गंगा अध्याय 3 मेरे उत्तर मेरे तर्क

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
कहानी में ताई और मिट्ठू का संबंध किस भाव को दर्शाता है? (क) परोपकार और त्याग (ख) ममता और स्नेह (ग) करुणा और क्रोध (घ) जिज्ञासा और सहायता
उत्तर

सही उत्तर — (ख) ममता और स्नेह

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है — कहानी स्वयं इस भाव का नाम लेकर बताती है: “ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी।” यह ममता केवल कहने की नहीं, करने की है। जो ताई “अपनी खातिर चूल्हा जलाने में आलस्य कर जाती थीं, वही अब नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं।” वे उसके “वक्त-बेवक्त के तकाजों के लिए रोटी बचाकर” रखती हैं और यह तक जान लेती हैं कि “किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं।” दूसरी ओर स्नेह एकतरफा नहीं है — मिट्ठू ताई को “कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!” कहकर ढाढ़स बँधाता है और ताई उसे “जीते रहो बेटा, जुग-जुग जिओ” का आशीष देती हैं। ‘बेटा’ संबोधन ही सिद्ध कर देता है कि यह रिश्ता माँ-बेटे की ममता का है।

बाकी विकल्प क्यों नहीं —
  • (क) परोपकार और त्याग — परोपकार में देने वाला ऊपर और पाने वाला नीचे होता है, और वह किसी अनजान पर किया जाता है। ताई मिट्ठू पर उपकार नहीं करतीं; वे उससे अपना अकेलापन बाँटती हैं। त्याग का भाव यहाँ गौण है, मुख्य नहीं।
  • (ग) करुणा और क्रोध — “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” जैसी खीझ कहानी में है ज़रूर, पर वह क्षणिक है — लेखक तुरंत जोड़ता है, “फिर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मिट्ठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।” जो भाव स्थायी नहीं, वह संबंध को परिभाषित नहीं कर सकता।
  • (घ) जिज्ञासा और सहायता — जिज्ञासा का कोई प्रसंग कहानी में है ही नहीं। सहायता का भाव है, पर वह ममता का परिणाम है, संबंध का मूल नहीं।
प्र2.
जगन मास्टर द्वारा मिट्ठू को पिंजरे से बाहर निकालना किस भावना या मूल्य का संकेत देता है? (क) अनुशासन और परंपरा (ख) उदासीनता और असावधानी (ग) आत्मगौरव और विद्रोह (घ) करुणा और नैतिकता
उत्तर

सही उत्तर — (घ) करुणा और नैतिकता

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है — लेखक ने जगन मास्टर के भीतर चल रही पूरी प्रक्रिया खोलकर रख दी है। पहले करुणा जागती है — “पिंजड़े में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होने लगती।” फिर वह करुणा नैतिक अपराध-बोध में बदलती है — “जब-जब मिट्ठू को देखते, अपनी पत्नी की बुद्धि पर तरस खाते और अपने आप को भी दोषी अनुभव करते।” और अंत में वह नैतिक बोध कर्म बन जाता है — “जब मिट्ठू की यातना असह्य हो गई, तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर … उसका दरवाजा खोल दिया, ताकि … अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लें।” ‘यातना’, ‘दोषी’, ‘पाप’, ‘प्रायश्चित’ — ये चारों शब्द नैतिक शब्दकोश के हैं। इसके पीछे उनका घोषित मूल्य भी पाठ में लिखा है: “स्वतंत्र विचारों के आदमी थे। दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते थे।”

बाकी विकल्प क्यों नहीं —
  • (क) अनुशासन और परंपरा — जगन मास्टर परंपरा का पालन नहीं, उलटा उल्लंघन कर रहे हैं। पिंजरे में तोता पालना ही उस समाज की परंपरा थी; वे उसी के विरुद्ध जा रहे हैं।
  • (ख) उदासीनता और असावधानी — असावधानी तो हुई, पर वह परिणाम है, प्रेरणा नहीं। प्रश्न भावना या मूल्य पूछ रहा है। उदासीन आदमी “हर रोज कमरा बंद” करके, मुट्ठी में अनाज लेकर, दरवाजे से बाहर तक दाना बिखेरकर घंटों निगरानी नहीं करता।
  • (ग) आत्मगौरव और विद्रोह — विद्रोह के लिए कोई सत्ता चाहिए जिसके विरुद्ध खड़ा हुआ जाए; यहाँ वैसा कोई टकराव नहीं। वे तो अपनी ही पत्नी के निर्णय पर चुपचाप दुखी होते हैं — यह आत्मगौरव नहीं, आत्म-धिक्कार है।
ध्यान दीजिए: उत्तर ‘करुणा और नैतिकता’ होने का अर्थ यह नहीं कि जगन मास्टर का काम सही था। कहानी का व्यंग्य ठीक यही है — अच्छी भावना भी, बिना दूसरे की स्थिति समझे, किसी का सब कुछ छीन सकती है।
प्र3.
मिट्ठू का उड़ जाना किस विचार को प्रस्तुत करता है? (क) भोजन की खोज (ख) प्रेम की आकांक्षा (ग) स्वतंत्रता की चाह (घ) पक्षियों में सम्मान की प्रवृत्ति
उत्तर

सही उत्तर — (ग) स्वतंत्रता की चाह

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है — उड़ान से ठीक पहले का वाक्य पूरी बात कह देता है — “एक दिन मिट्ठू की नजर ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई और सहज कौतूहलवश वह … तिरछी आँख अपने लक्ष्य की ओर देखकर रोशनदान पर पहुँच गए।” यहाँ ‘लक्ष्य’ शब्द निर्णायक है — खुला आकाश उसका लक्ष्य बन जाता है। फिर “मिट्ठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए! वो गए!!” उड़ने के बाद भी वह लौटता नहीं, बल्कि “एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने में मशगूल रहा।” ‘पंख तौलना’ मुहावरा ही अपनी उड़ान-शक्ति को नापने-आँकने का है — यानी वह अपनी नई मिली आजादी का सुख ले रहा है।

बाकी विकल्प क्यों नहीं —
  • (क) भोजन की खोज — पाठ इसी को सीधे काट देता है। जगन मास्टर “हाथ में अनाज लेकर ‘आ-आ’ की गुहार लगा ही रहे थे” — भोजन सामने था, फिर भी वह नहीं लौटा। भूखा पक्षी दाने की ओर आता, आकाश की ओर नहीं।
  • (ख) प्रेम की आकांक्षा — कहानी में कहीं किसी साथी पक्षी का, किसी जोड़े का, किसी बुलावे का ज़िक्र नहीं है। यह विकल्प पाठ से समर्थित ही नहीं।
  • (घ) पक्षियों में सम्मान की प्रवृत्ति — ‘सम्मान’ मनुष्य-समाज की धारणा है; लेखक ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया। मिट्ठू अपमानित होकर नहीं उड़ता, आकर्षित होकर उड़ता है।
सोचने के लिए: ध्यान दीजिए कि पहले दिन मिट्ठू ने “बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की” — क्योंकि वह “पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे”। स्वतंत्रता की चाह जागती है, तब जब खुला रोशनदान दिख जाता है। आजादी की इच्छा भी अवसर देखकर जागती है — यही इस प्रसंग की गहरी बात है।
प्र4.
ताई के जीवन के दुख का मुख्य कारण क्या था? (क) सम्मान और प्रतिष्ठा में कमी आना (ख) परिवार से दूरी और संवाद का अभाव (ग) आर्थिक विपन्नता और निर्धनता (घ) मिट्ठू के प्रति प्रेम और संवाद
उत्तर

सही उत्तर — (ख) परिवार से दूरी और संवाद का अभाव

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है — कहानी ताई का पूरा नुकसान गिनाती है और फिर स्वयं बता देती है कि उनमें से किस बात ने काटा। परिवार बिखर गया — “बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए। बेटियाँ अपने-अपने हाथ पीले कराकर अपनी गृहस्थी में रम गईं।” इसके बाद सीधा वाक्य आता है — “पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही, पर सूने घर की भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।” यानी दुख का स्रोत भूख नहीं, सूनापन था। इसीलिए एक बोलता हुआ तोता मिलते ही उनका जीवन बदल जाता है — “बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे मिट्ठू की बातचीत से अब रौनक में बदल गया था।” जिस अभाव को एक तोते की बातचीत भर देती हो, वह अभाव संवाद का ही हो सकता है।

बाकी विकल्प क्यों नहीं —
  • (क) सम्मान और प्रतिष्ठा में कमी — गाँव में उनकी स्थिति घटी नहीं है। लोग उन्हें न्यौते-बुलावे में बुलाते हैं, उनके स्वभाव और मिट्ठू के प्रति लगाव को “सभी जानते थे”, और उनके दुख की आशंका से पूरा गाँव चिंतित हो उठता है।
  • (ग) आर्थिक विपन्नता — संपत्ति गई ज़रूर, पर लेखक ने साफ लिखा कि पेट की समस्या कभी समस्या नहीं रही। वे मिट्ठू के लिए रेल का टिकट तक खरीदने को तैयार थीं — “टिकट का पैसा भी वह मिट्ठू की खातिर खर्च कर देतीं।”
  • (घ) मिट्ठू के प्रति प्रेम और संवाद — यह दुख का कारण नहीं, दुख की दवा है। हाँ, अंत में उसी दवा का छिन जाना नया दुख बनता है — पर प्रश्न ‘मुख्य कारण’ पूछता है, और मुख्य कारण अकेलापन ही है।
प्र5.
कहानी में मानव-समाज में व्याप्त किस विसंगति को उजागर किया गया है? (क) मजबूरी (ख) कर्मपरायणता (ग) अकेलापन (घ) संवादधर्मिता
उत्तर

सही उत्तर — (ग) अकेलापन

यह उत्तर उपयुक्त क्यों है — ‘विसंगति’ का अर्थ है — जो होना चाहिए और जो वास्तव में है, इन दोनों का बेमेल। कहानी ठीक यही बेमेल दिखाती है: जिस घर में “पूत-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, क्या नहीं था”, उसी घर में अब “ये ही दो प्राणी … उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे।” यह किसी एक ताई की कहानी नहीं — पलायन के बाद गाँव-गाँव में बुजुर्ग इसी तरह छूट गए हैं। इसी अकेलेपन का चरम यह है कि बात करने के लिए एक मनुष्य नहीं, एक पिंजरे का पक्षी बचा है; और शीर्षक ‘संवादहीन’ उसी पर मुहर लगाता है।

बाकी विकल्प क्यों नहीं —
  • (क) मजबूरी — मजबूरी एक स्थिति है, समाज की विसंगति नहीं। बहू-बेटों का शहर जाना मजबूरी हो सकता है, पर कहानी उस पर दोष नहीं मढ़ती; वह उसके परिणाम को उजागर करती है।
  • (ख) कर्मपरायणता — यह तो एक गुण है। गुण को ‘विसंगति’ नहीं कहा जाता।
  • (घ) संवादधर्मिता — यह विकल्प उलटा है। संवादधर्मिता वह मूल्य है जिसका अभाव कहानी दिखाती है — इसीलिए शीर्षक ‘संवादधर्मी’ नहीं, ‘संवादहीन’ है।
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