प्र1.
निबंध में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक आदि कई महान व्यक्तियों के नाम आए हैं। इनके विषय में जानकारी एकत्रित करके संक्षेप में बताइए कि इन्होंने अपने समय में समाज के लिए क्या-क्या कार्य किए।
उत्तर
निबंध में लेखक ने इन्हें ‘सुधारक’ कहकर गिनाया है — और साथ में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद तथा महात्मा गांधी को भी। नीचे इन सबका संक्षिप्त परिचय दिया गया है।
| सुधारक | समय | समाज के लिए किया गया कार्य |
|---|---|---|
| बुद्धदेव (गौतम बुद्ध) | लगभग 563–483 ई.पू. | दुःख और उसके निवारण का मार्ग बताया — चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग। कर्मकांड, पशुबलि और जन्म के आधार पर ऊँच-नीच का विरोध किया। संघ में सब वर्गों के लिए द्वार खोले और उपदेश जनता की भाषा पालि में दिए, संस्कृत में नहीं — यह अपने आप में बड़ा सामाजिक सुधार था। |
| महावीर स्वामी | लगभग 599–527 ई.पू. | जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — इन पाँच व्रतों पर बल दिया। ‘अनेकांतवाद’ (हर बात को अनेक दृष्टियों से देखना) का सिद्धांत दिया, जो असहिष्णुता का बड़ा उपचार है। उपदेश जनभाषा प्राकृत में दिए। |
| नागार्जुन | लगभग दूसरी शताब्दी | बौद्ध दार्शनिक; माध्यमिक (शून्यवाद) दर्शन के प्रवर्तक। ‘मध्यमकशास्त्र’ उनकी प्रसिद्ध कृति है। उन्होंने तर्क और विवेक की परंपरा को आगे बढ़ाया और अंधविश्वास के स्थान पर प्रश्न पूछने की दृष्टि दी। नालंदा से भी उनका नाम जुड़ा है। |
| शंकराचार्य | लगभग 788–820 ई. | अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक — “सब में एक ही आत्मा है” का सिद्धांत, जो ऊँच-नीच के भेद पर सीधी चोट करता है। शास्त्रार्थ की परंपरा को जीवित किया और चार मठों (शृंगेरी, पुरी, द्वारका, बदरी/ज्योतिर्मठ) की स्थापना कर उत्तर-दक्षिण को एक सूत्र में बाँधा। |
| कबीर | 15वीं शताब्दी | निर्गुण भक्ति के संत-कवि। हिंदू और मुसलमान दोनों के बाहरी आडंबरों, जाति-भेद, मूर्ति-पूजा के दिखावे और पंडित-मुल्ला के अधिकार पर निर्भय होकर प्रहार किया। सधुक्कड़ी भाषा में साखी, सबद और रमैनी लिखकर सामान्य जन को दर्शन की भाषा दी। |
| गुरु नानक | 1469–1539 | सिख धर्म के प्रवर्तक। “एक ओंकार” का संदेश दिया, जाति-भेद और छुआछूत का विरोध किया। संगत (सब मिलकर बैठें) और पंगत/लंगर (सब एक पंक्ति में बैठकर खाएँ) की परंपरा चलाकर समानता को केवल उपदेश नहीं, दैनिक व्यवहार बना दिया। ‘किरत करो, नाम जपो, वंड छको’ — मेहनत करो, नाम लो, बाँटकर खाओ — उनका सूत्र है। |
| राजा राममोहन राय | 1772–1833 | ‘आधुनिक भारत के जनक’। सती प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया, जिससे 1829 में उस पर रोक लगी। विधवा-विवाह और स्त्री-शिक्षा के पक्षधर रहे; ब्रह्म समाज की स्थापना की और आधुनिक शिक्षा तथा समाचार-पत्र की स्वतंत्रता के लिए काम किया। |
| स्वामी दयानंद सरस्वती | 1824–1883 | आर्य समाज (1875) के संस्थापक। “वेदों की ओर लौटो” का नारा दिया। मूर्ति-पूजा, बाल-विवाह और जाति-भेद का विरोध किया; स्त्री-शिक्षा और विधवा-विवाह का समर्थन किया। सत्यार्थ प्रकाश उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है। |
| महात्मा गांधी | 1869–1948 | सत्य और अहिंसा को राजनीति का साधन बनाया। स्वतंत्रता-संग्राम का नेतृत्व करते हुए छुआछूत-निवारण, ग्राम-स्वावलंबन, स्वदेशी, खादी, बुनियादी शिक्षा और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया। हिंद स्वराज और सत्य के प्रयोग उनकी कृतियाँ हैं। |
इस सूची का संदेश: ध्यान दीजिए, ये नाम ढाई हज़ार वर्षों में फैले हुए हैं — बुद्ध से गांधी तक। लेखक ने इन्हें एक साथ इसीलिए रखा है कि यह सिद्ध हो जाए कि “मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।” और वह तुरंत जोड़ देता है कि गिनती यहीं समाप्त नहीं होती — “सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है।”