गंगा अध्याय 3 कल्पना और लेखन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए।” अपना घर छोड़कर नए स्थान पर बस जाना आसान नहीं होता है। ताई के बहू-बेटों ने गाँव क्यों छोड़ा होगा? गाँव छोड़ते समय क्या-क्या सोचा होगा? अपना घर छोड़ने के लिए स्वयं को कैसे तैयार किया होगा?
उत्तर

(क) गाँव क्यों छोड़ा होगा —

  • आजीविका का संकट: कहानी स्वयं संकेत देती है — जमींदारी का दौर बीत चुका था, “धीरे-धीरे सब पराए हाथों में चला गया।” जब खेती-बाड़ी और कारबार ही न बचे, तो कमाई का कोई साधन गाँव में नहीं बचता।
  • नौकरी और शिक्षा: पढ़े-लिखे नौजवानों के लिए काम शहर में ही था। बच्चों की पढ़ाई, अस्पताल, बिजली-पानी जैसी सुविधाएँ भी शहर में अधिक थीं।
  • बदली हुई आकांक्षाएँ: बड़े घर का पुराना रोब अब केवल स्मृति था। नई पीढ़ी अपनी पहचान अपने काम से बनाना चाहती थी, पुरखों के नाम से नहीं।
  • सामाजिक दबाव: जब आसपास के लोग शहर जाने लगते हैं, तो पीछे रह जाना भी कठिन लगने लगता है।

(ख) गाँव छोड़ते समय क्या सोचा होगा — मन में एक साथ दो धाराएँ बहती हैं। एक ओर उम्मीद — “वहाँ काम मिलेगा, बच्चे पढ़ेंगे, हालत सुधरेगी।” दूसरी ओर अपराध-बोध — “माँ अकेली रह जाएँगी, घर सूना पड़ जाएगा, पुरखों का बड़ा घर कौन सँभालेगा?” और एक झूठा दिलासा, जो लगभग हर पलायन करने वाला अपने को देता है — “दो-चार साल की बात है, फिर लौट आएँगे।”

(ग) स्वयं को कैसे तैयार किया होगा —

  • पहले कोई एक जन अकेला शहर गया होगा, काम और कमरा जमाकर फिर परिवार को बुलाया होगा।
  • खेत-मवेशी बटाई पर या हिस्सेदारी में किसी को सौंप दिए होंगे।
  • माँ के लिए यह तय किया होगा कि हर महीने पैसे भेजते रहेंगे और त्योहारों पर आते रहेंगे।
  • मन को यह कहकर समझाया होगा कि यह हमेशा के लिए नहीं है — “गाँव तो अपना है ही।”
कहानी का इशारा: लेखक ने बेटों को खलनायक नहीं बनाया। उसने केवल इतना लिखा — “गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए।” इस ‘होकर रह गए’ में ही पूरी त्रासदी है: वे बुरे नहीं हुए, बस लौटे नहीं। पलायन में अक्सर कोई दोषी नहीं होता, फिर भी कोई न कोई छूट जाता है।
प्र2.
“वहाँ बैठे एवजी मिट्ठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की” — ताई सोच रही थीं कि मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ कहेगा, लेकिन एवजी मिट्ठू चुप था। कल्पना कीजिए कि एक दिन असली मिट्ठू वापस आ गया। मिट्ठू ने नए तोते को देखकर क्या कहा होगा? आगे की कहानी लिखिए। (संकेत— प्रारंभ कीजिए— “एक दिन आकाश में वही हरे पंख चमके…”)
उत्तर

यह सृजनात्मक लेखन है। ध्यान रखिए — कहानी की भाषा, पात्रों का स्वभाव और उसका मूल स्वर (संवाद बनाम मौन) बना रहना चाहिए, और संवाद वैसे ही छोटे-छोटे हों जैसे मूल कहानी में हैं।

नमूना उत्तर:

एक दिन आकाश में वही हरे पंख चमके… दोपहर की चुप्पी में अचानक बरामदे के ऊपर एक फड़फड़ाहट हुई। ताई ने आँख उठाकर देखा — नीम की सबसे ऊँची डाल पर वही चोंच, वही लाल कंठा, वही तिरछी नजर।

“हर हर गंगे!” — डाल से आवाज उतरी।

ताई के हाथ से कटोरी छूट गई। वे उठकर आँगन में आ गईं और काँपते स्वर में बोलीं, “मिट्ठू… बेटा?”

मिट्ठू उतरकर पिंजरे की छत पर आ बैठा। भीतर बैठा नया तोता सहमकर एक कोने में दुबक गया। मिट्ठू ने उसे तिरछी आँख से देखा और बोला — “राम-राम कहो, सीताराम कहो।”

नया तोता चुप रहा। मिट्ठू ने फिर कहा — “कटेगी! कटेगी!!”

नया तोता फिर भी चुप। तब मिट्ठू ने सिर हिलाया, मानो समझ गया हो कि यह बोलना नहीं जानता, केवल बैठना जानता है। उसने चोंच से पिंजरे की सलाख खटखटाई और आँगन में उतर आया।

ताई ने काँपते हाथों से पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। नया तोता कुछ देर बैठा रहा, फिर फुदककर बाहर आ गया। दोनों तोते आँगन में बिखरे दानों को चुगने लगे।

उस दिन के बाद बड़े घर में एक नया नियम बन गया। पिंजरा खाली बरामदे में टँगा रहता और तोते जब चाहते आते, जब चाहते उड़ जाते। शाम को ताई देहरी पर बैठकर पुकारतीं — “मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!!” और नीम की डाल से दो आवाजें एक साथ उतरतीं। जगन मास्टर बगल से गुजरते तो रुककर सुनते, फिर सिर झुकाकर आगे बढ़ जाते।

क्यों यह अंत ठीक बैठता है: इसमें कहानी का शीर्षक उलटकर सार्थक हो जाता है — जो घर ‘संवादहीन’ हो गया था, वहाँ फिर संवाद लौट आता है, पर पिंजरे के बिना। यानी ताई और जगन मास्टर दोनों की बात एक साथ सच हो जाती है।
प्र3.
“अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे।” आज घर जाकर अपने किसी बड़े या बुजुर्ग से बात कीजिए। उनसे पूछिए— “आप जब मेरी आयु के थे, तब समय कैसे बिताया करते थे; क्या-क्या बातें या काम करते थे? आदि”। उनके कहे हुए अनुभव अपनी पुस्तिका में लिखिए।
उत्तर

यह गतिविधि है, इसलिए उत्तर आपका अपना होगा। पहले तरीका, फिर एक नमूना

कैसे कीजिए —

  1. समय तय कीजिए: शाम को या छुट्टी के दिन, जब बुजुर्ग खाली हों। जल्दबाजी में पूछी गई बात अधूरी रह जाती है।
  2. प्रश्न पहले लिख लीजिए: जैसे — आप कहाँ रहते थे? विद्यालय कितनी दूर था? खेल कौन-से खेलते थे? त्योहार कैसे मनते थे? घर में सबसे बड़ी खुशी और सबसे बड़ी कठिनाई क्या थी? तब क्या नहीं था जो आज है?
  3. टोकिए मत: उन्हें पूरी बात कहने दीजिए। बीच-बीच में केवल “फिर क्या हुआ?” पूछिए — इससे स्मृति खुलती है।
  4. उन्हीं के शब्द लिखिए: जो शब्द वे बोलते हैं (जैसे ‘पौ फटना’, ‘जून’, ‘देहरी’) उन्हें बदलिए मत। यही उस पीढ़ी की भाषा का दस्तावेज है।
  5. अंत में एक वाक्य अपना जोड़िए: कि सुनकर आपको क्या लगा।

नमूना उत्तर (दादी से बातचीत):

“उस समय गाँव में बिजली नहीं थी। पौ फटते ही उठ जाते थे — मैं और मेरी बड़ी बहन कुएँ से पानी भरने जाते। दिन में गोबर पाथना, चारा काटना और सिलाई का काम रहता। विद्यालय हमारे लिए नहीं था; लड़कियाँ चौथी से आगे कम ही पढ़ती थीं।

पर मन भारी नहीं रहता था, क्योंकि घर में लोग बहुत थे। बड़े आँगन में शाम को सब जुटते — कोई किस्सा सुनाता, कोई गीत गाता। सावन में झूला पड़ता, तीज पर सब सज-सँवरकर मैके आतीं। खेलने के लिए गुड्डे-गुड़िया, गिट्टक और कबड्डी थी। खाने में जो घर का उपजा, वही — मक्के की रोटी, साग, गुड़।

आज सुविधाएँ बहुत हैं, पर आँगन खाली हैं। तब हमारे पास चीजें कम थीं और आदमी ज्यादा; अब चीजें ज्यादा हैं और आदमी कम।”

यह गतिविधि पाठ से कैसे जुड़ती है: दादी की अंतिम पंक्ति ठीक वही बात कहती है जो ताई का ‘सूना खंडहर’ कहता है। इस बातचीत से आप समझेंगे कि ‘संवादहीन’ किसी एक ताई की कहानी नहीं — यह एक पूरी पीढ़ी का अनुभव है।
प्र4.
“मिट्ठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए! वो गए!!” मान लीजिए कि जगन मास्टर ने मिट्ठू की खोज के लिए एक विज्ञापन प्रकाशित किया है। अपनी कल्पना से वह विज्ञापन बनाइए। (संकेत— आप समाचार पत्रों में प्रकाशित खोया-पाया या तलाश संबंधी विज्ञापन देख सकते हैं।)
उत्तर

खोया-पाया विज्ञापन में क्या-क्या होना चाहिए — मोटा शीर्षक, खोई हुई वस्तु/प्राणी का सटीक हुलिया, उसकी पहचान की खास बात, कब और कहाँ से खोया, लौटाने पर पुरस्कार, और संपर्क का पता। भाषा छोटी, सीधी और सूचनात्मक होनी चाहिए।

नमूना उत्तर:

तोता खोया है — सूचना
क्या खोयाएक पालतू पहाड़ी हरा तोता, नाम — मिट्ठू
हुलियागहरे हरे पंख, लाल टेढ़ी चोंच, गले में काला-गुलाबी कंठा; देखने पर सिर टेढ़ा करके तिरछी आँख से देखता है
खास पहचानबोलता है — “राम-राम कहो, सीताराम कहो”, “हर हर गंगे”, “कटेगी! कटेगी!!”, “खुश रहो!”
कब और कहाँ सेपिछले मंगलवार दोपहर, जगन मास्टर के मकान के रोशनदान से उड़ा; अंतिम बार गाँव के बाग में देखा गया
क्यों जरूरीयह तोता एक वृद्धा (ताई) की अमानत है और उनका एकमात्र साथी है
पुरस्कारसही-सलामत लौटाने वाले को उचित पुरस्कार दिया जाएगा; किसी प्रकार का प्रश्न नहीं पूछा जाएगा
संपर्कजगन मास्टर, प्राथमिक विद्यालय के पास, गाँव — [अपने गाँव का नाम लिखिए]
चाहें तो अंत में एक भावुक पंक्ति भी जोड़ सकते हैं — “यह पक्षी किसी के लिए तोता है, किसी के लिए बेटा।” असली विज्ञापन में ऐसी पंक्ति नहीं होती, पर कहानी के संदर्भ में यह पूरे प्रसंग का सार कह देती है।
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