कक्षा ९ हिंदी अध्याय 3 संवादहीन के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
रचनाकार — शेखर जोशी का जन्म सन् 1932 में अल्मोड़ा, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका पहला कहानी संग्रह कोसी का घटवार सन् 1958 में प्रकाशित हुआ। साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, आदमी का डर, डांगरी वाले, मेरा पहाड़ (कहानी संग्रह), एक पेड़ की याद (शब्दचित्र-संग्रह), स्मृति में रहें वे (संस्मरण), न रोको उन्हें शुभ्रा (कविता संग्रह) और मेरा ओलिया गाँव (आत्मवृत्त) उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं। उनकी कहानियों का समग्र शेखर जोशी कथा समग्र नाम से छपा है। उन्हें ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार’, ‘साहित्य भूषण सम्मान’, ‘अखिल भारतीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ और ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य पुरस्कार’ मिले। सन् 2022 में उनका निधन हुआ। कथावस्तु — गाँव के बीच खड़े ‘बड़े घर’ में अब केवल दो प्राणी बचे हैं — ताई और उनका तोता मिट्ठू । कभी उस घर में पूत-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्द | अर्थ | पाठ की पंक्ति | अपने वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|---|
| ढोर | पालतू गोजातीय पशुओं के लिए प्रयुक्त शब्द; चौपाया, डंगर | “पूत-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, क्या नहीं था बड़े घर में!” | खेत जोतने के बाद किसान अपने ढोरों को नदी पर ले गया। |
| तकाजा | आवश्यकता, इच्छा, अनुरोध; कोई काम करने के लिए बार-बार कहना | “मिट्ठू के वक्त-बेवक्त के तकाजों के लिए रोटी बचाकर रखतीं।” | भूख का तकाजा है कि पहले भोजन कर लिया जाए। |
| कुशाग्र | तीव्र; कुश की नोंक जैसा तीक्ष्ण | “कुशाग्र बुद्धि छात्र की तरह मिट्ठू ताई के पढ़ाए पाठ को … दुहरा देता।” | रमा कुशाग्र बुद्धि की है, एक बार पढ़ते ही याद कर लेती है। |
| पौ फटना | प्रातःकाल का प्रकाश फूटना; तड़का होना | “सुबह पौ फटने लगती, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं…” | पौ फटते ही चरवाहे गायों को लेकर निकल पड़े। |
| अचकचाना | भौचक्का होना, चौंक उठना | “ताई अचकचाकर उठ बैठतीं।” | अचानक घंटी बजी तो मैं अचकचाकर जाग गया। |
| निहाल | प्रसन्न, हर तरह से तृप्त | “ताई निहाल हो जातीं।” | पोते की पहली चिट्ठी पढ़कर दादी निहाल हो गईं। |
| सत्ता | अस्तित्व, यथार्थता, अधिकार, प्रभुत्व | “वैभव और सत्ता के बीते दिनों की गाथा।” | सत्ता आती-जाती रहती है, नाम काम से बनता है। |
| अतल | अथाह, तलहीन | “काल की अतल गहराइयों से झाँकता एक-एक चेहरा…” | स्मृति की अतल गहराई में बचपन का वह दिन आज भी सुरक्षित है। |
| प्रसंग | प्रकरण, संबंध, विषय का तारतम्य, लगाव | “…ताई को नए-नए प्रसंगों की याद दिला देता।” | बात-बात में उन्होंने अपने गाँव का प्रसंग छेड़ दिया। |
| रोबीला | प्रभावशाली | “जमींदार साहब का रोबीला चेहरा…” | फौजी चाचा का रोबीला चेहरा देखकर बच्चे चुप हो गए। |
| तुनकमिजाज | जो छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाए; चिड़चिड़ा | “उनकी गुणग्राहकता, उनकी तुनकमिजाजी, उनका गुस्सा…” | तुनकमिजाज व्यक्ति के साथ काम करना कठिन होता है। |
| वियोग | विच्छेद, विरह, अभाव | “ताई को घड़ी-भर के लिए भी मिट्ठू का वियोग सहन नहीं हो सकता था।” | बेटे के वियोग में माँ की आँखें भर आईं। |
| साँकल | जंजीर, सिकड़ी, शृंखला | “दस बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर देखतीं…” | रात को दरवाजे की साँकल चढ़ाना मत भूलना। |
| टोह | खोज, अनुसंधान, पता, देखभाल | “…साँकलें टोहकर देखतीं।” | पुलिस चोर की टोह में गाँव-गाँव घूम रही थी। |
| देहरी/देहली | दरवाजे की चौखट की नीचे वाली लकड़ी, जिसे लाँघकर घर में आते-जाते हैं | “…दिलासा देकर देहरी से पाँव बाहर निकालतीं।” | दुल्हन ने देहरी लाँघते ही चावल का कलश गिराया। |
| मिजाज | स्वभाव, तबीयत, प्रकृति, आदत | “जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे।” | हर आदमी का अपना मिजाज होता है। |
| प्रायश्चित | शोधन; वह शास्त्र-विहित कर्म जो पाप का मार्जन करने के लिए किया जाए | “…अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लें।” | गलती मान लेना ही सबसे सच्चा प्रायश्चित है। |
| कौतूहलवश | उत्सुकतावश, अचंभे के कारण | “…सहज कौतूहलवश वह पिंजरे की छत से … रोशनदान पर पहुँच गए।” | कौतूहलवश बच्चे ने घड़ी खोलकर देख ली। |
| मशगूल | कार्यरत; किसी काम या शगल में लगा हुआ | “…अपने पंख तौलने में मशगूल रहे।” | वह दिन भर किताबों में मशगूल रहता है। |
| अर्जन | कमाना, संग्रह करना | “…गंगा-स्नान का पुण्य अर्जन कर लौटी हुई ताई…” | ज्ञान का अर्जन जीवन भर चलता रहता है। |
| एवजी | बदले में काम करने वाला; स्थानापन्न | “…वहाँ बैठे एवजी मिट्ठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की।” | मास्टर जी की छुट्टी में एवजी शिक्षक पढ़ाने आए। |
| आग्नेय | अग्नि से उत्पन्न, अग्नि जैसा | “…तो आग्नेय दृष्टि से उनकी ओर देखकर पानी पीकर फिर दुहराते।” | उसकी आग्नेय दृष्टि देखकर सब चुप हो गए। |
| जून | वक्त, वेला; दिन का अर्द्ध भाग | “…ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेतीं।” | मजदूर को दो जून की रोटी भी कठिनाई से मिलती है। |
| भाँय-भाँय | सूनेपन की डरावनी ध्वनि; एकदम सुनसान होना | “…सूने घर की भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।” | मेले के बाद मैदान भाँय-भाँय करने लगा। |
अभ्यास
- मेरे उत्तर मेरे तर्क
- मेरी समझ मेरे विचार
- मेरे प्रश्न
- मेरे अनुभव मेरे विचार
- कहानी का सौंदर्य
- कहानी का अंत
- पात्र, कुंभ और मेला
- कल्पना और लेखन
- व्याकरण की बात
- ध्वन्यात्मकता शब्दों से
- शब्द-युग्म
- खोजबीन शब्दों की
- अर्थ के आधार पर वाक्य
- गतिविधियाँ
- मेरी पहेली
- भाषा संगम
- खोजबीन