गंगा अध्याय 5 मेरे उत्तर मेरे तर्क

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं? 1. लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य कहाँ से देखा? (क) विवेकानंद चट्टान से (ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से (ग) पच्छिमी क्षितिज से (घ) सैंड हिल से
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: लेखक सूर्यास्त देखने के लिए पहले सैंड हिल पर ही पहुँचा था, पर वहाँ रुका नहीं। कारण उसने स्वयं बताया है — “सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के विस्तार को ओट में लिए था। सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके, इसके लिए मैं कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे उस टीले की तरफ चल दिया।” इसके बाद वह एक के बाद एक कई टीले पार करता है और अंत में जिस टीले पर पहुँचकर “खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया”, उसी पर बैठकर उसने सूर्य को पानी में डूबते देखा — “सूर्य का गोला पानी की सतह से छू गया… धीरे-धीरे वह पूरा डूब गया।” इसलिए सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य उसने अरब सागर की ओर के उसी ऊँचे टीले से देखा।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) विवेकानंद चट्टान सेग़लतविवेकानंद चट्टान पर लेखक अगली सुबह गया था और वहाँ से उसने सूर्योदय देखा — “सूर्योदय। हम आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे।” सूर्यास्त वहाँ से नहीं देखा गया।
(ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले सेसही ✓पाठ में कारण और यात्रा दोनों स्पष्ट लिखे हैं — सैंड हिल से आगे बढ़कर, कई टीले पार करके, जिस ऊँचे टीले पर पूरा खुला विस्तार मिला, वहीं से।
(ग) पच्छिमी क्षितिज सेग़लतपच्छिमी क्षितिज वह दिशा है जिसमें सूर्य डूब रहा था — “पच्छिमी क्षितिज में सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था।” वह देखने का स्थान नहीं, देखी जाने वाली चीज़ है।
(घ) सैंड हिल सेग़लतसैंड हिल पर तो लेखक “कुछ देर रुका रहकर” आगे बढ़ गया, क्योंकि वहाँ से अरब सागर वाला विस्तार ओट में था। जो टोलियाँ वहीं रुक गईं, उन्होंने अधूरा दृश्य देखा; लेखक ने पूरा।
प्र2.
2. “मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ।” यह कथन लेखक की किस मनःस्थिति को दर्शाता है? (क) मौन हो जाना (ख) विस्मित हो जाना (ग) भ्रमित हो जाना (घ) आशंकित होना
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) विस्मित हो जाना

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: यह वाक्य उस क्षण का है जब लेखक तीन समुद्रों के संगम पर खड़ा है और तीनों ओर क्षितिज तक केवल पानी है। उसके ठीक पहले की पंक्ति है — “मैं देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से महसूस कर रहा था — शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति।” और आगे — “तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं हूँ, एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा — बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान।” यह प्रकृति की भव्यता के आगे विस्मय की अवस्था है, जिसमें देखने वाला और दृश्य का भेद ही मिट जाता है। ऐसी ही स्थिति को साहित्य में विस्मय-विमुग्धता कहा जाता है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) मौन हो जानाग़लतमौन तो केवल बाहरी लक्षण है। लेखक चुप ज़रूर है, पर वाक्य उसकी भीतरी दशा बताता है — अपने अलग अस्तित्व का भूल जाना। मौन से इतनी बात नहीं निकलती।
(ख) विस्मित हो जानासही ✓‘शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति’ और ‘दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा’ — दोनों विस्मय की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
(ग) भ्रमित हो जानाग़लतभ्रम का अर्थ है ग़लत समझ लेना या रास्ता भटक जाना। लेखक भ्रमित नहीं है — वह जानता है कि वह कहाँ है; बस उस क्षण अपने ‘मैं’ का भान भूल जाता है। भ्रम में आनंद नहीं होता, यहाँ आनंद है।
(घ) आशंकित होनाग़लतआशंका (डर) इस वाक्य के बाद आती है — “जब अपना होश हुआ, तो देखा कि मेरी चट्टान भी तब तक बढ़ते पानी में काफी घिर गई है। मेरा पूरा शरीर सिहर गया।” यानी डर विस्मय के टूटने पर पैदा हुआ, विस्मय के समय नहीं।
प्र3.
3. “मैंने, सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो।” इस कथन में कौन-सा भाव व्यक्त होता है? (क) करुणा (ख) विनम्रता (ग) आत्मीयता (घ) संतुष्टि
उत्तर

सटीक उत्तर — (घ) संतुष्टि

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: पूरा वाक्य ही ‘संतुष्ट’ शब्द से शुरू होता है — “अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया — ऐसे जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और मैंने, सिर्फ मैंने, उस चोटी को पहली बार सर किया हो।” इससे पहले लेखक ने थकान झेली है — “जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था।” जब श्रम का फल मिल गया — खुला विस्तार सामने आ गया — तब जो भाव जागा, वह परिश्रम के सफल होने की संतुष्टि है। ‘सिर्फ मैंने’ में हल्का-सा गर्व भी है, पर वह गर्व भी संतोष से ही उपजा है, इसलिए मूल भाव संतुष्टि ही है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) करुणाग़लतकरुणा दूसरे के दुःख से उपजती है। यहाँ न कोई दुःखी पात्र है, न दया का प्रसंग।
(ख) विनम्रताग़लत‘सिर्फ मैंने’ पर बल विनम्रता का उलटा है। विनम्र व्यक्ति अपनी उपलब्धि को इस तरह अकेला अपना नहीं कहता।
(ग) आत्मीयताग़लतआत्मीयता किसी व्यक्ति या स्थान से जुड़ाव का भाव है। इस वाक्य में लेखक का संबंध टीले से नहीं, अपने प्रयत्न के परिणाम से है।
(घ) संतुष्टिसही ✓वाक्य का अपना शब्द ‘संतुष्ट होकर’ ही इसे प्रमाणित करता है — कठिन चढ़ाई के बाद लक्ष्य मिलने का संतोष।
ध्यान दीजिए: यहाँ लेखक ने एक अतिशयोक्ति जान-बूझकर रखी है। रेत का एक टीला ‘संसार की सबसे ऊँची चोटी’ नहीं होता। पर उपलब्धि का सुख नाप का मोहताज नहीं होता — यही बात यह अतिशयोक्ति कहती है।
प्र4.
4. “शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” वाक्य में वर्णन है— (क) बलखाती लहरों का (ख) सागर की व्यापकता का (ग) सूर्यास्त के दृश्य का (घ) पच्छिमी क्षितिज का
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) सागर की व्यापकता का

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इस पदबंध के ठीक बाद की पंक्ति स्वयं इसकी व्याख्या कर देती है — “तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी-ही-पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं।” यानी लेखक जिस चीज़ को ‘चेतना से महसूस’ कर रहा है, वह किसी एक लहर या एक क्षण का दृश्य नहीं, बल्कि तीन समुद्रों का असीम फैलाव है। ‘शक्ति का विस्तार’ का अर्थ है — समुद्र की शक्ति दूर-दूर तक फैली हुई है; और ‘विस्तार की शक्ति’ का अर्थ है — यह फैलाव अपने-आप में एक शक्ति है, जो देखने वाले को छोटा कर देती है। दोनों मिलकर व्यापकता का ही बोध कराते हैं।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) बलखाती लहरों काग़लतबलखाती लहरों का वर्णन अलग वाक्य में है — “बलखाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं।” वह एक निकट का, ब्योरेवार दृश्य है; ‘शक्ति का विस्तार’ दूरी और असीमता का बोध है।
(ख) सागर की व्यापकता कासही ✓अगली ही पंक्ति ‘क्षितिज तक पानी-ही-पानी’ और ‘दूसरा छोर है ही नहीं’ कहकर इसे सिद्ध कर देती है।
(ग) सूर्यास्त के दृश्य काग़लतसूर्यास्त का प्रसंग वृत्तांत में बहुत बाद में, दूसरे टीले पर आता है। यह वाक्य तो पहले ही अनुच्छेद में, आखिरी चट्टान को देखते समय आया है।
(घ) पच्छिमी क्षितिज काग़लतयहाँ बात तीनों दिशाओं के क्षितिज की है, केवल पच्छिमी की नहीं — “तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता…”। एक दिशा चुनना पूरे अर्थ को छोटा कर देगा।
शिल्प की बात: ‘शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति’ में वही दो शब्द उलटकर दोहराए गए हैं। इस युक्ति से वाक्य में एक लय और चक्र बन जाता है — जैसे लहर आकर लौटती है और फिर आती है। यही कारण है कि यह पदबंध पूरे वृत्तांत का सूत्रवाक्य बन गया है और पुस्तक ने इसे ‘जीवन-दर्शन’ के खाने में रखा है।
प्र5.
5. लेखक की कन्याकुमारी की यात्रा का वर्णन पढ़कर कहा जा सकता है कि— (क) यह कन्याकुमारी के मौसम को प्रमुखता से वर्णित करता है। (ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है। (ग) यह केवल यात्रा के रोमांच पर केंद्रित है। (घ) इसमें कन्याकुमारी का काल्पनिक वर्णन मिलता है।
उत्तर

सटीक उत्तर — (ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है।

यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इस वृत्तांत में हर बाहरी दृश्य के साथ-साथ लेखक की भीतरी दशा भी दर्ज है — यही ‘जीवंत अनुभूति’ है। तीन उदाहरण देखिए:
  • दृश्य + विस्मय — “तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं हूँ।”
  • दृश्य + उदासी — अपने पैरों के निशान देखकर — “लगा जैसे रेत पहली बार उन निशानों से टूटा हो। इससे मन में एक सिहरन भी हुई, हल्की उदासी भी घिर आई।”
  • दृश्य + भय — “एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई, तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ।”
और अंत में तो अनुभूति यथार्थ से टकराकर विडंबना बन जाती है — “मैं अब भी आँखों से बीच की दूरी नाप रहा था और मन में बसों का टाइम-टेबल दोहरा रहा था। तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी…”। इसलिए यह केवल जगह का विवरण नहीं, अनुभूति का वृत्तांत है।
विकल्पसही / ग़लतकारण
(क) मौसम को प्रमुखता से वर्णित करता है।ग़लतमौसम का अलग से कोई वर्णन नहीं है। हवा, धूप और अँधेरा जहाँ आते भी हैं, वहाँ वे दृश्य का हिस्सा हैं — विषय नहीं।
(ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है।सही ✓हर दृश्य के साथ विस्मय, रोमांच, उदासी, भय या संतोष जुड़ा हुआ है। पुस्तक ने भी इसे ‘आत्मानुभूति व भावनाएँ’ के खाने में रखा है।
(ग) केवल यात्रा के रोमांच पर केंद्रित है।ग़लत‘केवल’ शब्द इसे ग़लत बना देता है। रोमांच है — लहरों से बचकर दौड़ना, चट्टान पर चढ़ना — पर साथ में बेकारी के आँकड़े, मंदिर की घंटियाँ, शंख-मालाएँ बेचती युवतियाँ और अपनी क्षुद्रता का बोध भी है।
(घ) काल्पनिक वर्णन मिलता है।ग़लतवर्णन पूरी तरह वास्तविक है — केप होटल, बाथ टैंक, सैंड हिल, विवेकानंद चट्टान, गवर्नमेंट गेस्ट हाउस, आठ हजार की आबादी, बसों का टाइम-टेबल। कल्पना केवल उपमाओं में है, तथ्यों में नहीं।
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