मेरे अनुसार ‘संवादहीन’ का अंत मुख्यतः मुक्त अंत है, और साथ-साथ यथार्थवादी भी। इसमें व्यंग्य की एक परत भी है।
कहानी की अंतिम पंक्ति — “ताई अपने मिट्ठू को गुहार कर थक गईं लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा।”
| श्रेणी | क्यों लागू होती है |
|---|---|
| मुक्त अंत (मुख्य) | कहानी कहीं ‘खत्म’ नहीं होती — बहुत-से प्रश्न खुले छोड़ दिए जाते हैं। ताई को सच पता चला या नहीं? क्या वे एवजी तोते को अपना लेंगी? मिट्ठू जंगल में जीवित रह पाया या नहीं? लेखक एक भी उत्तर नहीं देता। ‘न जाने’ और ‘घूम रहा होगा’ — ये संदेहवाचक शब्द ही संकेत हैं कि निर्णय पाठक पर छोड़ा गया है। |
| यथार्थवादी अंत | जीवन में भी ऐसा ही होता है — जो चला जाता है वह लौटकर नहीं आता, और कोई नाटकीय चमत्कार नहीं होता। न ताई बेहोश होती हैं, न गाँव इकट्ठा होता है, न मिट्ठू लौटता है। सब कुछ चुपचाप, बिना शोर के घट जाता है — यही यथार्थ है। |
| व्यंग्यात्मक परत | अंत में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक आदर्शवादी के अच्छे इरादे ने एक वृद्धा का इकलौता सहारा छीन लिया, और गाँव ने उसे झूठ से ढाँकना चाहा। “अकेले मिट्ठू क्या उड़े, आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते उड़ गए” — यह वाक्य व्यंग्य की तीखी नोक है। |