गंगा अध्याय 7 स्वच्छता और आचरण

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“क्या आप कभी केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकते हैं...” निबंध के इस अंश को पुनः पढ़िए। इस प्रकार के और कौन-कौन से आचरण हो सकते हैं जिनसे देश के सौंदर्य को आघात लगता है? इस विषय पर अपने अभिभावकों, सहपाठियों और शिक्षकों के साथ चर्चा कीजिए। (संकेत— ऐतिहासिक या सार्वजनिक स्थानों पर अपना नाम आदि लिखना।)
उत्तर

पहले देख लीजिए कि लेखक ने स्वयं कौन-से आचरण गिनाए हैं — “केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकना, अपने घर का कूड़ा बाहर फेंकना, मुँह से गंदे शब्दों में गंदे भाव प्रकट करना, इधर की उधर, उधर की इधर लगाना, अपना घर-दफ्तर-गली गंदा रखना, होटलों-धर्मशालाओं में, ज़ीनों में, कोनों में पीक थूकना, उत्सवों-मेलों-रेलों और खेलों में ठेलमठेल करना।” ध्यान दीजिए कि इनमें केवल गंदगी नहीं है — गंदी बात और चुगली भी शामिल हैं। यानी लेखक के लिए ‘सौंदर्य’ का अर्थ सफ़ाई से बड़ा है; वह सुरुचि है।

क्षेत्रऔर कौन-से आचरण सौंदर्य-बोध पर आघात करते हैं
ऐतिहासिक स्थलस्मारक की दीवार या स्तंभ पर अपना और मित्र का नाम खोदना/लिखना; मूर्ति या नक्काशी को छूकर घिसना; निषिद्ध स्थान पर चढ़कर सेल्फी लेना; परिसर में प्लास्टिक की बोतलें और खाने के पैकेट छोड़ आना; बिना अनुमति फ़्लैश कैमरा चलाना।
सार्वजनिक स्थानदीवारों पर पोस्टर चिपकाना और चुनाव के बाद न हटाना; बस-रेल की सीट काटना या उस पर लिखना; पार्क के फूल तोड़ना; सार्वजनिक नल खुला छोड़ना; बिजली के खंभे पर तार लटकाना; शौचालय गंदा छोड़ आना।
सड़क और यातायातगाड़ी से बाहर कचरा या थूक फेंकना; बिना कारण हॉर्न बजाना; लाल बत्ती पार करना; गलत जगह वाहन खड़ा करना; सड़क पर मलबा डालना।
उत्सव और आयोजनदेर रात तक तेज़ लाउडस्पीकर; झाँकी-जुलूस के बाद कचरे का ढेर छोड़ जाना; प्लास्टिक के झंडे और सजावट सड़क पर फेंक देना; पटाखों से धुआँ और शोर; नदी-तालाब में पूजा-सामग्री और पॉलिथीन डालना।
प्रकृतिपर्यटन-स्थल और पहाड़ों पर कचरा छोड़ना; पेड़ की छाल पर नाम खोदना; पक्षियों को शोर से भगाना; पालतू या आवारा पशुओं के साथ क्रूरता।
वाणी और व्यवहार (जिसे प्रायः भुला दिया जाता है)गाली-गलौज और अपशब्द; किसी की भाषा, वेशभूषा, कद-रंग या प्रदेश का मज़ाक; चुगली और अफ़वाह — लेखक ने इसे “इधर की उधर, उधर की इधर लगाना” कहा है; अंतरजाल पर बिना जाँचे झूठा संदेश आगे बढ़ाना; कतार तोड़ना; बड़ों और सेवाकर्मियों से रूखा व्यवहार।
ये सब ‘देश के सौंदर्य’ पर आघात क्यों हैं: क्योंकि देश कोई दूर की वस्तु नहीं — वह वही गली, वही स्टेशन, वही स्मारक और वही बातचीत है जिसमें हम रोज़ रहते हैं। लेखक साफ़ कहता है — “आपके द्वारा देश की संस्कृति को गहरी चोट पहुँच रही है।” किसी देश की संस्कृति उसकी किताबों में नहीं, उसके सार्वजनिक व्यवहार में दिखती है।
चर्चा से जो निकला (नमूना): दादाजी ने कहा — “पहले घर की देहरी तक झाड़ू लगती थी, अब घर की सीमा तक। जो गली को अपना नहीं मानता, वह देश को क्या मानेगा?” अध्यापिका जी ने जोड़ा — “कचरा फेंकने वाला यह सोचता है कि कोई देख नहीं रहा। सभ्यता की असली परीक्षा यही है — जब कोई न देख रहा हो।” और मेरे सहपाठी ने सबसे अच्छी बात कही — “हम स्मारक पर नाम इसलिए लिखते हैं कि हम याद रखे जाना चाहते हैं; पर याद तो वे रखे जाते हैं जिन्होंने कुछ बनाया, जिन्होंने कुछ बिगाड़ा वे नहीं।”
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ