यहाँ ‘नैया’ कोई असली नाव नहीं, बल्कि ताई का अपना जीवन है — विशेष रूप से उनका बचा हुआ बुढ़ापा। यह रूपक है: जीवन को नदी और उसे पार करने वाले को नाव मान लिया गया है। ‘नैया पार लगना’ मुहावरे का अर्थ है — कठिन समय से सकुशल निकल जाना, जीवन का अंत सुख से होना।
वे यह क्यों कह रही हैं — कहानी की शुरुआत में ही ताई की स्थिति साफ है। बड़े घर का सारा वैभव जा चुका है — “धीरे-धीरे सब पराए हाथों में चला गया।” बहू-बेटे शहर के होकर रह गए, बेटियाँ अपनी गृहस्थी में रम गईं, नौकर-चाकर बिखर गए। बुढ़ापा है, शरीर थका हुआ है, और घर की “भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।” ऐसे में मन में सवाल उठता है — आगे का जीवन किसके सहारे कटेगा? यही चिंता गहरी साँस बनकर निकलती है।