सरल अर्थ — आज पानी बरस रहा है, और खूब बरस रहा है। रात-भर बरसता रहा है। और उसी के साथ-साथ मेरे प्राण और मन भी रात-भर घिरते रहे हैं — यादों और उदासी से।
| शिल्प का पक्ष | पंक्ति में कैसे काम कर रहा है |
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| शब्द-चमत्कार | गिरता / घिरता — केवल एक ध्वनि (ग/घ) का अंतर है, पर अर्थ बाहर से भीतर पलट जाता है। यही इस कविता की पूरी युक्ति का बीज है। |
| पुनरुक्ति | ‘पानी गिर रहा है’ तीन बार लौटता है — इससे बरसात की लगातार चलती रहने वाली ध्वनि पंक्ति में ही सुनाई देने लगती है। |
| तुक | गिर रहा है – घिर रहा है (चरणांत तुक)। पूरी कविता इसी तरह जोड़े-जोड़े में तुक मिलाती चलती है। |
| भाषा | एकदम सहज खड़ी बोली — एक भी कठिन शब्द नहीं। यही भवानीप्रसाद मिश्र की ‘बातचीत जैसी कविता’ वाली शैली है। |