शारदा अध्याय 11 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
आभ्यन्तर-प्रयत्नः कः उच्यते ?
उत्तर

उत्तरम् — आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इति उच्यते।

(हिन्दी — मुँह के भीतर करण जिस प्रयत्न से स्थान को छूता है अथवा स्थान के समीप जाता है, वही प्रयत्न ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ कहलाता है।)

यह पुस्तक की अपनी परिभाषा है (पृष्ठ १४६): उत्तर में तीन बातें अवश्य आनी चाहिए — (१) आस्यस्य अभ्यन्तरे (मुँह के भीतर), (२) करणं स्थानं स्पृशति वा समीपं याति (करण की क्रिया), (३) सः प्रयत्नः (वही प्रयत्न है)। तीनों में से कोई एक छूट जाए तो परिभाषा अधूरी रह जाती है — जैसे ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे’ छूट जाए तो बाह्य-प्रयत्न भी इसी में आ जाएगा।
सूत्र-रूप भी जोड़ सकते हैं: पाणिनीय-शिक्षा का सूत्र यही कहता है — ‘स्वस्थाने आभ्यन्तरस्तावत्।’ अर्थात् वर्ण के अपने स्थान की ओर करण का जो प्रयत्न हो, वही आभ्यन्तर है। उत्तर के अन्त में यह सूत्र जोड़ देना उत्तर को और पक्का कर देता है।
प्र2.
ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः कदा भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन स्थाने अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि (य्, र्, ल्, व्) जायन्ते।

(हिन्दी — करण जब स्थान को बहुत थोड़ा ही छूता है, तब ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है; इसी से अन्तःस्थ व्यञ्जन — य, र, ल, व — बनते हैं।)

‘कदा’ का उत्तर ‘यदा… तदा…’ से दीजिए: प्रश्न ‘कब ?’ पूछता है, इसलिए उत्तर का ढाँचा ‘यदा … तदा …’ होना चाहिए — यही पुस्तक की भी शैली है। केवल ‘अन्तःस्थ वर्णों में होता है’ कह देना उत्तर नहीं, क्योंकि प्रश्न परिस्थिति पूछ रहा है, वर्ण-सूची नहीं। सूची उत्तर के दूसरे भाग में जोड़िए।
‘ईषत्’ शब्द पर ध्यान: ‘ईषत्’ का अर्थ ही है ‘थोड़ा’। इसीलिए ‘ईषत्-स्पृष्ट’ = थोड़ा छुआ हुआ, और ‘ईषद्-विवृत’ = थोड़ा खुला हुआ। एक ही उपसर्ग दो अलग प्रयत्नों में लगा है — भ्रम से बचने के लिए दूसरे शब्द (स्पृष्ट या विवृत) पर ध्यान दीजिए।
प्र3.
करणस्य विवृत-प्रयत्नेन के स्वराः उच्चार्यन्ते ?
उत्तर

उत्तरम् — करणस्य विवृत-प्रयत्नेन स्थाने (अ-कारं विहाय) अन्ये सर्वे स्वराः उच्चार्यन्ते। ते एकविंशतिः (२१) स्वराः सन्ति।

(हिन्दी — करण के विवृत-प्रयत्न से ह्रस्व ‘अ’ को छोड़कर शेष सभी स्वर — कुल इक्कीस — बोले जाते हैं।)

भेदःविवृत-प्रयत्नेन उच्चार्यमाणाः स्वराःसङ्ख्या
समानाक्षराणिआ · अ३ · इ · ई · इ३ · उ · ऊ · उ३ · ऋ · ॠ · ऋ३ · ऌ · ऌ३१३
सन्ध्यक्षराणिए · ए३ · ऐ · ऐ३ · ओ · ओ३ · औ · औ३०८
योगःअ-कारं विहाय सर्वे स्वराः२१
आधार (पृष्ठ १४७): ‘करणस्य विवृत-प्रयत्नेन → स्थाने (अ-कारं विहाय अन्ये सर्वे) स्वराः उच्चार्यन्ते।’ और पृष्ठ १५२ की सारणी संख्या भी दे देती है — ‘स्वराः (२१) – विवृत-प्रयत्नः’। ध्यान दीजिए — ‘अ-कारं विहाय’ का अर्थ है केवल ह्रस्व अ; आ और अ३ तो विवृत ही हैं।
‘विहाय’ का प्रयोग: ‘विहाय’ (वि + √हा + ल्यप्) एक पूर्वकालिक क्रिया (ल्यबन्त) है, जिसका अर्थ है ‘छोड़कर’। यह द्वितीया विभक्ति के साथ आती है — इसीलिए ‘अ-कारम्’ (द्वितीया) लिखा गया है, ‘अ-कारः’ नहीं।
प्र4.
आभ्यन्तर-प्रयत्नाः कुत्र दृश्यन्ते ?
उत्तर

उत्तरम् — कण्ठ्य-तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वर्णेषु — स्थान-करणयोः मध्ये — उपर्युक्ताः चतुर्विधाः आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते। पञ्चमः (संवृत-प्रयत्नः) तु केवलं कण्ठ-स्थाने एव दृश्यते।

(हिन्दी — कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य तथा ओष्ठ्य — इन पाँच प्रकार के वर्णों में स्थान और करण के बीच उपर्युक्त चारों आभ्यन्तर-प्रयत्न दिखाई देते हैं; पाँचवाँ — संवृत — केवल कण्ठ में दिखता है।)

आधार (पृष्ठ १४७ की पेटिका):कण्ठ्य-तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वर्णेषु — स्थान-करणयोः मध्ये उपर्युक्ताः चतुर्विधाः आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते।’ ध्यान दीजिए, पुस्तक ने यहाँ ‘चतुर्विधाः’ लिखा है, ‘पञ्चविधाः’ नहीं — क्योंकि यह वाक्य पाँचवें प्रयत्न (संवृत) के वर्णन से पहले आता है। इसीलिए पूरा उत्तर देने के लिए संवृत की सीमा भी अलग से जोड़नी चाहिए।
‘कुत्र’ का उत्तर सप्तमी में: ‘वर्णेषु’, ‘मध्ये’, ‘कण्ठ-स्थाने’ — तीनों सप्तमी विभक्ति में हैं, क्योंकि प्रश्न अधिकरण (कहाँ) पूछ रहा है।
प्र5.
आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्टः स्वरः कः अस्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु ‘अ-कारः’ (ह्रस्वः) विशिष्टः स्वरः अस्ति; यतः अन्येषां सर्वेषां स्वराणाम् उच्चारणे विवृत-प्रयत्नः भवति, किन्तु केवलम् अस्य उच्चारणे कण्ठे संकोचः, अर्थात् ‘संवृत-प्रयत्नः’ भवति।

(हिन्दी — आभ्यन्तर-प्रयत्न की दृष्टि से स्वरों में ह्रस्व ‘अ’ विशिष्ट स्वर है; क्योंकि शेष सभी स्वरों में विवृत-प्रयत्न होता है, पर केवल इसी में कण्ठ सिकुड़ता है — संवृत-प्रयत्न होता है।)

आधार (पृष्ठ १४८): ‘स्वरेषु अ-कारः कश्चिद् विशिष्टः स्वरः अस्ति।’ और आगे — ‘परन्तु, अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) उच्चारणे तु तथा न भवति। अत्र तु कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये संकोचः भवति।’ पाणिनीय-शिक्षा भी इसी को अपवाद-सूत्र में बाँधती है — ‘संवृतस्त्वकारः’ — जहाँ ‘तु’ शब्द ही अपवाद का सूचक है।
उत्तर में ‘यतः’ अवश्य जोड़िए: प्रश्न केवल ‘कौन-सा स्वर’ नहीं पूछ रहा, ‘विशिष्ट स्वर कौन-सा’ पूछ रहा है — अर्थात् विशेषता भी बतानी है। इसलिए ‘अ-कारः’ कहकर रुक जाना अधूरा उत्तर है; ‘यतः तस्य उच्चारणे संवृत-प्रयत्नः भवति’ जोड़ने पर ही उत्तर पूरा होता है।
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