चुनौतियाँ हर साथी के लिए अलग होती हैं, इसलिए उन्हें आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग देखना चाहिए। ध्यान दीजिए — अधिकतर कठिनाइयाँ व्यक्ति की नहीं, वातावरण की बनाई हुई होती हैं।
| साथी की आवश्यकता | यात्रा में आने वाली चुनौतियाँ |
|---|---|
| चलने-फिरने में कठिनाई (व्हीलचेयर या बैसाखी) | बस-रेल में ऊँचे पायदान; प्लेटफ़ॉर्म पर लिफ़्ट या रैंप का न होना; होटल के कमरे और शौचालय का सँकरा दरवाज़ा; रेत, चट्टान, सीढ़ीदार घाट और मंदिर की ऊँची सीढ़ियाँ; नाव पर चढ़ना-उतरना। इस पाठ के कन्याकुमारी जैसे स्थल पर तो रेत के टीले और नुकीली चट्टानें ही सबसे बड़ी बाधा बन जाएँगी। |
| दृष्टिबाधित साथी | अनजान जगह में दिशा-बोध का न होना; सूचना-पट्ट केवल देखकर पढ़े जाने वाले होते हैं (ब्रेल या ध्वनि-सूचना नहीं); भीड़ में बिछड़ जाने का डर; असमतल और खुले गड्ढों वाले रास्ते; प्रदर्शनी या स्मारक का ‘सिर्फ़ देखा जा सकने वाला’ होना — छूकर समझने की व्यवस्था न होना। |
| श्रवणबाधित साथी | बस/रेल की उद्घोषणाएँ केवल बोलकर होती हैं; प्लेटफ़ॉर्म बदलने या समय बदलने की सूचना छूट जाती है; गाइड की बात समझ न आना; आपात स्थिति में सायरन सुनाई न देना; सांकेतिक भाषा जानने वाले का न होना। |
| वाणी-संबंधी कठिनाई | टिकट, भोजन या सहायता माँगने में असुविधा; लोगों का धैर्य न रखना और बीच में ही बात काट देना। |
| बौद्धिक अथवा स्वलीनता (ऑटिज़्म) संबंधी आवश्यकता | दिनचर्या के अचानक बदलने से घबराहट; भीड़, तेज़ आवाज़ और चमकती रोशनी से बेचैनी; लंबी प्रतीक्षा; शांत होकर बैठने की जगह का न होना। |
| सभी के लिए साझा चुनौतियाँ | दवाइयों और उपकरणों को समय पर पहुँचाना; भीड़ में अलग होने का डर; लोगों की घूरती नज़रें और अवांछित दया; और सबसे बड़ी बात — पहले से यह जानकारी न मिल पाना कि जिस स्थान पर जा रहे हैं, वहाँ सुगम्यता की कितनी व्यवस्था है। |