यह अनुभव-आधारित प्रश्न है, इसलिए उत्तर आपका अपना होगा। पर एक अच्छे उत्तर में तीन बातें अवश्य होनी चाहिए — (1) कौन या क्या पीछे छूटा था, (2) चिंता ने शरीर और मन पर क्या असर डाला (मन का बार-बार वहीं लौटना, बेचैनी, नींद न आना), और (3) उस चिंता के पीछे का कारण — चिंता वहीं होती है जहाँ लगाव होता है।
ताई के प्रसंग से जोड़िए: ताई की चिंता उनके व्यवहार में दिखती है — दस बार साँकलें टोहना, मिट्ठू को “कंजूस के धन की तरह छिपाकर रखना” और “जल्दी लौट आने का दिलासा देकर देहरी से पाँव बाहर निकालना।” लेखक ने चिंता को कहा नहीं, क्रियाओं से दिखाया है। आप भी अपने उत्तर में यही कीजिए।
नमूना उत्तर:
पिछली गर्मियों में मुझे दस दिन के लिए मामा के घर जाना पड़ा। घर पर मेरी बीमार दादी और मेरा पिल्ला ‘मोती’ रह गए थे। बस में बैठते ही मन वहीं अटक गया। दिन में तीन-चार बार फोन करता — दादी ने दवा ली या नहीं, मोती ने खाना खाया या नहीं। मामा के घर आम भी थे, खेल भी था, फिर भी किसी काम में मन नहीं लगता था। रात में नींद टूट जाती और लगता कि कहीं दादी को कुछ चाहिए तो कौन देगा। लौटते समय बस जितनी धीमी चलती, उतनी ही बेचैनी बढ़ती जाती। घर पहुँचकर सबसे पहले मैं दादी के कमरे में गया, फिर मोती को गोद में उठाया — तब जाकर साँस में साँस आई।