प्र1.
• शिक्षक की सहायता से ऐसी किसी अन्य कविता अथवा कहानी के बारे में जानकारी एकत्रित कीजिए जिसमें घर, परिवार की याद जैसी भावनाएँ चित्रित हों। साथ ही पुस्तकालय अथवा इंटरनेट की सहायता से उस रचना को कक्षा में पढ़कर एक संक्षिप्त प्रस्तुति दीजिए।
उत्तर
यह एक पुस्तकालय-परियोजना है। नीचे पहले खोज की दिशा दी गई है, फिर एक पूरा नमूना प्रस्तुतीकरण।
कैसे करें:
- शिक्षक से पूछकर दो-तीन रचनाएँ छाँटिए। छोटी रचना चुनिए, ताकि कक्षा में पूरी पढ़ी जा सके।
- रचना पढ़कर तीन बातें नोट कीजिए — रचनाकार, कथ्य (क्या कहा गया है), और दो-तीन सबसे अच्छी पंक्तियाँ।
- प्रस्तुति का ढाँचा रखिए — परिचय → रचना का पाठ → भाव-स्पष्टीकरण → ‘घर की याद’ से तुलना → अपनी राय।
- प्रस्तुति 4–5 मिनट की रखिए और पाठ करते समय भाव के अनुसार स्वर बदलिए।
| रचना | रचनाकार | किस तरह की याद |
|---|---|---|
| तब याद तुम्हारी आती है | रामनरेश त्रिपाठी | इसी पाठ के अंत में ‘साथ-साथ पढ़ें’ में दी गई कविता — प्रकृति के सुंदर क्षणों में ईश्वर की याद। |
| माँ (कविता) / मातृभूमि | मैथिलीशरण गुप्त | माँ और जन्मभूमि के प्रति कृतज्ञता। |
| तीसरी कसम (कहानी) | फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ | गाँव, अपनापन और बिछोह का दर्द। |
| ईदगाह (कहानी) | प्रेमचंद | दादी अमीना के लिए हामिद का प्रेम — घर के प्रति बच्चे की चिंता। |
| मेघदूत | कालिदास | निर्वासित यक्ष अपनी पत्नी को मेघ के हाथ संदेश भेजता है — ‘घर की याद’ की परंपरा का मूल। |
| अकाल और उसके बाद / भूख | नागार्जुन | घर-परिवार के अभावों का यथार्थ चित्र। |
| माँ का आँचल (संस्मरण) | शिवपूजन सहाय | बचपन, माँ और घर की स्मृतियाँ। |
नमूना उत्तर — प्रस्तुति की रूपरेखा (रचना : ‘तीसरी कसम’ — फणीश्वरनाथ ‘रेणु’):
- परिचय — फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ आंचलिक कथाकार हैं, यानी वे किसी एक अंचल (क्षेत्र) के जीवन को उसकी अपनी भाषा और अपने रंगों में लिखते हैं। ‘तीसरी कसम’ उनकी सबसे प्रसिद्ध कहानी है।
- कथ्य — गाड़ीवान हिरामन नौटंकी की नर्तकी हीराबाई को मेले तक पहुँचाता है। रास्ते के तीन दिनों में उनके बीच एक सहज, नाम-रहित अपनापन बन जाता है। अंत में हीराबाई चली जाती है और हिरामन अकेला रह जाता है।
- भाव — कहानी का दुख वही है जो ‘घर की याद’ का है — अपनों से बिछुड़ना। और दोनों जगह वह दुख शोर मचाकर नहीं आता; वह चुपचाप, छोटी-छोटी बातों में आता है।
- ‘घर की याद’ से तुलना — रेणु और भवानीप्रसाद मिश्र, दोनों अपने अंचल की भाषा को रचना में बिना झिझक ले आते हैं। जैसे रेणु के यहाँ मैथिली-भोजपुरी के शब्द आते हैं, वैसे ही यहाँ ‘छिन’, ‘भौजी’, ‘बड़’, ‘नद्दी’ आते हैं। दोनों में विरह का स्वर है, पर मिश्र का विरह घर से है और रेणु का एक साथी से।
- मेरी राय — ‘घर की याद’ पढ़ने के बाद ‘तीसरी कसम’ पढ़ना अच्छा लगता है, क्योंकि दोनों यह सिखाती हैं कि सबसे गहरा दुख वही होता है जिसे आदमी बोलकर नहीं बता पाता।