यहाँ पूरा यात्रा-संस्मरण लिखना है — तालिका नहीं। इसलिए पहले लिखने का ढाँचा, फिर एक पूरा नमूना।
- ‘मैं’ में लिखिए। यह निबंध नहीं, अनुभव है। पूरा पाठ ‘आखिरी चट्टान तक’ भी उत्तम पुरुष में ही है।
- पूरी यात्रा मत लिखिए — एक दिन या एक दृश्य चुनिए। मोहन राकेश ने भी केवल एक शाम, एक रात और एक सुबह ली है।
- वहीं से शुरू कीजिए जहाँ दृश्य शुरू होता है, टिकट और तैयारी से नहीं। पाठ की पहली पंक्ति देखिए — “कन्याकुमारी। सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि।”
- हर दृश्य के साथ एक भाव जोड़िए। केवल ‘क्या दिखा’ नहीं, ‘क्या लगा’ भी।
- वहाँ के लोगों को जगह दीजिए। एक संवाद ज़रूर रखिए — जैसे उस ग्रेजुएट नवयुवक का वाक्य पूरे वृत्तांत को बदल देता है।
- अंत उपदेश से मत कीजिए। एक चित्र या एक छोटी-सी बात पर छोड़ दीजिए — पाठ का अंत भी बसों के टाइम-टेबल पर होता है, किसी सीख पर नहीं।
चोपता में सुबह के छह बजे थे और ठंड ऐसी थी कि साँस भाप बनकर आगे-आगे चल रही थी। देवदार के जंगल में से धूप छनकर आ रही थी और ज़मीन पर सिक्कों जैसे गोल-गोल टुकड़े बना रही थी। पगडंडी पत्थरों की थी, चौड़ी और सीधी ऊपर चढ़ती हुई — जैसे किसी ने पहाड़ के माथे पर एक लकीर खींच दी हो।
पहले किलोमीटर तक मैं दौड़ता-सा चला। दूसरे किलोमीटर में साँस फूलने लगी और मन ने पहली बार कहा — लौट चलो। मैं एक पत्थर पर बैठ गया। तभी एक बुज़ुर्ग महिला पीठ पर घास का बड़ा गट्ठर लादे मेरे पास से निकलीं, बिना रुके, बिना हाँफे। उन्होंने मुझे देखकर हँसकर कहा, “धीरे चलो बेटा, पहाड़ भागता थोड़े ही है।” वह वाक्य पूरे रास्ते मेरे साथ रहा।
उसके बाद मैंने गिनना छोड़ दिया कि कितना बाकी है, और तब चढ़ाई सचमुच आसान हो गई। तीसरे किलोमीटर में पेड़ खत्म हो गए और केवल भूरी घास बची। मुड़कर देखा तो बादल हमसे नीचे रह गए थे — घाटी में सफ़ेद रुई की तरह भरे हुए। उस क्षण मुझे वही लगा जो मोहन राकेश को कन्याकुमारी की चट्टान पर लगा था — कि मैं दृश्य देख नहीं रहा, दृश्य का एक छोटा-सा हिस्सा बन गया हूँ।
तुंगनाथ का मंदिर पत्थरों का, छोटा और बहुत पुराना है। पुजारी जी ने बताया कि सर्दियों में जब बर्फ़ गिरती है तो देवता की डोली नीचे मक्कूमठ ले जाई जाती है और छह महीने मंदिर बंद रहता है। बाहर चाय की एक दुकान थी। दुकान चलाने वाले लड़के ने केतली चढ़ाते हुए कहा, “गर्मी में यहाँ, जाड़े में नीचे मज़दूरी। छह महीने का काम है साहब, पेट तो बारह महीने का है।” उसकी चाय बहुत मीठी थी और बात बहुत कड़वी।
लौटते समय हल्की बूँदाबाँदी शुरू हो गई और पत्थर फिसलने लगे। एक जगह मेरा पैर फिसला भी, पर किनारे की चट्टान हाथ आ गई। घुटने में हल्की खरोंच आई, बस। हम बिना रुके उतरते रहे क्योंकि अँधेरा होने का डर था। ठीक उस समय चोपता पहुँचे जब सामने के पहाड़ की चोटी पर आख़िरी धूप ठहरी हुई थी — पहले सुनहली, फिर गुलाबी, फिर कुछ भी नहीं।
बस अभी तक नहीं आई थी। मैं दुकान की बेंच पर बैठकर घुटने की खरोंच देखता रहा और मन में सोचता रहा कि अगली बस कब आएगी।