पहले लोकोक्ति का अर्थ — ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ का अर्थ है — एक ही काम से दोहरा लाभ मिलना। आम खाकर स्वाद भी मिला और उसकी गुठलियाँ बेचकर पैसे भी मिल गए; कुछ भी व्यर्थ नहीं गया। जैविक खाद पर यह लोकोक्ति ठीक बैठती है, क्योंकि वहाँ भी जिसे हम ‘कचरा’ कहकर फेंक देते हैं, वही खाद बनकर लौट आता है।
हमारे विद्यालय की रसोई से रोज़ एक बाल्टी छिलके निकलते थे, बगीचे से सूखे पत्तों का ढेर लगता था और सब कुछ पीछे के गड्ढे में जलाकर समाप्त कर दिया जाता था। धुआँ उठता था और बात वहीं ख़त्म हो जाती थी। पिछले सत्र में हमारी विज्ञान-शिक्षिका ने कक्षा में एक प्रश्न रखा — “जो चीज़ मिट्टी से आई है, उसे मिट्टी में लौटाने के बजाय हम जला क्यों देते हैं?” उसी प्रश्न से हमारा ‘जैविक खाद’ का काम शुरू हुआ।
हमने विद्यालय के कोने में डेढ़ मीटर लंबा, एक मीटर चौड़ा और आधा मीटर गहरा गड्ढा खोदा। उसमें परत-दर-परत सामग्री डाली — नीचे सूखे पत्ते और भूसा, उस पर रसोई के गीले छिलके और सब्ज़ियों की कतरन, फिर थोड़ा गोबर और ऊपर मिट्टी की हल्की परत। हर सप्ताह हम उसे लकड़ी से पलट देते और ज़रूरत भर पानी छिड़कते, ताकि ढेर न बहुत गीला रहे, न सूखा। ध्यान यह रखा कि प्लास्टिक, काँच या धातु का कोई टुकड़ा भीतर न जाए। लगभग ढाई महीने में वह ढेर काली, भुरभुरी, मिट्टी जैसी महक वाली जैविक खाद में बदल गया। दूसरे चरण में हमने केंचुओं की सहायता से वर्मी कंपोस्ट भी बनाया, जो और भी जल्दी तैयार हुआ।
अब लाभ गिनिए और देखिए कि लोकोक्ति कैसे सच होती है। पहला लाभ — विद्यालय का कचरा समाप्त हो गया, न धुआँ, न बदबू, न मक्खियाँ। दूसरा लाभ — बगीचे के लिए खाद ख़रीदनी नहीं पड़ी; टमाटर, मेथी और गेंदे की क्यारियाँ पहले से अच्छी हुईं। तीसरा लाभ — बची हुई खाद हमने छोटे-छोटे थैलों में भरकर अभिभावक-दिवस पर बेची और उससे मिले पैसे से पुस्तकालय के लिए किताबें आईं। जो कचरा फेंका जा रहा था, उसी ने पहले पौधे दिए और फिर पुस्तकें — सचमुच ‘आम के आम, गुठलियों के दाम’।
इसका एक लाभ ऐसा भी है जो दिखता नहीं। रासायनिक खाद पैदावार तो बढ़ा देती है, पर धीरे-धीरे मिट्टी की जान निकाल लेती है; जैविक खाद मिट्टी को जीवित रखती है — उसमें केंचुए और सूक्ष्म जीव बने रहते हैं, पानी रुकता है और अगली फ़सल के लिए ज़मीन तैयार रहती है। यहाँ भी दोहरा लाभ है — आज की फ़सल भी, और आने वाले वर्षों की ज़मीन भी।
हमारा प्रयास बहुत छोटा है — एक गड्ढा, कुछ पत्ते और थोड़ा-सा धैर्य। पर उसने हमें एक बड़ी बात सिखा दी: प्रकृति में कुछ भी कचरा नहीं होता, केवल ग़लत जगह पर रखी हुई चीज़ होती है। यदि हर घर अपने रसोई-कचरे से खाद बनाने लगे, तो नगर का आधा कूड़ा वहीं समाप्त हो जाए और गमलों-खेतों को मुफ़्त खाद मिल जाए। इससे अच्छा सौदा और क्या होगा — आम के आम, गुठलियों के दाम!