गंगा अध्याय 2 मेरे उत्तर मेरे तर्क

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं? 1. “हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है... असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।” निबंध में ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है? (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना (ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्री को प्रमुख बताना (ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिता बताना (घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखन का समर्थन करना
उत्तर

सही उत्तर — (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना।

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है: यह दृष्टांत ए.जी. गार्डिनर के कथन को समझाने के लिए आया है। गार्डिनर कहते हैं कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है, जिसमें “विषय की चिंता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं।” इसके ठीक बाद हैट-खूँटी का उदाहरण आता है और लेखक स्वयं उसका अर्थ खोल देता है — “इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।” यहाँ हैट = लेखक के मन के भाव (असली वस्तु) और खूँटी = विषय (केवल टाँगने का आधार)। जैसे हैट किसी भी खूँटी पर टँग सकता है, वैसे ही भाव किसी भी विषय के सहारे प्रकट हो सकते हैं। इसलिए यह दृष्टांत विषय की नहीं, भाव की प्रधानता उजागर करता है।

शेष विकल्प क्यों नहीं —

विकल्पनिर्णयकारण
(क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानतासही ✓“असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं” का सीधा अनुवाद यही है — भाव असली, विषय गौण।
(ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्रीग़लतदृष्टांत में तथ्य या सामग्री की बात है ही नहीं। उलटे लेखक आगे स्वीकार करता है कि उसके पास न विश्वकोश है, न कोई ग्रंथ — फिर भी वह लिखेगा।
(ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिताग़लतशैली और भाषा-व्यवस्था की चर्चा निबंध में बाद में, आचार्यों के प्रसंग में आती है। हैट-खूँटी वाला वाक्य उससे बहुत पहले, गार्डिनर के प्रसंग में आया है और उसका विषय ‘भाव बनाम विषय’ है।
(घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखनग़लतयह विकल्प बात को उलट देता है। यहाँ तो स्वयं एक उदाहरण देकर सिद्धांत समझाया जा रहा है; लेखक सिद्धांत-प्रधान लेखन का समर्थन कहीं नहीं करता — वह तो आगे शास्त्र की कसौटियों पर चुटकी लेता है।
ध्यान दीजिए: ऐसे प्रश्न में उत्तर ढूँढ़ने का सबसे पक्का तरीक़ा यह है कि दृष्टांत के तुरंत बाद वाली पंक्ति पढ़िए — प्रायः लेखक स्वयं वहाँ उसका अर्थ खोल देता है, जैसे यहाँ खोला है।
प्र2.
2. “उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है... उसका उल्लास रहता है।” मानटेन की पद्धति लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है? (क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न देना (ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना (ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
उत्तर

सही उत्तर — (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना।

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है: मानटेन के विषय में लेखक लिखता है कि “उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया” और ऐसे निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि “वे मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं”। इसी पूरे वर्णन के तुरंत बाद लेखक अपना निर्णय सुनाता है — “तब इसी पद्धति का अनुसरण कर मैं भी क्यों न निबंध लिखूँ।” अर्थात् मानटेन की पद्धति उसे यह आधार देती है कि वह शास्त्र की रूपरेखा-सामग्री वाली विधि छोड़कर अपने देखे-सुने-भोगे अनुभव के बल पर, स्वच्छंद ढंग से लिखे। आगे का पूरा निबंध — ढोल, नव-वधू, तरुण-वृद्ध — इसी निर्णय का फल है।

शेष विकल्प क्यों नहीं —

  • (क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न देना — ठीक उलटा है। लेखक सहज भाषा का पक्षधर है; उसने स्वयं कहा है, “मैं छोटे-छोटे वाक्य अच्छी तरह लिख सकता हूँ।” जिस दुर्बोधता पर वह व्यंग्य करता है, वह आचार्यों की माँग है, उसकी अपनी पसंद नहीं।
  • (ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना — लेखक किसी को अस्वीकार नहीं करता। वह विनम्रता से कहता है कि अंग्रेजी निबंधकार “इन आचार्यों की कसौटी पर भले ही खरे सिद्ध न हों, पर अंग्रेजी साहित्य में उनका मान अवश्य है।” यह अस्वीकार नहीं, दूसरा रास्ता चुनना है।
  • (ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना — मानटेन की पद्धति आलस्य का नाम नहीं है। ‘देखना, सुनना और अनुभव करना’ स्वयं एक कठिन अध्ययन है। लेखक ने भी निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं — पढ़े बिना वह भी नहीं लिख रहा।
प्र3.
3. “तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल... वृद्धों के लिए अतीत सुखद...” यह तुलना किस पर आधारित है? (क) तर्क और भावना (ख) ज्ञान और शिक्षा (ग) परिश्रम और उपलब्धि (घ) अभिलाषा और अनुभव
उत्तर

सही उत्तर — (घ) अभिलाषा और अनुभव।

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है: इस तुलना की जड़ में निबंध का केंद्रीय वाक्य है — “दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता।” तरुण के पास अभी अनुभव नहीं, केवल अभिलाषा (चाह, स्वप्न) है; इसलिए जो अभी आया ही नहीं — भविष्य — वह उसे उज्ज्वल दिखता है। वृद्ध के पास अब अनुभव है और वह अनुभव उसे बीते हुए दिनों की ओर खींचता है; इसलिए जो बीत चुका — अतीत — वह उसे सुखद लगता है। लेखक इसी को आगे खोलता है — “तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक।” क्रांति अभिलाषा से जन्मती है, संरक्षण अनुभव से।

शेष विकल्प क्यों नहीं —

विकल्पक्यों नहीं
(क) तर्क और भावनातुलना का आधार बुद्धि बनाम भावना नहीं है। लेखक दोनों को समान रूप से स्वप्न देखते हुए दिखाता है — “दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं।” दोनों ही भावना के पक्ष में हैं।
(ख) ज्ञान और शिक्षापूरे प्रसंग में ज्ञान या शिक्षा का कोई उल्लेख ही नहीं। भेद उम्र और दूरी का है, पढ़ाई-लिखाई का नहीं।
(ग) परिश्रम और उपलब्धियहाँ किसी की उपलब्धि नापी ही नहीं जा रही। असंतोष दोनों को है — तरुण भविष्य को खींचकर वर्तमान में लाना चाहता है, वृद्ध अतीत को। यह उपलब्धि का नहीं, दृष्टि का अंतर है।
(घ) अभिलाषा और अनुभवयही दो शब्द तरुण और वृद्ध की मनःस्थिति को ठीक-ठीक पकड़ते हैं — एक के पास चाह है, दूसरे के पास बीता हुआ जीवन।
प्र4.
4. निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है? (क) कविता लेखन की कला को समझाने के लिए (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए (ग) ढोल के महत्व को दर्शाने के लिए (घ) सामाजिक सुधार के उदाहरण के रूप में
उत्तर

सही उत्तर — (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए।

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है: लेखक की समस्या यह थी कि उसे दो निबंध लिखने हैं — नमिता के लिए ‘दूर के ढोल सुहावने’ और अमिता के लिए ‘समाज-सुधार’। ठीक इसी अड़चन पर उसे खुसरो याद आते हैं। कुएँ पर चार स्त्रियों ने चार अलग विषय माँगे — खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल — और “अमीर खुसरो प्रतिभावान थे, उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छाओं की पूर्ति कर दी” —
“खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा॥”
कहानी के तुरंत बाद लेखक स्वयं निष्कर्ष लिखता है — “मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है, पर उनकी इस पद्धति को स्वीकार करने से मेरी कठिनाई आधी रह जाती है। मैं भी एक निबंध में इन दोनों विषयों का समावेश कर दूँगा।” इससे स्पष्ट है कि कहानी कई विषयों को एक साथ साध लेने की युक्ति के संदर्भ में आई है।

शेष विकल्प क्यों नहीं —

  • (क) कविता लेखन की कला — पद्य यहाँ साधन है, साध्य नहीं। लेखक को कविता नहीं, निबंध लिखना है; वह खुसरो से छंद नहीं, पद्धति उधार ले रहा है।
  • (ग) ढोल के महत्व को दर्शाना — ‘ढोल’ पद्य की चार वस्तुओं में से केवल एक है। यदि उद्देश्य ढोल होता तो खीर, चरखा और कुत्ते का कोई काम न था।
  • (घ) सामाजिक सुधार का उदाहरण — इस कहानी में समाज-सुधार का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं। समाज-सुधार वाला भाग तो इसके बहुत बाद, बुद्धदेव-कबीर-नानक के प्रसंग में आता है।
जोड़ने वाली बात: यही युक्ति निबंध का ढाँचा बन जाती है — लेखक ‘ढोल’ से शुरू करके ‘दूरी’ तक, दूरी से ‘तरुण-वृद्ध’ तक और वहाँ से ‘सुधारों’ तक पहुँच जाता है। दो विषय एक ही सूत्र में बँध जाते हैं।
प्र5.
5. निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है? (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है। (ख) सुधार केवल बड़े विचारकों द्वारा संभव हैं। (ग) सुधार केवल आधुनिक युग की देन हैं। (घ) सुधारों का कोई अंत नहीं, लेकिन दोष समाप्त हो जाते हैं।
उत्तर

सही उत्तर — (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है: निबंध का वाक्य ही यही है — “मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।” इसके समर्थन में लेखक बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी — यानी अलग-अलग युगों के सुधारक — एक पंक्ति में गिना देता है और पूछता है, “पर सुधारों का अंत कब हुआ है?” यही ‘हर युग’ वाली बात को सिद्ध करता है।

शेष विकल्प क्यों नहीं —

विकल्पनिर्णयपाठ से प्रमाण
(क) हर युग में आवश्यकतासही ✓“कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।”
(ख) केवल बड़े विचारकों द्वारा संभवग़लतलेखक ने साफ़ लिखा है — “सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है।” यानी सुधार बड़े नामों तक सीमित नहीं, वह हर गली-गाँव में चलता रहता है।
(ग) केवल आधुनिक युग की देनग़लतसूची बुद्धदेव और महावीर स्वामी से आरंभ होती है — ये ढाई हज़ार वर्ष पुराने हैं। साथ ही लिखा है कि यह चर्चा “अनादि काल से लेकर आज तक होती आ रही है।”
(घ) सुधारों का अंत नहीं, पर दोष समाप्त हो जाते हैंग़लतयह विकल्प आधा सच है, इसीलिए भ्रामक है। पाठ कहता है — “न दोषों का अंत है और न सुधारों का।” दोष समाप्त नहीं होते; उलटे “जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं।”
तर्क की कसौटी: विकल्प (घ) जैसे ‘आधे सही’ विकल्प परीक्षा में सबसे अधिक चूक कराते हैं। उपाय एक ही है — पूरे वाक्य को पाठ की पंक्ति से मिलाइए, केवल उसके पहले आधे हिस्से से नहीं।
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