प्र1.
1. “फिर उसमें लंबी-लंबी रागदारी वाले गायन की भी परंपरा थी।” रागदारी वाले गायन का अर्थ है भारतीय शास्त्रीय संगीत। आपने इस पाठ में संगीत से जुड़े अनेक शब्दों को पढ़ा है। शब्दकोश, इंटरनेट, पुस्तकालय और अपने शिक्षकों की सहायता से इनके अर्थ और उदाहरण खोजकर लिखिए— राग, सुर, बंदिश, अभंग, सोहर, फाग, बधावा
उत्तर
ये सातों शब्द एक ही संसार के हैं, पर दो अलग धाराओं के — पहले तीन शास्त्रीय संगीत के, और बाद के चार लोक संगीत के।
| शब्द | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| राग | स्वरों का वह नियमबद्ध क्रम जिससे एक विशेष भाव जगता है। हर राग के आरोह-अवरोह, वादी-संवादी स्वर और गाने का समय निश्चित होता है। पुस्तक की शब्द-संपदा में — “विशिष्ट ताल-लययुक्त ध्वनि, मन को प्रसन्न करना, प्रीति, अनुराग।” | राग भैरव (प्रातःकाल), राग यमन (संध्या), राग मल्हार (वर्षा), राग जयजयवंती — पाठ के अनुसार पं. दीनानाथ मंगेशकर ने इसी राग का एक रेकॉर्ड बनाया था। |
| सुर | संगीत की मूल ध्वनि, स्वर। सात शुद्ध स्वर हैं — सा, रे, ग, म, प, ध, नि। ‘सुर में होना’ का अर्थ है ठीक ऊँचाई पर आवाज़ लगना। | “जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है” — उस्ताद अली अकबर खाँ। पिताजी “एक राग गाते समय किसी भी सुर को षड्ज बनाकर” राग बदल देते थे। |
| बंदिश | किसी राग में ताल के साथ बँधी हुई रचना — शब्द, स्वर और ताल तीनों का बँधा हुआ रूप। इसी को ‘चीज़’ भी कहते हैं। बंदिश के दो हिस्से होते हैं — स्थायी और अंतरा। | ख्याल गायकी में विलंबित और द्रुत — दो बंदिशें गाई जाती हैं। ‘बंदिश’ शब्द ही बताता है कि रचना किसी बंधन (ताल) में बँधी है। |
| अभंग | महाराष्ट्र का भक्तिगीत — विठोबा (विट्ठल) की स्तुति में मराठी में रचा गया छंद। संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम इसके प्रमुख रचयिता हैं। ‘अभंग’ अर्थात् जो भंग न हो, अखंड। | संत तुकाराम के अभंग। पाठ में ‘संत तुकाराम’ फिल्म का जो गीत आया है — ‘अमी जातो अमचा गावा, अमचा राम-राम ध्यावा’ — वह इसी परंपरा का है। |
| सोहर | बच्चे के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला मंगलगीत। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में स्त्रियाँ इसे समूह में गाती हैं। | जन्माष्टमी और रामनवमी पर ईश्वर के जन्म के कारण भी सोहर गाया जाता है — यह बात पाठ में साक्षात्कारकर्ता ने कही है। |
| फाग | फागुन मास में, विशेषकर होली पर गाया जाने वाला गीत; होली का राग-रंग। ब्रज और बुंदेलखंड में फाग-मंडलियाँ ढोलक-मंजीरे के साथ गाती हैं। इसी का एक भेद धमार है, जो चौदह मात्राओं की धमार ताल में गाया जाता है। | “होली के मौके पर फाग और धमार” — पाठ की पंक्ति। ब्रज का प्रसिद्ध फाग — “होरी खेलन आयो श्याम…” |
| बधावा | मंगलाचार, बधाई का गीत; और बच्चे के जन्म आदि के अवसर पर भेजा जाने वाला उपहार भी। राजस्थान और मालवा में विवाह-जन्म के अवसर पर बधावा गाया जाता है। | “जन्माष्टमी और रामनवमी में ईश्वर के जन्म के कारण सोहर और बधावा आदि गाने का मामला” — पाठ से। |
ध्यान देने की बात: पहले तीन शब्द (राग, सुर, बंदिश) संगीत के व्याकरण के हैं — इन्हें सीखना पड़ता है, गुरु चाहिए। बाद के चार (अभंग, सोहर, फाग, बधावा) अवसर के गीत हैं — इन्हें कोई सिखाता नहीं, ये घर-आँगन में सुनकर आ जाते हैं। पाठ की खूबी यही है कि उसमें दोनों धाराएँ साथ चलती हैं — पिताजी की रागदारी भी है और मंगलागौर के गीत भी।