दोनों का अंतर एक वाक्य में यह है — गार्डिनर के लिए निबंध ‘उतरता’ है, बख्शी के लिए निबंध ‘बनाना पड़ता’ है।
| बिंदु | ए.जी. गार्डिनर | पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी |
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| लिखने की स्थिति | “लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है” — मन में उमंग, हृदय में स्फूर्ति, मस्तिष्क में आवेग उठता है और “लेख लिखना ही पड़ता है।” | “मैंने उस मानसिक स्थिति का अनुभव ही नहीं किया है, जिसमें भाव अपने आप उत्थित हो जाते हैं।” |
| प्रक्रिया | भाव स्वयं उठते हैं; लेखन सहज, अनायास। | “मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबंध लिख सकता हूँ।” यानी लेखन प्रयत्नसाध्य है। |
| विषय का स्थान | विषय गौण है — “कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं।” हैट असली है, खूँटी नहीं। | विषय बड़ी चिंता है — ‘दूर के ढोल’ पर पाँच पेज कैसे भरें और अनादि काल से चली आ रही ‘समाज-सुधार’ की बहस पाँच पेज में कैसे समेटें? |
| शीर्षक | शीर्षक बनाना सबसे कठिन काम मानते हैं — “शीर्षक देने का भार मैं अपने मित्र पर छोड़ देता हूँ।” | शीर्षक तो पहले से तय हैं (नमिता और अमिता के दिए हुए); उसकी कठिनाई शीर्षक बनाने की नहीं, दिए हुए शीर्षक को भरने की है। |
| रूपरेखा | प्रसंग में रूपरेखा का समर्थन नहीं; वे सहज प्रवाह के पक्ष में हैं। | “मैं सोच ही नहीं सकता कि इस विषय की कैसी रूपरेखा है… इसलिए मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।” |