गंगा अध्याय 5 मिलकर चलें

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
आपकी कक्षा में कुछ विशेष आवश्यकता वाले साथी भी होंगे जिन्हें अपने दैनिक जीवन में अनेक तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता होगा। 1. ऐसे साथियों को अगर किसी यात्रा पर जाना हो तो उनके समक्ष किस प्रकार की चुनौतियाँ आ सकती हैं?
उत्तर

चुनौतियाँ हर साथी के लिए अलग होती हैं, इसलिए उन्हें आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग देखना चाहिए। ध्यान दीजिए — अधिकतर कठिनाइयाँ व्यक्ति की नहीं, वातावरण की बनाई हुई होती हैं।

साथी की आवश्यकतायात्रा में आने वाली चुनौतियाँ
चलने-फिरने में कठिनाई (व्हीलचेयर या बैसाखी)बस-रेल में ऊँचे पायदान; प्लेटफ़ॉर्म पर लिफ़्ट या रैंप का न होना; होटल के कमरे और शौचालय का सँकरा दरवाज़ा; रेत, चट्टान, सीढ़ीदार घाट और मंदिर की ऊँची सीढ़ियाँ; नाव पर चढ़ना-उतरना। इस पाठ के कन्याकुमारी जैसे स्थल पर तो रेत के टीले और नुकीली चट्टानें ही सबसे बड़ी बाधा बन जाएँगी।
दृष्टिबाधित साथीअनजान जगह में दिशा-बोध का न होना; सूचना-पट्ट केवल देखकर पढ़े जाने वाले होते हैं (ब्रेल या ध्वनि-सूचना नहीं); भीड़ में बिछड़ जाने का डर; असमतल और खुले गड्ढों वाले रास्ते; प्रदर्शनी या स्मारक का ‘सिर्फ़ देखा जा सकने वाला’ होना — छूकर समझने की व्यवस्था न होना।
श्रवणबाधित साथीबस/रेल की उद्घोषणाएँ केवल बोलकर होती हैं; प्लेटफ़ॉर्म बदलने या समय बदलने की सूचना छूट जाती है; गाइड की बात समझ न आना; आपात स्थिति में सायरन सुनाई न देना; सांकेतिक भाषा जानने वाले का न होना।
वाणी-संबंधी कठिनाईटिकट, भोजन या सहायता माँगने में असुविधा; लोगों का धैर्य न रखना और बीच में ही बात काट देना।
बौद्धिक अथवा स्वलीनता (ऑटिज़्म) संबंधी आवश्यकतादिनचर्या के अचानक बदलने से घबराहट; भीड़, तेज़ आवाज़ और चमकती रोशनी से बेचैनी; लंबी प्रतीक्षा; शांत होकर बैठने की जगह का न होना।
सभी के लिए साझा चुनौतियाँदवाइयों और उपकरणों को समय पर पहुँचाना; भीड़ में अलग होने का डर; लोगों की घूरती नज़रें और अवांछित दया; और सबसे बड़ी बात — पहले से यह जानकारी न मिल पाना कि जिस स्थान पर जा रहे हैं, वहाँ सुगम्यता की कितनी व्यवस्था है।
मूल बात: जिस दिन बस में रैंप लग जाता है, उसी दिन ‘चल न पाना’ यात्रा की बाधा नहीं रह जाता। इसलिए समस्या को इस तरह कहना चाहिए — “रास्ता सबके लिए नहीं बना, इसलिए कठिनाई है”, न कि “उन्हें कठिनाई है”।
प्र2.
2. उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कुछ ऐसे सुझाव दीजिए जो उनकी यात्रा को सहज बनाने में उपयोगी हों।
उत्तर

सुझावों को तीन चरणों में बाँटिए — यात्रा से पहले, यात्रा के दौरान, और व्यवहार के स्तर पर

क. यात्रा से पहले (सबसे ज़रूरी चरण)

  • जिस स्थान पर जाना है, वहाँ की सुगम्यता की जाँच पहले कर लीजिए — रैंप, लिफ़्ट, सुलभ शौचालय, बैठने की जगह।
  • रेल-टिकट में दिव्यांगजन की सुविधा वाली सीट/कोच पहले से बुक कीजिए और स्टेशन पर व्हीलचेयर की माँग दर्ज करा दीजिए।
  • जोड़ीदार व्यवस्था (बडी सिस्टम) बनाइए — हर साथी के साथ एक निश्चित सहपाठी, जो पूरे समय साथ रहे।
  • यात्रा-कार्यक्रम की एक प्रति बड़े अक्षरों में तथा चित्र-संकेतों के साथ बनाइए, ताकि हर साथी जान सके कि आगे क्या होगा। दिनचर्या पहले से पता होना घबराहट कम करता है।
  • दवाइयाँ, अतिरिक्त बैटरी, श्रवण-यंत्र, छड़ी की मरम्मत का सामान — सूची बनाकर रखिए।

ख. यात्रा के दौरान

  • दृष्टिबाधित साथी के लिए — रास्ते का बोलकर वर्णन कीजिए (“चार सीढ़ियाँ नीचे, फिर दाएँ मुड़ना है”)। स्मारक की स्पर्श-प्रतिकृति या मॉडल हो तो उसे छूने दीजिए। कोहनी पकड़कर आगे मत खींचिए — अपनी कोहनी थमा दीजिए और उन्हें चलने दीजिए।
  • श्रवणबाधित साथी के लिए — हर सूचना लिखकर या फ़ोन पर टाइप करके दीजिए; बोलते समय मुँह दिखाई देता रहे; समूह में कोई एक सदस्य भारतीय सांकेतिक भाषा के बुनियादी संकेत सीख ले।
  • चलने में कठिनाई वाले साथी के लिए — हर एक-डेढ़ घंटे में विश्राम-ठहराव रखिए; रास्ता ऐसा चुनिए जिसमें सीढ़ियाँ कम हों; व्हीलचेयर के लिए ढलान वाला रास्ता पहले देख लीजिए।
  • स्वलीनता या बौद्धिक आवश्यकता वाले साथी के लिए — भीड़ के समय से बचिए, एक शांत जगह तय रखिए जहाँ बेचैनी होने पर बैठा जा सके, और अचानक कार्यक्रम मत बदलिए।
  • सबके लिए — पहचान-पत्र गले में, उस पर शिक्षक का फ़ोन नंबर; और मिलने का एक निश्चित स्थान तय, ताकि बिछड़ने पर वहीं पहुँचा जा सके।

ग. व्यवहार के स्तर पर (सबसे कम खर्च, सबसे अधिक असर)

  • सहायता करने से पहले पूछिए — “मैं क्या मदद कर सकता हूँ?” बिना पूछे हाथ पकड़ लेना सहायता नहीं, हस्तक्षेप है।
  • बात उन्हीं से कीजिए, उनके साथ आए व्यक्ति से नहीं।
  • व्हीलचेयर, छड़ी या श्रवण-यंत्र उनके निजी स्थान का हिस्सा हैं — बिना अनुमति उन्हें मत छुइए।
  • धैर्य रखिए। जल्दबाज़ी सबसे बड़ी बाधा है।
बड़ा संदर्भ: भारत सरकार का सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign) ठीक यही काम करता है — सार्वजनिक भवनों, परिवहन और वेबसाइटों को सबके लिए उपयोगी बनाना। और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 सुगम्यता को दया नहीं, अधिकार मानता है। यही दृष्टि आपके सुझावों में भी दिखनी चाहिए।
प्र3.
3. अपने द्वारा दिए गए सुझावों पर विद्यालय के विशेष शिक्षा शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए और समझिए कि आपके द्वारा सुझाए गए उपाय कितने प्रभावी हैं तथा उनमें और क्या बदलाव किए जा सकते हैं?
उत्तर

यह क्रियात्मक कार्य है — इसमें आपको अपने सुझावों को जाँच के लिए किसी विशेषज्ञ के सामने रखना है।

कैसे कीजिए:
  1. अपने सारे सुझाव एक कागज़ पर तीन खानों में लिखिए — सुझाव, किस साथी के लिए, क्या चाहिए (लागत/समय/व्यक्ति)
  2. विशेष शिक्षा शिक्षक से समय लेकर मिलिए और हर सुझाव पर तीन प्रश्न पूछिए — क्या यह व्यावहारिक है? क्या यह सम्मानजनक है? इसमें क्या जोड़ा जाए?
  3. उनकी हर टिप्पणी को सुझाव के सामने ही लिख लीजिए — उसे मिटाइए मत। सुधरे हुए सुझाव को नीचे नए रंग से लिखिए।
  4. अंत में एक अंतिम सूची बनाइए और उसे कक्षा के सूचना-पट्ट पर लगाइए।
नमूना उत्तर — हमारी चर्चा में क्या निकला:
हमारा सुझावशिक्षक की टिप्पणीसुधरा हुआ रूप
“दृष्टिबाधित साथी का हाथ पकड़कर चलेंगे।”“उन्हें खींचिए मत। यह सहायता कम, नियंत्रण अधिक लगता है।”अपनी कोहनी आगे कीजिए, वे उसे पकड़ेंगे और आधा कदम पीछे चलेंगे — दिशा वे स्वयं महसूस करेंगे।
“श्रवणबाधित साथी को सब बाद में बता देंगे।”“बाद में बताना छूट जाने जैसा ही है। सूचना उसी समय चाहिए।”समूह के मोबाइल पर एक साझा संदेश-समूह बनाइए; हर उद्घोषणा तुरंत टाइप कर दीजिए।
“व्हीलचेयर वाले साथी को सबसे पीछे रखेंगे ताकि सुविधा रहे।”“सबसे पीछे रखना अलग कर देना है। वे भी समूह के बीच में चलें।”पूरे समूह की चाल धीमी रखिए और मार्ग ऐसा चुनिए जिसमें सीढ़ियाँ न हों; साथी बीच में रहें।
“मंदिर की सीढ़ियों पर उन्हें उठाकर ले जाएँगे।”“उठाना अंतिम उपाय है और असुरक्षित भी। पहले वैकल्पिक रास्ता खोजिए।”पहले से पता कीजिए कि रैंप या लिफ़्ट कहाँ है; न हो तो वहाँ का कार्यक्रम बदल दीजिए, साथी को नहीं।

हमने जो सबसे बड़ी बात सीखी: हमारे अधिकतर सुझाव ‘मदद’ के इरादे से बने थे, पर उनमें से कई निर्णय हमारे हाथ में रख रहे थे। शिक्षक ने कहा — “सहायता वह है जिसमें दूसरा व्यक्ति अपने काम का स्वामी बना रहे।”

प्र4.
4. प्राप्त सुझावों के विषय में कक्षा के विशेष आवश्यकता वाले साथियों से भी चर्चा कीजिए और उनकी राय जानने का प्रयास कीजिए।
उत्तर

यह पूरी गतिविधि का सबसे महत्वपूर्ण चरण है — और अकसर सबसे अधिक छूटने वाला भी। अब तक हमने साथियों के बारे में बात की; अब हमें साथियों से बात करनी है।

कैसे बात कीजिए:
  1. अलग बुलाकर नहीं, सामान्य ढंग से। उन्हें ‘विषय’ मत बनाइए। बातचीत ऐसे शुरू कीजिए — “हम कक्षा-यात्रा की योजना बना रहे हैं, तुम्हें क्या ठीक लगेगा?”
  2. उनकी बात पूरी सुनिए। वाक्य बीच में मत पूरा कीजिए, चाहे बोलने में समय लगे।
  3. वही पूछिए जो वे बदल सकते हैं — कहाँ रुकना है, कितनी देर चलना है, कौन-सी जगह छोड़ी जा सकती है।
  4. ‘न’ को भी स्वीकार कीजिए। हो सकता है वे किसी सुझाव को अनावश्यक या असहज बताएँ — वही सबसे मूल्यवान जानकारी है।
  5. जो तय हो, उसे लिखकर पूरी कक्षा को सुनाइए, ताकि निर्णय साझा हो जाए।
नमूना उत्तर — हमारे साथियों ने क्या कहा:
  • आदित्य (व्हीलचेयर का प्रयोग करते हैं): “मुझे सबसे बुरा तब लगता है जब सब मुझे उठाने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं। मुझे यह चाहिए कि जगह पहले से देख ली जाए। और यह मत सोचिए कि मैं थक जाऊँगा — पूछ लीजिए, मैं बता दूँगा।”
  • रुखसाना (दृष्टिबाधित हैं): “मुझे रास्ते का वर्णन अच्छा लगता है, पर बार-बार ‘सँभलकर, सँभलकर’ कहने से घबराहट होती है। एक बार बता दीजिए कि आगे क्या है — मैं सँभाल लूँगी। और अगर कहीं कोई चीज़ छूकर देखने को मिल जाए, तो वह जगह मुझे सबसे अच्छी लगती है।”
  • नितिन (श्रवणबाधित हैं): “जब सब हँसते हैं और मुझे पता ही नहीं चलता कि किस बात पर — तब सबसे अकेला लगता है। किसी एक साथी का काम यही हो कि वह मुझे साथ-साथ बताता रहे। और गाइड जब बोले, तब कोई मेरे लिए लिख दे।”

इन रायों से हमारी योजना में तीन बदलाव हुए — (1) यात्रा से पहले स्थान की सुगम्यता की जाँच अनिवार्य कर दी गई; (2) हर साथी के लिए एक निश्चित ‘जोड़ीदार’ तय हुआ, जो सूचना और बातचीत दोनों साझा करेगा; (3) कार्यक्रम में एक ऐसा स्थान जोड़ा गया जहाँ चीज़ें छूकर देखी जा सकें (संग्रहालय का स्पर्श-खंड)।

सीखने की बात: जिनके लिए योजना बन रही हो, उनसे पूछे बिना बनी योजना अधूरी रहती है। इसी सोच का सूत्र है — “हमारे बारे में, हमारे बिना कुछ नहीं” (Nothing about us, without us)
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