गंगा अध्याय 2 निबंध लिखने की कला

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
शैली का अर्थ अभिव्यक्ति का ढंग होता है। निबंधकार विभिन्न प्रकार से विषय को प्रस्तुत करता है। इस पाठ में निबंध लेखन की प्रक्रियाओं के विषय में चर्चा की गई है। दिए गए आरेख को देखिए और इसके आधार पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर

पुस्तक का आरेख निबंध-रचना की छह अवस्थाएँ दिखाता है। बीच में विषय है और उसके चारों ओर ये छह चरण —

निबंध लेखन की प्रक्रिया का आरेख विषय 1. प्रेरणा 2. विषय चयन 3. सामग्री संग्रह 4. रूपरेखा निर्माण 5. शैली निर्धारण 6. लेखन और समापन
पुस्तक के आरेख के अनुसार निबंध-रचना की छह अवस्थाएँ। (पुस्तक में बीच का शब्द ‘विषय’ श्वेत अक्षरों में छपा है और रेखाओं के नीचे दब गया है।)

हर चरण का अर्थ, पाठ से जोड़कर —

चरणक्या करना हैपाठ में इसका संकेत
प्रेरणालिखने का भीतरी दबाव या बाहरी आग्रह — कुछ कहने की उमंग।गार्डिनर की “विशेष मानसिक स्थिति”; और लेखक के लिए नमिता-अमिता का आग्रह।
विषय चयनक्या लिखना है, यह तय करना; विषय की सीमा बाँधना।“दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार” — एक बहुत छोटा, दूसरा बहुत बड़ा।
सामग्री संग्रहमनन, पठन, अनुभव और उदाहरण जुटाना।“पहले तो मुझे सामग्री एकत्र करनी होगी, विचार-समूह संचित करना होगा।”
रूपरेखा निर्माणबिंदुओं का क्रम तय करना — भूमिका, विस्तार, निष्कर्ष।“निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए।”
शैली निर्धारणकहने का ढंग चुनना — वर्णनात्मक, विचारात्मक या आत्मपरक; वाक्य और भाषा का स्वरूप।“अब मुझे शैली निश्चित करनी है… भाषा में प्रवाह होना चाहिए।”
लेखन और समापनलिखना और उसे ऐसे अंत तक पहुँचाना कि आरंभ की बात पूरी हो जाए।निबंध का अंत — “दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।”
नमूना निबंध — “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” (आरेख के छह चरणों पर चलकर)

1. प्रेरणा — मेले से लौटते हुए दूर से आती ढोल की आवाज़ बहुत भली लगी थी; पास पहुँचा तो कान भन्ना गए। तभी मन में यह प्रश्न उठा — क्या दूरी सचमुच चीज़ों को सुंदर बना देती है?

2. विषय चयन — विषय है — ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’। मैं इसे केवल लोकोक्ति के अर्थ तक सीमित न रखकर जीवन-दृष्टि के रूप में लूँगा।

3. सामग्री संग्रह — (i) ढोल का अपना अनुभव, (ii) परीक्षा के बाद की छुट्टियाँ, जो दूर से बहुत सुंदर लगती हैं, (iii) दादी का बार-बार कहना कि “हमारे ज़माने में…”, (iv) पाठ की पंक्ति — “दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता।”

4. रूपरेखा — भूमिका (लोकोक्ति का शाब्दिक अर्थ) → ढोल का उदाहरण → दूरी और यथार्थ का संबंध → तरुण और वृद्ध → लाभ और हानि → निष्कर्ष।

5. शैली — आत्मपरक और सरल; छोटे वाक्य; आरंभ में एक चित्र, अंत में एक विचार।

6. लेखन और समापन —

गाँव के मेले की ढोल जब दूर से सुनाई देती है तो लगता है कोई उत्सव बुला रहा है। पर ढोल के पास खड़े होकर सुनिए — कान के पर्दे फटने लगते हैं। ढोल वही है, बजाने वाला वही है; बदली है तो केवल दूरी। यही अनुभव हमारी लोकोक्ति में बँधकर आया है — ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’।

दूरी कर्कशता को छान देती है और कल्पना को जगह दे देती है। दूर बैठा आदमी ढोल की आवाज़ में किसी घर का विवाह देख लेता है, कोने में बैठी लजाई हुई दुल्हन देख लेता है। जो पास है, वह ब्योरे देखता है — गर्मी, भीड़, थकान; जो दूर है, वह केवल चित्र देखता है।

यही बात मनुष्य के समय के साथ भी है। जो अभी संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक लगता है; और जो अपनी तरुणाई से दूर हट आए हैं, उन्हें बीता हुआ समय सुखद लगता है। तरुण भविष्य के स्वप्न देखता है, वृद्ध अतीत के — और दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। दोनों के स्वप्न सुखद इसलिए हैं कि दोनों दूर के ढोल हैं।

इस दूरी का लाभ भी है और हानि भी। लाभ यह कि वह हमें आशा देती है — जो दूर का सुंदर चित्र है, वही तो हमें चलने की शक्ति देता है। हानि यह कि दूरी का सुख हमें वर्तमान से रूठना सिखा देता है, और हम जो पास है उसे तुच्छ मानने लगते हैं। जो अपने आज को छोटा समझता है, वह अपने कल को भी बड़ा नहीं बना पाता।

इसलिए ठीक रास्ता बीच का है — दूर के ढोल सुनते रहिए, वे सपने देते हैं; पर पास के ढोल से भागिए मत, वही सच है। जिस दिन हम पास की कर्कशता को भी सह लेना सीख जाएँगे, उस दिन दूर का सुहावनापन झूठा सुख नहीं, सच्चा उत्साह बन जाएगा।

ध्यान दीजिए: आरेख की छहों अवस्थाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं, इसीलिए वे एक ही केंद्र से निकली रेखाओं के रूप में दिखाई गई हैं — कोई सीढ़ी नहीं है जिस पर एक बार चढ़कर उतर जाएँ। सामग्री जुटाते-जुटाते विषय की सीमा बदल सकती है, और लिखते-लिखते रूपरेखा।
प्र2.
अगर आपको निबंध लेखन का कोई और ढंग बेहतर लगता है तो उसे ऐसे ही आरेख से दर्शाइए और बताइए कि आपको वह ढंग क्यों बेहतर लगता है?
उत्तर

हाँ, एक और ढंग संभव है — जिसे ‘पहले लिखो, फिर सँवारो’ कहा जा सकता है। इसमें रूपरेखा पहले नहीं, पहले कच्चे मसौदे के बाद बनती है। यह ढंग स्वयं इस पाठ के लेखक की कठिनाई से निकला है — “निबंध लिख लेने के बाद मैं उसका सारांश कुछ ही शब्दों में भले ही लिख दूँ, पर निबंध लिखने के पहले उसका सार दस-पाँच शब्दों में कैसे लिखा जाए?”

पहले लिखो, फिर सँवारो — चक्रीय आरेख अनुभव /प्रश्न कच्चामसौदा क्रम औररूपरेखा काट-छाँटऔर अंत लौटकर फिर से लिखना — जब तक बात साफ़ न हो जाए
‘पहले लिखो, फिर सँवारो’ — इसमें अंतिम चरण से तीर लौटकर दूसरे चरण पर आता है, यानी लेखन एक चक्र है, सीधी रेखा नहीं।

यह ढंग मुझे बेहतर क्यों लगता है —

  1. ख़ाली काग़ज़ का डर मिट जाता है। रूपरेखा बनाने बैठिए तो पहला वाक्य ही नहीं सूझता; लिखना शुरू कीजिए तो विचार अपने आप खुलने लगते हैं। लेखक ने यही ईमानदारी से कहा है — रूपरेखा उससे तैयार ही नहीं होती।
  2. सार लिखने से पहले सोचना ज़रूरी है। सार तभी निकलता है जब बात पूरी बन चुकी हो। इसलिए रूपरेखा को कच्चे मसौदे के बाद रखना अधिक स्वाभाविक है।
  3. यह मानटेन की पद्धति से मेल खाता है। जो देखा, सुना और अनुभव किया — वही पहले काग़ज़ पर आ जाए; क्रम बाद में बैठाया जा सकता है। इसी से निबंध में “सच्ची अनुभूति” बची रहती है।
  4. काट-छाँट अंत में होती है। इससे आचार्यों की वह शर्त भी पूरी हो जाती है कि “निबंध छोटा होना चाहिए” — क्योंकि छोटा करना लिखे हुए को छाँटकर ही होता है, बिना लिखे नहीं।
पर एक सावधानी: यह ढंग तभी काम करता है जब काट-छाँट सचमुच की जाए। परीक्षा में समय कम होता है, इसलिए वहाँ पुस्तक वाला क्रम (पहले रूपरेखा) अधिक सुरक्षित है; घर पर लिखते समय, जब सोचने-सुधारने का समय हो, यह चक्रीय ढंग अधिक अच्छा फल देता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ