यह देखकर लिखने का काम है, याद से लिखने का नहीं। इसलिए पहले देखने का तरीका, फिर तुलना की तालिका, फिर पूरा नमूना उत्तर।
- समय लिखिए। कब आकाश हल्का हुआ, कब सूर्य की पहली किरण दिखी, कब पूरा गोला ऊपर आया — तीनों का समय। यही ब्योरा आपके वर्णन को सच्चा बनाएगा।
- रंगों का क्रम लिखिए, केवल ‘लाल’ मत लिखिए। मोहन राकेश ने सूर्यास्त में यही किया — सोना → लहू → बैंजनी → काला।
- आवाज़ें भी लिखिए। सुबह चिड़ियों, घंटियों और झाड़ू की आवाज़; शाम में लौटते पक्षी, बर्तन और वाहनों की आवाज़।
- अपना मन भी लिखिए। दृश्य के साथ क्या भाव उठा — यही सबसे ज़रूरी है, क्योंकि दृश्य सबको एक-सा दिखता है, भाव सबका अपना होता है।
| बिंदु | सूर्योदय | सूर्यास्त |
|---|---|---|
| रंगों का क्रम | स्याही → धूसर → हल्का गुलाबी → केसरिया → सुनहला → सफ़ेद-चमकीला | सुनहला → केसरिया → लाल (‘लहू’) → बैंजनी → काला |
| गति | अँधेरा धीरे-धीरे खुलता है; उजाला फैलता जाता है | उजाला जल्दी-जल्दी सिमटता है; अँधेरा एकाएक घिर आता है |
| आवाज़ें | बढ़ती हुई — पक्षी, घंटियाँ, दूध वाला, बच्चों की आवाज़ | घटती हुई — लौटते पक्षियों का अंतिम शोर, फिर सन्नाटा |
| हवा और तापमान | ठंडी, नम, हल्की; ओस दिखती है | दिन की गरमी लिए हुए, फिर धीरे-धीरे ठंडी |
| मन का भाव | आरंभ, ताज़गी, उत्साह, आशा | पूर्णता, थकान, शांति और हल्की उदासी |
| पाठ में | “छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी चट्टानों की ओट से सूर्य उदित हो रहा था।” — साथ में मंदिर की घंटियाँ और अर्घ्य | “सूर्य का गोला जैसे एक बेबसी में पानी के लावे में डूबता जा रहा था।” — साथ में स्याही फैलना और झुरमुटों का ‘सिर धुनना’ |
सुबह पाँच बजकर बीस मिनट पर मैं छत पर पहुँचा तो लगा कि जल्दी आ गया हूँ। आकाश अभी काला ही था और पूरब में केवल एक हल्की धुँधली लकीर थी — जैसे किसी ने काले कागज़ पर उँगली से एक रेखा पोंछ दी हो। फिर वह लकीर चौड़ी हुई, धूसर से गुलाबी हुई, और अचानक केसरिया। पीपल के पेड़ पर पहली चिड़िया बोली, फिर दस, फिर इतनी कि गिनती छूट गई। ठीक पाँच बजकर सैंतालीस मिनट पर सूर्य का ऊपरी किनारा दिखा — इतना छोटा-सा कि उसे देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि यही पूरे दिन को जलाएगा। दो मिनट में वह पूरा ऊपर आ गया और उसकी ओर देखना कठिन हो गया। नीचे गली में झाड़ू की आवाज़ आने लगी, किसी घर में लोटा-बाल्टी बजी, और दिन शुरू हो गया।
उसी दिन शाम को मैं फिर उसी छत पर गया। इस बार सब उलटा था। सूर्य पश्चिम में इतना बड़ा और इतना नरम था कि उसे बिना आँख झपकाए देखा जा सकता था। नीचे खेतों पर पहले सोना बिछा, फिर वह सोना गहराकर लाल हो गया। मुझे मोहन राकेश की वह पंक्ति याद आई — “कुछ क्षण पहले जहाँ सोना बह रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा।” सचमुच वैसा ही था। लौटते पक्षियों की कतारें ऊपर से निकलीं और उनका शोर कुछ देर में शांत हो गया। फिर रंग बैंजनी हुआ और फिर सब कुछ स्याही में डूब गया। सूर्योदय में देर लगी थी; सूर्यास्त एक झटके में बीत गया।
दोनों देखकर मुझे एक बात समझ में आई। सूर्योदय देखने पर मन में यह भाव आता है कि आगे बहुत कुछ करना है; सूर्यास्त देखने पर यह कि जो बीत गया, वह लौटेगा नहीं। पहला उत्साह देता है, दूसरा ठहराव। और सबसे बड़ी बात — दोनों एक ही सूरज हैं, बस हमारे खड़े होने की जगह और समय बदल जाता है। शायद इसीलिए पाठ में कन्याकुमारी को ‘सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि’ कहा गया है — वहाँ एक ही स्थान से जीवन के दोनों छोर देखे जा सकते हैं।