ऐसा जान-बूझकर किया गया है, और इसके पीछे कम से कम चार कारण दिखाई देते हैं।
- यह उस समाज का यथार्थ है। गाँव में स्त्री की पहचान अक्सर उसके अपने नाम से नहीं, पति के नाम या पेशे से बनती है — ‘मास्टराइन’, ‘पंडिताइन’, ‘लम्बरदारिन’, ‘फलाँ की घरवाली’। लेखक ने समाज की भाषा वैसी ही रख दी, जैसी वह है। यह लेखक का पक्ष नहीं, समाज का दर्पण है।
- यह चुपचाप किया गया एक व्यंग्य है। ध्यान दीजिए — कहानी में ताई का भी असली नाम नहीं है। दोनों स्त्रियाँ रिश्ते के नाम से जानी जाती हैं, जबकि पुरुष पात्रों के अपने नाम हैं — जगन मास्टर, गनपत। यह अंतर अपने आप बहुत कुछ कह देता है। जिस कहानी का शीर्षक ‘संवादहीन’ हो, उसमें स्त्री का नाम तक न बोला जाना अर्थपूर्ण है।
- वह पात्र नहीं, भूमिका है। कहानी में उसका काम इतना ही है कि वह ताई की चिंता दूर करे और मिट्ठू को अपने घर रखे। कहानी का केंद्र ताई, मिट्ठू और जगन मास्टर हैं। गौण पात्र को नाम न देकर लेखक पाठक का ध्यान बँटने नहीं देता — यह कहानी विधा की कसावट है।
- यह विडंबना को गहरा करता है। जो स्त्री बिना पति से पूछे दायित्व लेने का साहस करती है (“उनसे सलाह लिए बिना मास्टराइन ने ताई का भार अपना लिया था”), उसी का अपना नाम कहानी में नहीं है। निर्णय उसका, नाम पति का।