प्र1.
“अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीप जलाए...” देश के विकास में सभी का सहयोग होता है जो सीमा पर तैनात हैं और जो देश के भीतर हैं, जैसे– अध्यापक, किसान, श्रमिक, कलाकार, वैज्ञानिक, अभियंता आदि। इन सभी के अमूल्य योगदान के लिए कृतज्ञता ज्ञापन तैयार करके लिखिए।
उत्तर
कृतज्ञता ज्ञापन धन्यवाद-पत्र से थोड़ा अलग होता है — इसमें हम किसी एक उपकार का बदला नहीं चुकाते, बल्कि सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करते हैं कि हमारा जीवन दूसरों के श्रम पर टिका है। इसे प्रार्थना-सभा में पढ़ा जा सकता है या विद्यालय की दीवार-पत्रिका पर लगाया जा सकता है।
नमूना उत्तर — कृतज्ञता ज्ञापन
“जिन हाथों से हमारा दिन बनता है”
हम, राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थी, आज यह कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्तुत करते हैं —
हम आभारी हैं उन सैनिकों के, जो हिम से ढकी चोटियों और तपते रेगिस्तानों में रातभर जागते हैं ताकि हम चैन से सो सकें। हम जानते हैं कि हमारी नींद उनकी जागरण की कीमत पर मिलती है। फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों जैसे वीर, जिन्होंने छब्बीस वर्ष की आयु में आकाश में अकेले लड़ते हुए प्राण दे दिए, हमें हर दिन याद हैं।
हम आभारी हैं उन किसानों के, जिनके पसीने से हमारी थाली भरती है। उनके लिए न रविवार होता है, न अवकाश। हम प्रतिज्ञा करते हैं कि अपनी थाली में अन्न का एक दाना भी व्यर्थ नहीं छोड़ेंगे।
हम आभारी हैं उन श्रमिकों के, जिनके हाथों ने वह भवन खड़ा किया जिसमें हम पढ़ते हैं, वह सड़क बनाई जिस पर हम चलते हैं, और वह पुल बाँधा जिससे हमारा गाँव नगर से जुड़ा।
हम आभारी हैं अपने अध्यापकों के, जो हमें अक्षर ही नहीं, दृष्टि देते हैं; और उन सफ़ाईकर्मियों के, जो हमारे उठने से पहले हमारी गली साफ़ कर चुके होते हैं।
हम आभारी हैं चिकित्सकों, नर्सों, आशा और आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के, जिन्होंने महामारी के दिनों में अपने घर से पहले हमारे घर की चिंता की।
हम आभारी हैं वैज्ञानिकों और अभियंताओं के, जिन्होंने हमें टीका, बिजली, रेल और अंतरिक्ष तक पहुँचने का साहस दिया; और उन कलाकारों के, जिन्होंने हमें यह सिखाया कि जीवन केवल जीने का नहीं, सुंदर बनाने का भी नाम है।
और हम आभारी हैं उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के, जिन्होंने “अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए” और उन्हें “घोर अंधकार और भयंकर बवंडरों के झकझोरों में” बुझने नहीं दिया।
इन सबका ऋण हम धन से नहीं चुका सकते। हम इसे केवल आचरण से चुका सकते हैं — अपना काम ईमानदारी से करके, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करके, अपने परिवेश को स्वच्छ रखकर, और अपने देश के विषय में कोई हीन बात बिना जाँचे न कहकर।
क्योंकि जैसा हमारी पाठ्यपुस्तक का निबंध कहता है — “मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।”
— समस्त विद्यार्थी, कक्षा नौ
दिनांक — 15 अगस्त 20××
“जिन हाथों से हमारा दिन बनता है”
हम, राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थी, आज यह कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्तुत करते हैं —
हम आभारी हैं उन सैनिकों के, जो हिम से ढकी चोटियों और तपते रेगिस्तानों में रातभर जागते हैं ताकि हम चैन से सो सकें। हम जानते हैं कि हमारी नींद उनकी जागरण की कीमत पर मिलती है। फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों जैसे वीर, जिन्होंने छब्बीस वर्ष की आयु में आकाश में अकेले लड़ते हुए प्राण दे दिए, हमें हर दिन याद हैं।
हम आभारी हैं उन किसानों के, जिनके पसीने से हमारी थाली भरती है। उनके लिए न रविवार होता है, न अवकाश। हम प्रतिज्ञा करते हैं कि अपनी थाली में अन्न का एक दाना भी व्यर्थ नहीं छोड़ेंगे।
हम आभारी हैं उन श्रमिकों के, जिनके हाथों ने वह भवन खड़ा किया जिसमें हम पढ़ते हैं, वह सड़क बनाई जिस पर हम चलते हैं, और वह पुल बाँधा जिससे हमारा गाँव नगर से जुड़ा।
हम आभारी हैं अपने अध्यापकों के, जो हमें अक्षर ही नहीं, दृष्टि देते हैं; और उन सफ़ाईकर्मियों के, जो हमारे उठने से पहले हमारी गली साफ़ कर चुके होते हैं।
हम आभारी हैं चिकित्सकों, नर्सों, आशा और आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के, जिन्होंने महामारी के दिनों में अपने घर से पहले हमारे घर की चिंता की।
हम आभारी हैं वैज्ञानिकों और अभियंताओं के, जिन्होंने हमें टीका, बिजली, रेल और अंतरिक्ष तक पहुँचने का साहस दिया; और उन कलाकारों के, जिन्होंने हमें यह सिखाया कि जीवन केवल जीने का नहीं, सुंदर बनाने का भी नाम है।
और हम आभारी हैं उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के, जिन्होंने “अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए” और उन्हें “घोर अंधकार और भयंकर बवंडरों के झकझोरों में” बुझने नहीं दिया।
इन सबका ऋण हम धन से नहीं चुका सकते। हम इसे केवल आचरण से चुका सकते हैं — अपना काम ईमानदारी से करके, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करके, अपने परिवेश को स्वच्छ रखकर, और अपने देश के विषय में कोई हीन बात बिना जाँचे न कहकर।
क्योंकि जैसा हमारी पाठ्यपुस्तक का निबंध कहता है — “मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।”
— समस्त विद्यार्थी, कक्षा नौ
दिनांक — 15 अगस्त 20××
कृतज्ञता ज्ञापन लिखने का ढाँचा:
- शीर्षक — छोटा और भावपूर्ण।
- ‘हम आभारी हैं…’ की आवृत्ति — हर वर्ग के लिए एक अनुच्छेद। यही आवृत्ति उसे लय और गरिमा देती है।
- हर वर्ग के साथ एक ठोस चित्र — ‘किसान’ लिखकर मत रुकिए; ‘जिनके लिए न रविवार होता है, न अवकाश’ जोड़िए।
- प्रतिज्ञा — कृतज्ञता तभी पूरी होती है जब उसके साथ कोई संकल्प हो।
- समापन — एक उद्धरण या पंक्ति, और हस्ताक्षर तथा तिथि।