन तुम्हारी याद आती रही। बाड़े में जो लौकी तुमने बोई थी, उसकी बेल अब मुँडेर तक चढ़ गई है। बेला में भी फूल आए हैं। तुम्हारे पिताजी रोज़ की तरह आज भी गीता पढ़कर, दंड लगाकर, मुगदर हिलाकर नीचे आए — पर आते ही चुप हो गए। मैंने पूछा तो कहने लगे, ‘कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ।’ बेटा, वे रोए थे। तुम्हें बताने को मना किया था, फिर भी लिख रही हूँ, क्योंकि मुझसे छिपाया नहीं जाता।

घर में सब जुड़े हैं। तुम्हारी बहन मायके आई है। भौजी और सरला दिन-भर काम में लगी रहती हैं, पर बात-बात पर आँख भर लेती हैं। छोटे भाई अब भी वही खेल खेलते हैं, बस उनमें एक खिलाड़ी कम है।

अब एक बात कान खोलकर सुन लो। तुम जहाँ हो, ठीक जगह हो। जो रास्ता तुमने पकड़ा है, वह तुम्हारे पिताजी का ही रास्ता है। अगर तुम डरकर पाँव पीछे हटा लेते तो मेरी कोख लजाती। इसलिए वहाँ मन छोटा मत करना, तबीयत का ध्यान रखना, समय पर खाना खाना और रात को जागते मत रहना।

मुझे लिखना नहीं आता था, यह तुम जानते हो। पड़ोस की बिटिया से पूछ-पूछकर यह पत्र लिखवाया है। जितना तुम पढ़ोगे, उससे ज़्यादा जितना मैंने नहीं लिखा, वह समझ लेना।

तुम्हारी राह देखती,
तुम्हारी माँ
यह पत्र कविता से कैसे जुड़ा है: इसमें माँ की तीनों विशेषताएँ आ गई हैं — ममता (‘मैं तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारे अक्षरों से ही पढ़ लूँगी’), दृढ़ता (‘पाँव पीछे हटाते तो मेरी कोख लजाती’) और अनपढ़ होने का दुख (‘पड़ोस की बिटिया से पूछ-पूछकर लिखवाया है’)। साथ ही कविता के अपने ब्योरे — बाड़े की लौकी, बेला का फूल, पिताजी का गीता-पाठ, भौजी और सरला — भी पत्र में लौट आए हैं।
प्र2.
2. कविता में माँ और पिताजी के बीच कवि के विषय में की जाने वाली बातचीत का वर्णन है। उनकी इस बातचीत को संवाद-लेखन के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

कविता में यह बातचीत पृष्ठ 196–197 पर आती है — पहले माँ बोलती है (“आँख में किसलिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी”), फिर पिताजी (“कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ”)। नीचे उसी को संवाद-लेखन के रूप में खोला गया है।

संवाद-लेखन में ध्यान रखने की बातें:
  • हर पंक्ति के आरंभ में बोलने वाले का नाम और उसके बाद विराम-चिह्न (:)।
  • कोष्ठक में भाव या क्रिया लिख सकते हैं — (आँचल से आँख पोंछते हुए)।
  • भाषा बोलचाल की हो, जैसी घर में बोली जाती है।
  • संवाद का एक आरंभ, एक मोड़ और एक अंत हो — यहाँ मोड़ है माँ का ‘लीक’ वाला वाक्य।

नमूना उत्तर:

(शाम का समय। बाहर झड़ी लगी है। पिताजी व्यायाम के बाद बरामदे में आकर चुपचाप बैठ गए हैं। माँ हाथ में दीया लिए आती है।)

माँ : (पिताजी का चेहरा देखकर ठिठकते हुए) आज तो पूरा नियम कर लिया आपने — गीता भी, दंड भी, मुगदर भी। फिर यह मुँह क्यों लटका है?
पिताजी : कुछ नहीं। बस… यों ही।
माँ : आँख में किसलिए पानी है, यह भी ‘यों ही’ है?
पिताजी : (मुँह फेरकर) कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ। धीरज खोता कहाँ हूँ मैं।
माँ : मुझसे छिपाइएगा? पचीस बरस हुए इस घर में आए। आपकी आवाज़ का काँपना मैं पहचानती हूँ।
पिताजी : (कुछ देर चुप रहकर) आज सवेरे बच्चे आँगन में खेल रहे थे। गिनने लगा तो… एक कम था। और फिर पानी बरसने लगा। उसे तो बरसात कितनी प्यारी थी। खुले सिर, नंगे बदन घूमता रहता था। बाड़े में लौकी का बीज लगाकर आता और दौड़कर तुम्हें बुला लाता — ‘देखो, बेला में फूल आया!’
माँ : (धीरे से) आया है इस बार भी बेला में फूल।
पिताजी : हाय, कितना सहा होगा उसने। जाने कैसा खाना मिलता होगा, कैसी जगह सोता होगा।
माँ : वहाँ अच्छा है भवानी। और सुनिए — वह आपका ही मन समझकर, आपका ही अपनापन समझकर गया है। गया है सो ठीक ही है। यह तो आपकी ही बनाई हुई लीक है।
पिताजी : (सिर उठाकर) मेरी लीक?
माँ : और किसकी? बचपन से उसने आपके सिवा किसे देखा है? आप डरे कभी? मौत के आगे नहीं हिचके, शेर के आगे नहीं बिचके। वही तो सीखकर गया है।
पिताजी : (हल्के से मुसकराते हुए, फिर गंभीर होकर) पर माँ होकर तुम्हें दुख नहीं होता?
माँ : होता है। पर पाँव जो पीछे हटाता, तो मेरी कोख लजाती। मुझे उस दिन ज़्यादा दुख होता।
पिताजी : (लंबी साँस लेकर) ठीक कहती हो।
माँ : तो अब इस तरह कच्चे मत पड़िए। आपको इस हाल में देखकर बाकी बच्चे भी रो पड़ेंगे। इस घर में एक ही आदमी को मज़बूत रहना है — और वह आप हैं।
पिताजी : (आँख पोंछकर, खड़े होते हुए) चलो, दीया रख दो देहरी पर। बारिश तेज़ हो रही है।
माँ : (दीया रखते हुए, मन-ही-मन) भगवान करे, जहाँ हो, सुखी हो मेरा लाल।
(बाहर पानी की झड़ी लगी रहती है। पर्दा गिरता है।)
यह संवाद क्यों सही है: इसमें कविता की अपनी पंक्तियों को — ‘आँख में किसलिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी’, ‘कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ’, ‘यह तुम्हारी लीक ही है’, ‘कोख को मेरी लजाता’, ‘रो पड़ेंगे और बच्चे’ — बोलचाल के रूप में खोलकर रखा गया है। और दोनों पात्रों का स्वभाव भी कविता जैसा ही रखा गया है: पिता भावुक होकर मुकर जाते हैं, माँ शांत रहकर सँभालती है।
प्र3.
3. इस कविता में कवि ने सावन के बादल को संदेशवाहक बनाया है। अगर आपको किसी प्राकृतिक उपादान के माध्यम से अपने घर, मित्र या किसी संबंधी व्यक्ति को कोई संदेश भेजना हो तो आप किसे चुनेंगे और क्यों?
उत्तर

यह कल्पना-प्रधान प्रश्न है, इसलिए उत्तर में चुनाव + कारण + उस उपादान के गुण + आपका संदेश — चारों होने चाहिए।

अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए:
  • आपने जो उपादान चुना है, उसका कोई गुण आपके संदेश से मेल खाना चाहिए (बादल चुना गया क्योंकि वह चलता है, बरसता है और दूर तक जाता है)।
  • संदेश किसे भेजा जा रहा है और क्यों — यह स्पष्ट हो।
  • दो-चार पंक्तियाँ संबोधन-शैली में लिखिए, जैसे कवि ने ‘हे सजीले हरे सावन’ कहा है।
  • अंत में एक वाक्य में यह भी बताइए कि दूसरे विकल्प क्यों नहीं चुने।

नमूना उत्तर 1 — मैं ‘हवा’ को चुनूँगा/चुनूँगी

मैं अपना संदेश हवा के हाथ भेजूँगा। कारण यह है कि हवा हर जगह पहुँचती है — बंद खिड़की की झिरी से भी, और ऊँची दीवार के ऊपर से भी। उसे किसी रास्ते, किसी टिकट और किसी अनुमति की ज़रूरत नहीं। मुझे अपने दादाजी को संदेश भेजना है, जो गाँव में अकेले रहते हैं और जिनके पास फ़ोन नहीं है। मेरा संदेश यह होगा —

हे धीमे-धीमे चलती हवा!
तू जब उनके आँगन के नीम से गुज़रे, तो ज़रा ठहर जाना।
उनसे कहना — पोता ठीक है, पढ़ रहा है, और छुट्टियों में आ रहा है।
उनके सिर पर हाथ फेरकर आना, पर उन्हें ज़ुकाम मत दे देना।

नमूना उत्तर 2 — मैं ‘नदी’ को चुनूँगा/चुनूँगी

मैं नदी को चुनूँगा, क्योंकि वह एक ही दिशा में, बिना रुके, बिना थके बहती है — और मेरा शहर उसी नदी के किनारे है जहाँ मेरा मित्र रहता है। नदी में दीया बहाकर संदेश भेजने की परंपरा भी हमारे यहाँ है। मेरा संदेश होगा — ‘सखी नदी, बहते-बहते जब उसके घाट पर पहुँचो, तो अपनी लहर से उसका पाँव छू लेना और कह देना कि दोस्ती अब भी वैसी ही है, बस दूरी बढ़ गई है।’

प्राकृतिक उपादानकौन-सा गुण उसे दूत बनाता हैकिस तरह के संदेश के लिए उपयुक्त
बादल (कविता का चुनाव)चलता है, दूर तक जाता है, बरसता है — यानी भावना उँडेल सकता है।विरह और चिंता का संदेश। कालिदास के मेघदूत से यह परंपरा चली आ रही है।
हवाहर जगह पहुँचती है, कोई दीवार उसे नहीं रोकती, छूकर जाती है।चुपचाप कही जाने वाली, कोमल बात। कविता में भी — “हवा, उनको धीर देना”।
नदीलगातार बहती है, एक जगह से दूसरी जगह तक जुड़ी रहती है।निरंतरता और स्मृति का संदेश।
चाँदएक ही चाँद दोनों जगह से दिखाई देता है।‘हम दूर होकर भी एक ही चीज़ देख रहे हैं’ — इस भाव का संदेश।
पंछीउड़ता है, लौट आता है, बोलता है।कुशल-क्षेम की खबर और उत्तर की प्रतीक्षा वाला संदेश।
ध्यान रखिए: उपादान का चुनाव मनमाना नहीं होना चाहिए। कवि ने सावन इसलिए चुना कि वह जेल पर भी बरस रहा है और घर पर भी — यानी वही एक चीज़ है जो दोनों जगह साझा है। आप भी वही चुनिए जिसका कोई गुण आपके संदेश से मिलता हो; तभी उत्तर सार्थक लगेगा।
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