गंगा अध्याय 2 सृजन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ एक लोकोक्ति है। लोक में प्रचलित लोकप्रिय वाक्य या वाक्यांश को लोकोक्ति कहते हैं, जो किसी विशेष अर्थ या सीख को व्यक्त करता है। लोकोक्ति भाषा को समृद्ध करती है तथा विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सहायता करती है। यह लोगों के अनुभव, विश्वास और मूल्यों को दर्शाती है। आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी— ‘आम के आम गुठलियों के दाम’। अब आप इस लोकोक्ति और ‘जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास’ विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।
उत्तर

पहले लोकोक्ति का अर्थ — ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ का अर्थ है — एक ही काम से दोहरा लाभ मिलना। आम खाकर स्वाद भी मिला और उसकी गुठलियाँ बेचकर पैसे भी मिल गए; कुछ भी व्यर्थ नहीं गया। जैविक खाद पर यह लोकोक्ति ठीक बैठती है, क्योंकि वहाँ भी जिसे हम ‘कचरा’ कहकर फेंक देते हैं, वही खाद बनकर लौट आता है।

नमूना लेख — “आम के आम, गुठलियों के दाम : जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास”

हमारे विद्यालय की रसोई से रोज़ एक बाल्टी छिलके निकलते थे, बगीचे से सूखे पत्तों का ढेर लगता था और सब कुछ पीछे के गड्ढे में जलाकर समाप्त कर दिया जाता था। धुआँ उठता था और बात वहीं ख़त्म हो जाती थी। पिछले सत्र में हमारी विज्ञान-शिक्षिका ने कक्षा में एक प्रश्न रखा — “जो चीज़ मिट्टी से आई है, उसे मिट्टी में लौटाने के बजाय हम जला क्यों देते हैं?” उसी प्रश्न से हमारा ‘जैविक खाद’ का काम शुरू हुआ।

हमने विद्यालय के कोने में डेढ़ मीटर लंबा, एक मीटर चौड़ा और आधा मीटर गहरा गड्ढा खोदा। उसमें परत-दर-परत सामग्री डाली — नीचे सूखे पत्ते और भूसा, उस पर रसोई के गीले छिलके और सब्ज़ियों की कतरन, फिर थोड़ा गोबर और ऊपर मिट्टी की हल्की परत। हर सप्ताह हम उसे लकड़ी से पलट देते और ज़रूरत भर पानी छिड़कते, ताकि ढेर न बहुत गीला रहे, न सूखा। ध्यान यह रखा कि प्लास्टिक, काँच या धातु का कोई टुकड़ा भीतर न जाए। लगभग ढाई महीने में वह ढेर काली, भुरभुरी, मिट्टी जैसी महक वाली जैविक खाद में बदल गया। दूसरे चरण में हमने केंचुओं की सहायता से वर्मी कंपोस्ट भी बनाया, जो और भी जल्दी तैयार हुआ।

अब लाभ गिनिए और देखिए कि लोकोक्ति कैसे सच होती है। पहला लाभ — विद्यालय का कचरा समाप्त हो गया, न धुआँ, न बदबू, न मक्खियाँ। दूसरा लाभ — बगीचे के लिए खाद ख़रीदनी नहीं पड़ी; टमाटर, मेथी और गेंदे की क्यारियाँ पहले से अच्छी हुईं। तीसरा लाभ — बची हुई खाद हमने छोटे-छोटे थैलों में भरकर अभिभावक-दिवस पर बेची और उससे मिले पैसे से पुस्तकालय के लिए किताबें आईं। जो कचरा फेंका जा रहा था, उसी ने पहले पौधे दिए और फिर पुस्तकें — सचमुच ‘आम के आम, गुठलियों के दाम’।

इसका एक लाभ ऐसा भी है जो दिखता नहीं। रासायनिक खाद पैदावार तो बढ़ा देती है, पर धीरे-धीरे मिट्टी की जान निकाल लेती है; जैविक खाद मिट्टी को जीवित रखती है — उसमें केंचुए और सूक्ष्म जीव बने रहते हैं, पानी रुकता है और अगली फ़सल के लिए ज़मीन तैयार रहती है। यहाँ भी दोहरा लाभ है — आज की फ़सल भी, और आने वाले वर्षों की ज़मीन भी।

हमारा प्रयास बहुत छोटा है — एक गड्ढा, कुछ पत्ते और थोड़ा-सा धैर्य। पर उसने हमें एक बड़ी बात सिखा दी: प्रकृति में कुछ भी कचरा नहीं होता, केवल ग़लत जगह पर रखी हुई चीज़ होती है। यदि हर घर अपने रसोई-कचरे से खाद बनाने लगे, तो नगर का आधा कूड़ा वहीं समाप्त हो जाए और गमलों-खेतों को मुफ़्त खाद मिल जाए। इससे अच्छा सौदा और क्या होगा — आम के आम, गुठलियों के दाम!

लेख लिखते समय क्या-क्या रखना चाहिए: (i) लोकोक्ति का अर्थ पहले साफ़ कीजिए; (ii) विषय से उसका मेल सिद्ध कीजिए — केवल शीर्षक में लोकोक्ति चिपका देना काफ़ी नहीं; (iii) प्रक्रिया के ठोस ब्योरे दीजिए (गड्ढा, परतें, समय); (iv) लाभ गिनाते समय ‘दोहरा लाभ’ स्पष्ट दिखाइए, क्योंकि लोकोक्ति की आत्मा वही है; (v) अंत में लोकोक्ति को दोहराकर लेख को गोल कीजिए।
प्र2.
“जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।” आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।
उत्तर

डायरी-लेखन में क्या-क्या होना चाहिए —

  • ऊपर तिथि, दिन और स्थान; भाषा ‘मैं’ में, बोलचाल जैसी सहज।
  • पहले वह दूर वाला अनुमान — आप क्या सोचते थे और क्यों सोचते थे।
  • फिर वह घटना जिसने पास ले जाकर सच दिखाया — दृश्य, ध्वनि और अपने मन की हलचल के ब्योरे सहित।
  • अंत में निष्कर्ष — इससे मैंने क्या सीखा। यहाँ पाठ की पंक्ति जोड़ देने से डायरी और सार्थक हो जाती है।
  • डायरी सच्ची होनी चाहिए, सजाई हुई नहीं। जो सचमुच बीता, वही लिखिए।
नमूना उत्तर (डायरी):

14 अगस्त, बुधवार  ·  रात 9:30  ·  घर

आज मुझे अपनी एक पुरानी राय बदलनी पड़ी, और अच्छा लगा कि बदलनी पड़ी।

हमारे मोहल्ले के आख़िरी छोर पर एक वृद्धाश्रम है। मैं वहाँ से रोज़ साइकिल से निकलता था। बाहर से वह मुझे हमेशा उदास जगह लगती थी — ऊँची दीवार, बंद फाटक, अंदर से कभी-कभी किसी के खाँसने की आवाज़। मैंने मन ही मन तय कर रखा था कि यह वह जगह है जहाँ लोग छोड़ दिए जाते हैं, और वहाँ केवल रोना-धोना होता होगा। मैं उधर से जल्दी-जल्दी निकल जाता था।

आज स्वतंत्रता दिवस की तैयारी के सिलसिले में हमारी कक्षा को वहीं कार्यक्रम करने भेजा गया। भीतर घुसते ही मेरा बनाया हुआ चित्र टूटने लगा। आँगन में तुलसी और गुड़हल के गमले थे, एक कोने में दो दादा जी शतरंज पर झुके हुए थे और उन्हें हमारे आने की ख़बर तक नहीं हुई। रसोई से मूँगफली की चिक्की की गंध आ रही थी। एक दादी जी ने मुझसे मेरा नाम पूछा, फिर बताया कि वे चालीस वर्ष तक विद्यालय में गणित पढ़ाती रही हैं, और मेरी कॉपी माँगकर उन्होंने वह सवाल दो पंक्तियों में हल कर दिया जिस पर मैं परसों से अटका था। जब हमने ‘वंदे मातरम्’ गाया तो वे सब भी साथ गाने लगे — किसी का स्वर काँप रहा था, पर सब गा रहे थे।

लौटते समय मुझे लगा कि दुःख वहाँ है ज़रूर — कुछ आँखों में मैंने प्रतीक्षा भी देखी। पर वहाँ केवल दुःख नहीं है; वहाँ हँसी है, दिनचर्या है, अपनापन है, और बहुत सारा अनुभव है जिसे सुनने वाला कोई नहीं मिलता। मेरा अनुमान दूर से बना था, इसलिए अधूरा था।

आज कक्षा में पढ़ा हुआ वाक्य बार-बार याद आ रहा है — “दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता।” मेरे साथ तो उलटा हुआ — दूर से मुझे केवल कठोरता दिखी थी, पास आकर उसके भीतर की गरमाहट दिखी। शायद बात एक ही है: दूर से हम जो देखते हैं, वह वस्तु नहीं, अपनी कल्पना देखते हैं। अब से किसी जगह या व्यक्ति के बारे में राय बनाने से पहले मैं एक बार पास जाकर देखूँगा। कल फिर जाऊँगा — दादी जी ने कहा है कि वे मुझे त्रिकोणमिति भी समझा देंगी।

ध्यान रखिए: यह नमूना है, आपका उत्तर नहीं। आप अपनी किसी सच्ची घटना पर लिखिए — किसी नए विद्यालय, किसी अनजान सहपाठी, किसी अस्पताल, किसी गाँव या किसी खेल के बारे में बनी हुई राय, जो पास जाकर बदल गई हो। जो अपना अनुभव होगा, उसमें ब्योरे अपने आप आएँगे — और ब्योरे ही किसी डायरी को सच्चा बनाते हैं।
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