गंगा अध्याय 2 विषयों से संवाद

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
निबंध में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक आदि कई महान व्यक्तियों के नाम आए हैं। इनके विषय में जानकारी एकत्रित करके संक्षेप में बताइए कि इन्होंने अपने समय में समाज के लिए क्या-क्या कार्य किए।
उत्तर

निबंध में लेखक ने इन्हें ‘सुधारक’ कहकर गिनाया है — और साथ में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद तथा महात्मा गांधी को भी। नीचे इन सबका संक्षिप्त परिचय दिया गया है।

सुधारकसमयसमाज के लिए किया गया कार्य
बुद्धदेव (गौतम बुद्ध)लगभग 563–483 ई.पू.दुःख और उसके निवारण का मार्ग बताया — चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग। कर्मकांड, पशुबलि और जन्म के आधार पर ऊँच-नीच का विरोध किया। संघ में सब वर्गों के लिए द्वार खोले और उपदेश जनता की भाषा पालि में दिए, संस्कृत में नहीं — यह अपने आप में बड़ा सामाजिक सुधार था।
महावीर स्वामीलगभग 599–527 ई.पू.जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — इन पाँच व्रतों पर बल दिया। ‘अनेकांतवाद’ (हर बात को अनेक दृष्टियों से देखना) का सिद्धांत दिया, जो असहिष्णुता का बड़ा उपचार है। उपदेश जनभाषा प्राकृत में दिए।
नागार्जुनलगभग दूसरी शताब्दीबौद्ध दार्शनिक; माध्यमिक (शून्यवाद) दर्शन के प्रवर्तक। ‘मध्यमकशास्त्र’ उनकी प्रसिद्ध कृति है। उन्होंने तर्क और विवेक की परंपरा को आगे बढ़ाया और अंधविश्वास के स्थान पर प्रश्न पूछने की दृष्टि दी। नालंदा से भी उनका नाम जुड़ा है।
शंकराचार्यलगभग 788–820 ई.अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक — “सब में एक ही आत्मा है” का सिद्धांत, जो ऊँच-नीच के भेद पर सीधी चोट करता है। शास्त्रार्थ की परंपरा को जीवित किया और चार मठों (शृंगेरी, पुरी, द्वारका, बदरी/ज्योतिर्मठ) की स्थापना कर उत्तर-दक्षिण को एक सूत्र में बाँधा।
कबीर15वीं शताब्दीनिर्गुण भक्ति के संत-कवि। हिंदू और मुसलमान दोनों के बाहरी आडंबरों, जाति-भेद, मूर्ति-पूजा के दिखावे और पंडित-मुल्ला के अधिकार पर निर्भय होकर प्रहार किया। सधुक्कड़ी भाषा में साखी, सबद और रमैनी लिखकर सामान्य जन को दर्शन की भाषा दी
गुरु नानक1469–1539सिख धर्म के प्रवर्तक। “एक ओंकार” का संदेश दिया, जाति-भेद और छुआछूत का विरोध किया। संगत (सब मिलकर बैठें) और पंगत/लंगर (सब एक पंक्ति में बैठकर खाएँ) की परंपरा चलाकर समानता को केवल उपदेश नहीं, दैनिक व्यवहार बना दिया। ‘किरत करो, नाम जपो, वंड छको’ — मेहनत करो, नाम लो, बाँटकर खाओ — उनका सूत्र है।
राजा राममोहन राय1772–1833‘आधुनिक भारत के जनक’। सती प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया, जिससे 1829 में उस पर रोक लगी। विधवा-विवाह और स्त्री-शिक्षा के पक्षधर रहे; ब्रह्म समाज की स्थापना की और आधुनिक शिक्षा तथा समाचार-पत्र की स्वतंत्रता के लिए काम किया।
स्वामी दयानंद सरस्वती1824–1883आर्य समाज (1875) के संस्थापक। “वेदों की ओर लौटो” का नारा दिया। मूर्ति-पूजा, बाल-विवाह और जाति-भेद का विरोध किया; स्त्री-शिक्षा और विधवा-विवाह का समर्थन किया। सत्यार्थ प्रकाश उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है।
महात्मा गांधी1869–1948सत्य और अहिंसा को राजनीति का साधन बनाया। स्वतंत्रता-संग्राम का नेतृत्व करते हुए छुआछूत-निवारण, ग्राम-स्वावलंबन, स्वदेशी, खादी, बुनियादी शिक्षा और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया। हिंद स्वराज और सत्य के प्रयोग उनकी कृतियाँ हैं।
इस सूची का संदेश: ध्यान दीजिए, ये नाम ढाई हज़ार वर्षों में फैले हुए हैं — बुद्ध से गांधी तक। लेखक ने इन्हें एक साथ इसीलिए रखा है कि यह सिद्ध हो जाए कि “मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।” और वह तुरंत जोड़ देता है कि गिनती यहीं समाप्त नहीं होती — “सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है।”
प्र2.
निबंध में उल्लिखित महान व्यक्तियों ने अपने द्वारा किए गए कार्यों से समाज को एक नई दिशा दिखाई। हमारे आस-पास और भी ऐसे व्यक्ति और संस्थाएँ हैं जो स्त्री-शिक्षा, पर्यावरण, असमानता, विशेष आवश्यकता समूह (दिव्यांगजन) आदि के लिए कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं के विषय में पता लगाइए और लिखिए।
उत्तर

यह खोजने का काम है, इसलिए उत्तर आपके अपने क्षेत्र से भी जुड़ना चाहिए। नीचे कुछ जाने-माने नाम दिए गए हैं — इन्हें पढ़िए, और फिर अपने नगर या गाँव के दो नाम इसी तालिका में जोड़िए।

क्षेत्रव्यक्ति / संस्थाकार्य
स्त्री-शिक्षासावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुलेसन् 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए विद्यालय खोला। सावित्रीबाई भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में गिनी जाती हैं; उन्होंने विधवाओं और वंचित बालिकाओं की शिक्षा के लिए विरोध सहकर भी काम किया।
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ / कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयसरकारी योजनाएँ, जो बालिकाओं के नामांकन, ठहराव और आवासीय शिक्षा के लिए चलाई जाती हैं।
पर्यावरणसुंदरलाल बहुगुणा और गौरा देवी (चिपको आंदोलन)उत्तराखंड में पेड़ों से लिपटकर उन्हें कटने से बचाया — “क्या हैं जंगल के उपकार? मिट्टी, पानी और बयार।”
राजेंद्र सिंह (तरुण भारत संघ)राजस्थान में जोहड़ बनवाकर सूखी नदियों को फिर बहाया; इसीलिए ‘जलपुरुष’ कहलाते हैं।
जादव पायेंग (‘फ़ॉरेस्ट मैन’)असम में ब्रह्मपुत्र के रेतीले टापू पर अकेले पेड़ लगाकर वर्षों में पूरा जंगल खड़ा कर दिया।
असमानता / सामाजिक न्यायडॉ. भीमराव आंबेडकरछुआछूत के विरुद्ध संघर्ष; संविधान-निर्माण में समानता, स्वतंत्रता और बंधुता के मूल्यों की प्रतिष्ठा। “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”
बाबा आमटे (आनंदवन)कुष्ठरोगियों के लिए महाराष्ट्र में ‘आनंदवन’ बसाया, जहाँ वे उपचार के साथ सम्मान और काम भी पाते हैं।
दिव्यांगजननेशनल एसोसिएशन फ़ॉर द ब्लाइंड (NAB), ब्लाइंड पीपल्स एसोसिएशन (अहमदाबाद), समर्थनम ट्रस्ट (बेंगलुरु)दृष्टिबाधित तथा अन्य दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए ब्रेल पुस्तकें, बोलती पुस्तकें, प्रशिक्षण और रोज़गार।
अरुणिमा सिन्हादुर्घटना में एक पैर खोने के बाद एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली दिव्यांग महिला; अब दिव्यांग खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करती हैं।
अपने आस-पास कैसे खोजें — तरीक़ा:
  1. विद्यालय के प्रधानाचार्य या स्थानीय समाचार-पत्र के संवाददाता से पूछिए कि आपके क्षेत्र में कौन-सी संस्थाएँ काम कर रही हैं।
  2. ग्राम पंचायत/नगरपालिका कार्यालय में स्वयं सहायता समूहों और महिला मंडलों की सूची मिल जाती है।
  3. जिस व्यक्ति या संस्था को चुनें, उसके बारे में पाँच बातें लिखिए — नाम, कब से काम कर रहे हैं, किस समस्या पर, अब तक क्या बदला, और आप कैसे जुड़ सकते हैं।
  4. यदि संभव हो तो एक छोटी भेंटवार्ता (इंटरव्यू) कीजिए और उनके अपने शब्द ज्यों-के-त्यों लिखिए — निबंध में वही सबसे जीवंत लगते हैं।
नमूना उत्तर (स्थानीय): “हमारे कस्बे में ‘नई किरण’ नाम की एक छोटी संस्था है, जिसे दो अध्यापिकाओं ने मिलकर शुरू किया था। वे प्रतिदिन शाम को मज़दूरों की बस्ती में जाकर उन बच्चों को पढ़ाती हैं जो दिन में माता-पिता के साथ काम पर चले जाते हैं। सात वर्षों में बस्ती के अठारह बच्चे विद्यालय में नियमित हो गए हैं और दो लड़कियाँ पहली बार दसवीं तक पहुँची हैं। संस्था के पास न भवन है, न वेतन — बस एक तिरपाल, कुछ चटाइयाँ और मुहल्ले के दान की पुस्तकें। मैं और मेरे दो मित्र रविवार को वहाँ जाकर छोटे बच्चों को गिनती और अक्षर सिखाते हैं।”
प्र3.
आपको ‘समाज-सुधार’ करने का अवसर मिले तो आप क्या-क्या सुधार करना चाहेंगे और कैसे करना चाहेंगे? लिखिए।
उत्तर

अच्छे उत्तर की शर्त यह है कि हर सुधार के साथ उसे करने का तरीक़ा भी बताया जाए। केवल “मैं भ्रष्टाचार मिटाऊँगा” लिखना उत्तर नहीं है; “कैसे” बताना उत्तर है।

कौन-सा सुधारक्यों ज़रूरीकैसे करूँगा/करूँगी
हर बच्चा विद्यालय मेंबस्तियों में आज भी बहुत बच्चे काम पर जाते हैं या बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं।मोहल्ले का सर्वेक्षण करके नाम-सूची बनाना; माता-पिता से मिलकर बात करना; विद्यालय के बाद एक-दो घंटे का नि:शुल्क ‘सहायता वर्ग’ चलाना, ताकि पिछड़ा बच्चा हार न माने।
बेटियों के साथ बराबरीघर के भीतर का भेद बाहर के भेद से बड़ा होता है — खाना, खेल, पढ़ाई और निर्णय, सब में।अपने घर से आरंभ; कक्षा में ‘हमारी बहनें क्या पढ़ना चाहती हैं’ विषय पर चर्चा; पंचायत/विद्यालय की दीवार पर बालिका-शिक्षा योजनाओं की जानकारी लगाना।
स्वच्छता और कचरा प्रबंधनबीमारी का सबसे सस्ता इलाज सफ़ाई है।गीले-सूखे कचरे के अलग डिब्बे; विद्यालय में खाद का गड्ढा (जैविक खाद); हर शनिवार आधे घंटे का श्रमदान; प्लास्टिक की जगह कपड़े का थैला।
अंधविश्वास के विरुद्ध विवेकझाड़-फूँक और अफ़वाहें आज भी जान ले लेती हैं।विज्ञान-प्रदर्शनी में ‘चमत्कारों के पीछे का विज्ञान’ दिखाना; साँप काटने, बुख़ार और ग्रहण जैसी बातों पर डॉक्टर को बुलाकर बातचीत कराना।
दिव्यांग साथियों के लिए सुगमताबाधा उनकी अक्षमता में नहीं, हमारी व्यवस्था में होती है।विद्यालय में रैंप और चौड़े दरवाज़े की माँग रखना; कक्षा में आगे की सीट; सामग्री बड़े अक्षरों में; ‘सहपाठी मित्र’ की व्यवस्था।
पानी और पेड़गिरता भूजल और कटते पेड़ अगली पीढ़ी का प्रश्न हैं।वर्षाजल संचयन की टंकी; ‘एक विद्यार्थी, एक पेड़’ और उसकी देखभाल का रजिस्टर; नल की टपकन ठीक कराना।
नमूना उत्तर: “यदि मुझे अवसर मिले तो मैं सबसे पहले अपने मोहल्ले में बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों पर काम करूँगा। मैं अकेले भाषण नहीं दूँगा, क्योंकि भाषण से कोई सुधार नहीं होता। मैं पहले घर-घर जाकर पता लगाऊँगा कि कितने बच्चे विद्यालय नहीं जाते और क्यों नहीं जाते — कहीं कारण फ़ीस है, कहीं छोटे भाई-बहन की देखभाल, कहीं दूरी। फिर उन्हीं कारणों के अनुसार उपाय करूँगा: विद्यालय से छात्रवृत्ति की जानकारी दिलाऊँगा, शाम का पढ़ाई-वर्ग चलाऊँगा और महीने में एक बार अभिभावकों की बैठक कराऊँगा जिसमें बच्चों का काम दिखाया जाए। मैं मानता हूँ कि सुधार ऊपर से आदेश देकर नहीं, साथ खड़े होकर होता है — जैसे गुरु नानक ने लंगर चलाकर समानता सिखाई, कहकर नहीं।”
पाठ की चेतावनी भी याद रखिए: लेखक ने लिखा है — “जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं।” इसलिए किसी भी सुधार को अंतिम सत्य मानकर मत चलिए। हर कुछ वर्षों में यह देखते रहना चाहिए कि जो उपाय हमने किया, वह अब भी काम कर रहा है या नई कठिनाई बन गया है।
प्र4.
भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।
उत्तर

चर्चा को दिशा देने के लिए यह ढाँचा काम आएगा — पहले तीनों शब्दों का अर्थ साफ़ कीजिए, फिर भारतीय ज्ञान-परंपरा से उदाहरण लीजिए, और अंत में अपने दिनचर्या पर लागू कीजिए।

पक्षअर्थअसंतुलन का परिणाम
नैतिकसही-ग़लत का विवेक — सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, दूसरों के प्रति करुणा।केवल नीति की बात करने वाला व्यक्ति यदि व्यवहार में असमर्थ हो, तो उपदेशक बनकर रह जाता है।
आध्यात्मिकभीतर की शांति, आत्म-चिंतन, अपने से बड़ी किसी बात से जुड़ाव।केवल आध्यात्मिक बने रहने पर कर्तव्य और परिवार की उपेक्षा हो सकती है।
व्यावहारिकरोज़ी-रोटी, पढ़ाई, कौशल, समय-प्रबंधन, सांसारिक दायित्व।केवल व्यावहारिक रहने पर मनुष्य लाभ-हानि की मशीन बन जाता है।

भारतीय ज्ञान-परंपरा से उदाहरण —

  • पुरुषार्थ चतुष्टय — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। यही संतुलन का सबसे पुराना सूत्र है। अर्थ (आजीविका) और काम (इच्छाएँ) वर्जित नहीं हैं; शर्त केवल यह है कि वे धर्म (नैतिकता) के भीतर रहें और अंततः मोक्ष की ओर ले जाएँ।
  • गीता — “योगः कर्मसु कौशलम्” (कर्म में कुशलता ही योग है) तथा निष्काम कर्म का सिद्धांत। काम छोड़ना नहीं, फल की आसक्ति छोड़नी है — यह आध्यात्म और व्यवहार को एक साथ जोड़ देता है।
  • तिरुक्कुरल (तिरुवल्लुवर) — इसके तीन भाग ही अरम् (धर्म), पोरुल् (अर्थ) और इन्बम् (काम) हैं — अर्थात् संतुलन उसकी रचना-योजना में ही है।
  • पंचतंत्र और हितोपदेश — कहानियों के माध्यम से नीति और व्यवहार-बुद्धि दोनों सिखाते हैं; इनका लक्ष्य ही ‘नीतिशास्त्र’ के साथ ‘लोक-व्यवहार’ है।
  • विदुर नीति और चाणक्य नीति — राज-काज और गृहस्थी जैसे व्यावहारिक विषयों को नैतिक कसौटी पर रखकर देखती हैं।
  • आश्रम व्यवस्था — ब्रह्मचर्य (सीखना), गृहस्थ (कमाना और दायित्व निभाना), वानप्रस्थ और संन्यास (सौंपना और मुक्त होना) — जीवन के हर पड़ाव के लिए अलग संतुलन।
  • प्रार्थना-वाक्य — “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” — इसमें ‘सुख’ (व्यावहारिक), ‘निरामय’ (शारीरिक) और सबके लिए मंगल-कामना (नैतिक-आध्यात्मिक) एक साथ हैं।
चर्चा कैसे चलाएँ (शिक्षक के साथ):
  1. कक्षा को तीन दलों में बाँटिए — नैतिक, आध्यात्मिक, व्यावहारिक। हर दल अपने पक्ष के समर्थन में दो उदाहरण और एक भारतीय ग्रंथ की उक्ति लाए।
  2. फिर एक स्थिति दीजिए — जैसे, “परीक्षा में मित्र नक़ल के लिए कह रहा है”, या “घर की आर्थिक तंगी में पढ़ाई छोड़ने का दबाव है” — और पूछिए कि तीनों पक्ष क्या सलाह देंगे।
  3. अंत में सब मिलकर लिखिए कि संतुलन किसी एक को चुनने का नाम नहीं, तीनों को उनकी सही जगह देने का नाम है।
इस पाठ से जोड़: ‘क्या लिखूँ?’ स्वयं संतुलन का उदाहरण है। लेखक न शास्त्र की सारी शर्तें मान लेता है, न उन्हें ठुकराता है; वह दोनों के बीच अपना व्यावहारिक रास्ता निकाल लेता है — मानटेन की सच्चाई और खुसरो की चतुराई को मिलाकर। यही संतुलित दृष्टि है।
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