मूल कारण यह था कि सैंड हिल से सूर्यास्त अधूरा दिखाई देता था। लेखक को अधूरा दृश्य स्वीकार नहीं था — वह सूर्यास्त को पूरे समुद्री विस्तार की पृष्ठभूमि में देखना चाहता था।
लेखक ने स्वयं यह बात लिखी है — “सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के विस्तार को ओट में लिए था। सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके, इसके लिए मैं कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे उस टीले की तरफ चल दिया।” यानी सैंड हिल पर एक ऊँचा टीला अरब सागर की ओर का दृश्य ढके हुए था।
पर इसके पीछे एक दूसरा, गहरा कारण भी है — लेखक का स्वभाव। सैंड हिल पर भीड़ थी : “आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति”, रेशमी कपड़े, बैरों की परोसी हुई कॉफी। उस रंगीन जमघट के बीच लेखक अपने को इस तरह देखता है — “उनसे कुछ दूर पर एक रंगहीन बिंदु, मैं, ज्यादा देर अपनी जगह स्थिर नहीं रह सका।” उसे सूर्यास्त एक सामाजिक आयोजन की तरह नहीं, अकेले की अनुभूति की तरह चाहिए था।