प्र1.
इस निबंध में लेखक को दो विषयों (‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और ‘समाज-सुधार’) पर निबंध लिखने थे। पिछली कक्षाओं में आपने भी बहुत से विषयों पर अनुच्छेद, संवाद और निबंध लिखे हैं। आपको किन विषयों पर लिखना सरल या कठिन लगा और क्यों?
उत्तर
यह प्रश्न आपके अपने अनुभव का है, इसलिए उत्तर हर विद्यार्थी का अलग होगा। पर एक अच्छा उत्तर तीन बातें ज़रूर बताता है — कौन-सा विषय, सरल/कठिन क्यों, और उससे क्या सीखा।
| विषय किस तरह का | प्रायः सरल लगता है, क्योंकि… | प्रायः कठिन लगता है, क्योंकि… |
|---|---|---|
| अनुभव से जुड़ा (मेरा विद्यालय, वर्षा का एक दिन, मेरी पहली रेल यात्रा) | सामग्री पहले से मन में है; ब्योरे अपने आप याद आते हैं। यही मानटेन वाली पद्धति है। | — |
| बहुत बड़ा और बहसतलब (समाज-सुधार, विज्ञान: वरदान या अभिशाप) | — | विषय की सीमा तय करना कठिन है। लेखक की भी यही शिकायत थी — जिस पर “बड़े-बड़े विज्ञों में भी विरोध है”, उसे पाँच पेज में कैसे लिखा जाए। |
| बहुत छोटा या एक-पंक्ति वाला (दूर के ढोल सुहावने होते हैं) | — | बात दो वाक्यों में समाप्त हो जाती है; उसे फैलाने के लिए उदाहरण और जीवन-दृष्टि जोड़नी पड़ती है। |
| तथ्य-आधारित (जल संरक्षण, भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम) | ढाँचा साफ़ रहता है — कारण, प्रभाव, उपाय। | आँकड़े और नाम याद रखने पड़ते हैं; बिना तैयारी के लिखना कठिन है। |
नमूना उत्तर: “मुझे ‘मेरी दादी’ और ‘हमारे गाँव का मेला’ जैसे विषयों पर लिखना सबसे सरल लगा, क्योंकि उनके लिए मुझे कुछ याद नहीं करना पड़ा — जो देखा था, वही लिख दिया। दादी की सुबह की चाय, मेले में गुब्बारे वाले की आवाज़, ढोल की गूँज — ये सब चित्र मन में तैयार थे। इसके उलट ‘भ्रष्टाचार’ और ‘विज्ञान: वरदान या अभिशाप’ पर लिखना कठिन लगा। कारण यह था कि विषय बहुत बड़ा था और मुझे यह तय ही नहीं हो पा रहा था कि कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ रुकूँ; मेरे अपने उदाहरण भी कम थे, इसलिए वही घिसी-पिटी बातें लिखनी पड़ीं। ‘समय का महत्त्व’ बीच का विषय था — विचार तो थे, पर वे मेरे नहीं, सुने हुए थे, इसलिए निबंध सच्चा नहीं लगा। इससे मैंने यह सीखा कि कठिन विषय को भी सरल बनाने का एक ही उपाय है — उसे अपने किसी अनुभव से जोड़ लेना। जब मैंने ‘भ्रष्टाचार’ को अपने मोहल्ले के राशन की दुकान वाली घटना से जोड़कर लिखा, तो वही निबंध अपने आप बहने लगा।”
पाठ से जोड़िए: लेखक की कठिनाई भी यही थी — विषय उसके चुने हुए नहीं थे, दूसरों के दिए हुए थे। उसने उन्हें अपने ढंग से देखकर, अपने अनुभव और अपनी युक्ति से हल किया। विषय हमारा न हो, तो भी दृष्टि हमारी हो सकती है — यही इस पाठ की सबसे उपयोगी सीख है।