गंगा अध्याय 2 मेरी समझ मेरे विचार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए— 1. निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?
उत्तर

दोनों का अंतर एक वाक्य में यह है — गार्डिनर के लिए निबंध ‘उतरता’ है, बख्शी के लिए निबंध ‘बनाना पड़ता’ है।

बिंदुए.जी. गार्डिनरपदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
लिखने की स्थिति“लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है” — मन में उमंग, हृदय में स्फूर्ति, मस्तिष्क में आवेग उठता है और “लेख लिखना ही पड़ता है।”“मैंने उस मानसिक स्थिति का अनुभव ही नहीं किया है, जिसमें भाव अपने आप उत्थित हो जाते हैं।”
प्रक्रियाभाव स्वयं उठते हैं; लेखन सहज, अनायास।“मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबंध लिख सकता हूँ।” यानी लेखन प्रयत्नसाध्य है।
विषय का स्थानविषय गौण है — “कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं।” हैट असली है, खूँटी नहीं।विषय बड़ी चिंता है — ‘दूर के ढोल’ पर पाँच पेज कैसे भरें और अनादि काल से चली आ रही ‘समाज-सुधार’ की बहस पाँच पेज में कैसे समेटें?
शीर्षकशीर्षक बनाना सबसे कठिन काम मानते हैं — “शीर्षक देने का भार मैं अपने मित्र पर छोड़ देता हूँ।”शीर्षक तो पहले से तय हैं (नमिता और अमिता के दिए हुए); उसकी कठिनाई शीर्षक बनाने की नहीं, दिए हुए शीर्षक को भरने की है।
रूपरेखाप्रसंग में रूपरेखा का समर्थन नहीं; वे सहज प्रवाह के पक्ष में हैं।“मैं सोच ही नहीं सकता कि इस विषय की कैसी रूपरेखा है… इसलिए मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।”
पर विरोध कहाँ है, कहाँ नहीं: ध्यान दीजिए, बख्शी गार्डिनर को ग़लत नहीं कहते — “गार्डिनर साहब के इस कथन की यथार्थता में मुझे संदेह नहीं, पर मेरे लिए कठिनता यह है कि…” यानी अंतर सिद्धांत का नहीं, स्वभाव और अनुभव का है। गार्डिनर उस लेखक की बात कर रहे हैं जिसे प्रेरणा मिलती है; बख्शी उस लेखक की, जिसे मेज़ पर बैठकर, घड़ी देखते हुए, दो घंटे में दो निबंध देने हैं। यही ईमानदारी इस निबंध को आत्मीय बनाती है।
प्र2.
2. लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर

असंतोष एक ही है, पर उसकी दिशा उलटी है — तरुण का असंतोष आगे की ओर देखता है, वृद्ध का पीछे की ओर। पाठ का वाक्य है — “तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं।”

तरुणों के असंतोष के कारणवृद्धों के असंतोष के कारण
भविष्य का चित्र उन्होंने कल्पना में गढ़ा है और वर्तमान उससे मेल नहीं खाता — इसलिए वर्तमान अधूरा लगता है।अतीत का चित्र उन्होंने स्मृति में सँजोया है, और स्मृति कठोरता को छाँट देती है — इसलिए वर्तमान उतरा हुआ लगता है।
परिवर्तन की गति धीमी लगती है; व्यवस्थाएँ, नियम और परंपराएँ बाधा जान पड़ती हैं।परिवर्तन की गति तेज़ लगती है; जिन मूल्यों में वे पले, वे छूटते दिखते हैं।
वे जीवन-संग्राम से अभी दूर हैं, इसलिए “संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है” — और उतना सुंदर संसार न मिलने पर क्षोभ होता है।वे अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, इसलिए “अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है” — और वैसा वर्तमान न पाकर क्षोभ होता है।
अपनी शक्ति, उत्साह और नएपन को आज़माने का अवसर वर्तमान में कम दिखता है।अनुभव और परामर्श का मान घटता दिखता है; निर्णयों में अपनी जगह कम लगती है।
इसीलिए वे क्रांति के समर्थक बनते हैं — “अभी और तुरंत” उनका स्वर है।इसीलिए वे अतीत-गौरव के संरक्षक बनते हैं — “जो सिद्ध हो चुका, उसे बचाओ” उनका स्वर है।
एक ही जड़, दो शाखाएँ: दोनों के असंतोष की जड़ वही है जो पूरे निबंध की धुरी है — दूरी। भविष्य तरुण से दूर है, अतीत वृद्ध से दूर है; और “दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता।” जो पास है — वर्तमान — उसकी कठोरता दोनों को दिखती है, इसलिए दोनों उससे असंतुष्ट हैं। लेखक इसे दोष नहीं मानता; वह कहता है कि इन्हीं दोनों के कारण “वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।” अर्थात् यह असंतोष ही समाज को आगे बढ़ाता है।
अपने अनुभव से जोड़िए: घर में मोबाइल के समय को लेकर होने वाली बहस इसी का छोटा रूप है — बच्चे कहते हैं “नया ज़माना है”, बड़े कहते हैं “हमारे समय में ऐसा नहीं था।” दोनों अपनी-अपनी दूरी से बोल रहे होते हैं।
प्र3.
3. नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं?
उत्तर

नमिता का आदेश है कि लेखक “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” पर निबंध लिखे, और अमिता का आग्रह है कि वह “समाज-सुधार” पर लिखे। दोनों विषय परीक्षा में आ चुके हैं, इसलिए लेखक को केवल निबंध नहीं लिखने — दोनों को निबंध-रचना का रहस्य भी समझाना है।

लेखक की कठिनाइयाँ —

  1. मानसिक स्थिति ही नहीं बनती। गार्डिनर वाली वह उमंग-स्फूर्ति-आवेग की स्थिति उसने कभी अनुभव नहीं की; उसे तो “सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है।”
  2. दो उलटे स्वभाव के विषय। एक विषय बहुत छोटा है — “दूर के ढोल सुहावने अवश्य होते हैं। पर क्या वे इतने सुहावने होते हैं कि उन पर पाँच पेज लिखे जा सकें?” दूसरा बहुत बड़ा — समाज-सुधार की चर्चा “अनादि काल से लेकर आज तक होती आ रही है और जिसके संबंध में बड़े-बड़े विज्ञों में भी विरोध है”, उसे पाँच पेज में कैसे समेटा जाए?
  3. सामग्री का अभाव। निबंध के दो प्रधान अंग हैं — सामग्री और शैली। पर “यह कौन जानता था कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर भी निबंध लिखने की आवश्यकता होगी।” पहले पता होता तो पुस्तकालय में अनुसंधान कर लेता; अब न विश्वकोश है, न कोई ग्रंथ, और समय भी नहीं।
  4. समय की कमी। “मुझे तो यहीं बैठकर दो ही घंटों में दो निबंध तैयार कर देने होंगे।”
  5. रूपरेखा नहीं बनती। निबंध लिखने से पहले उसका सार दस-पाँच शब्दों में कैसे लिखा जाए? वह स्वयं कहता है — “मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।” (साथ ही याद दिलाता है कि गार्डिनर को तो शीर्षक बनाने में ही सबसे अधिक कठिनाई होती थी और शेक्सपीयर ने घबराकर एक नाटक का नाम ही रख दिया — ‘जैसा तुम चाहो’।)
  6. शैली का द्वंद्व। आचार्य कहते हैं वाक्य छोटे-छोटे पर एक-दूसरे से बँधे हों; पर लेखक कहता है — “मैं तो हूँ मास्टर”, विद्वत्ता के प्रदर्शन के लिए वाक्य आधे पृष्ठ में समाप्त होने चाहिए, जैसे बाणभट्ट ने कादंबरी में लिखे; और भाषा में अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि दुर्बोधता गांभीर्य लाती है — जैसे श्रीहर्ष और सेनापति ने की। दोनों माँगें एक साथ पूरी करना असंभव है। इसी उलझन में वह पूछता है — “तब क्या किया जाए?”
कठिनाई का हल कैसे निकला: दो रास्तों से। पहला — मानटेन की पद्धति, यानी शास्त्र की जगह अपना देखा-सुना-अनुभव किया लिखना। दूसरा — अमीर खुसरो की युक्ति, यानी दोनों विषयों को एक ही निबंध में मिला देना। इसके बाद लेखक ‘ढोल’ से चलकर ‘दूरी’, ‘तरुण-वृद्ध’ और ‘सुधार’ तक पहुँच जाता है, और दोनों विषय अपने आप एक हो जाते हैं।
प्र4.
4. निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?
उत्तर

(क) आचार्यों की सुझाई युक्तियाँ — निबंध पढ़ते हुए ये पाँच बातें सामने आती हैं:

क्रमयुक्तिपाठ के शब्दों में
1.निबंध छोटा हो“निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह सकती।”
2.दो प्रधान अंग — सामग्री और शैली“निबंध के दो प्रधान अंग हैं— सामग्री और शैली।” पहले सामग्री एकत्र करनी होगी, विचार-समूह संचित करना होगा; इसके लिए मनन चाहिए।
3.पहले रूपरेखा बनाइए“विज्ञों का कथन है कि निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए।”
4.भाषा में प्रवाह हो“भाषा में प्रवाह होना चाहिए। इसके लिए वाक्य छोटे-छोटे हों, पर एक-दूसरे से बँधे।”
5.अलंकार, मुहावरे, लोकोक्तियाँ“अलंकारों, मुहावरों और लोकोक्तियों का समावेश भी निबंधों के लिए आवश्यक बताया जाता है।”
एक व्यंग्य भी पहचानिए: ‘आधे पृष्ठ का लंबा वाक्य’ और ‘भाषा में अस्पष्टता/दुर्बोधता’ आचार्यों की युक्ति नहीं, लेखक का व्यंग्य है — वह विद्वत्ता के दिखावे पर चुटकी ले रहा है। इसे ‘आदर्श निबंध का नियम’ मानकर मत लिखिए।

(ख) मैं निबंध लिखने से पहले क्या तैयारी करता/करती हूँ —

नमूना उत्तर: “सबसे पहले मैं विषय को अपने शब्दों में एक वाक्य में लिखता हूँ, ताकि यह तय हो जाए कि वास्तव में पूछा क्या गया है। फिर पाँच-सात मिनट कच्चे काग़ज़ पर जो कुछ मन में आता है — घटनाएँ, उदाहरण, आँकड़े, किसी की कही बात — बिना क्रम के लिख लेता हूँ। इसके बाद उन बिंदुओं को तीन खानों में बाँटता हूँ: भूमिका (विषय क्या है और आज क्यों महत्त्वपूर्ण है), विस्तार (दो-तीन पक्ष, हर पक्ष के साथ एक उदाहरण) और निष्कर्ष (मेरी अपनी राय)। यही मेरी रूपरेखा बन जाती है। यदि विषय पर जानकारी कम हो तो पुस्तकालय या पाठ्यपुस्तक से दो-तीन तथ्य नोट कर लेता हूँ। लिखते समय मैं वाक्य छोटे रखता हूँ, आरंभ में एक लोकोक्ति या प्रश्न रखता हूँ और अंत में वही बात दोहराता हूँ जो भूमिका में उठाई थी — इससे निबंध बँधा हुआ लगता है। लिख लेने के बाद एक बार पढ़कर वर्तनी, विराम-चिह्न और दोहराए गए शब्द ठीक करता हूँ।”
पर एक बात लेखक से भी सीखिए: रूपरेखा सहायक है, बंधन नहीं। बख्शी की बात में सच्चाई है कि लिखने से पहले हर बार ‘सार’ नहीं निकाला जा सकता। इसलिए रूपरेखा को अंतिम मानकर मत चलिए — लिखते-लिखते कोई अच्छा विचार आ जाए तो रूपरेखा बदल दीजिए।
प्र5.
5. मानटेन ने “जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।” निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?
उत्तर

देखना, सुनना और अनुभव करना निबंध की सामग्री जुटाने का सबसे सुलभ और सबसे सच्चा साधन है। जो बात हमने स्वयं भोगी है, उसे लिखने के लिए न विश्वकोश चाहिए, न पुस्तकालय — और वही बात पाठक तक सबसे सीधी पहुँचती है।

  • सामग्री का अक्षय भंडार। लेखक की सबसे बड़ी अड़चन यही थी कि “यहाँ न तो विश्वकोश है और न कोई ऐसा ग्रंथ जिसमें इन विषयों की सामग्री उपलब्ध हो सके।” अनुभव यह अड़चन मिटा देता है — वह हर समय लेखक के पास रहता है।
  • सच्चाई और विश्वसनीयता। मानटेन-शैली के निबंधों की विशेषता पाठ में यही बताई गई है — “उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है।” उधार लिया हुआ विचार ठंडा होता है; भोगा हुआ अनुभव गरम।
  • मौलिकता। एक ही विषय पर सौ लोग लिखें तो तथ्य सबके एक जैसे होंगे, पर अनुभव किसी दो का एक नहीं होगा। इसी से निबंध “मन की स्वच्छंद रचना” बनता है।
  • छोटी-सी बात से बड़ा सत्य निकालने की शक्ति। इसका सबसे अच्छा प्रमाण यही पाठ है। लेखक ने ढोल की आवाज़ सुनी, दूर बैठे आदमी के मन का चित्र देखा — और उसी से यह सत्य निकाल लिया कि “दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता।” यह वाक्य किसी ग्रंथ से नहीं आया, अनुभव से आया।
  • सजीव चित्रण। अनुभव ब्योरे देता है — कोलाहल से भरा घर, कोने में बैठी लज्जाशील नव-वधू, उसके हृदय का प्रेम-उल्लास-संकोच-आशंका-विषाद। ऐसे ब्योरे किसी सिद्धांत से नहीं, देखी हुई दुनिया से मिलते हैं।
  • सहज भाषा। जो अपना अनुभव लिखता है, उसे कठिन शब्द ओढ़ने नहीं पड़ते। इसीलिए ऐसे निबंधों में न ‘ज्ञान की गरिमा’ का बोझ रहता है, न ‘कल्पना की महिमा’ का।
एक संतुलन भी याद रखिए: अनुभव अध्ययन का विकल्प नहीं, पूरक है। स्वयं बख्शी ने भी निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं, गार्डिनर को पढ़ा, खुसरो और बाणभट्ट को याद किया — और तब अनुभव के सहारे लिखा। पढ़ा हुआ ढाँचा देता है, भोगा हुआ प्राण। अच्छा निबंध दोनों के मेल से बनता है।
अभ्यास के लिए: आज से एक छोटी ‘अनुभव-पोथी’ रखिए। रोज़ दो पंक्तियाँ लिखिए — आज क्या देखा, किसकी कोई बात कान में रह गई, और किस बात पर मन ठिठका। महीने भर बाद देखिए, किसी भी विषय पर निबंध लिखने के लिए आपके पास अपने उदाहरण तैयार मिलेंगे।
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