उत्तरम् — करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन स्थाने अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि (य्, र्, ल्, व्) जायन्ते।
(हिन्दी — करण जब स्थान को बहुत थोड़ा ही छूता है, तब ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है; इसी से अन्तःस्थ व्यञ्जन — य, र, ल, व — बनते हैं।)
‘कदा’ का उत्तर ‘यदा… तदा…’ से दीजिए: प्रश्न ‘कब ?’ पूछता है, इसलिए उत्तर का ढाँचा ‘यदा … तदा …’ होना चाहिए — यही पुस्तक की भी शैली है। केवल ‘अन्तःस्थ वर्णों में होता है’ कह देना उत्तर नहीं, क्योंकि प्रश्न परिस्थिति पूछ रहा है, वर्ण-सूची नहीं। सूची उत्तर के दूसरे भाग में जोड़िए।
‘ईषत्’ शब्द पर ध्यान: ‘ईषत्’ का अर्थ ही है ‘थोड़ा’। इसीलिए ‘ईषत्-स्पृष्ट’ = थोड़ा छुआ हुआ, और ‘ईषद्-विवृत’ = थोड़ा खुला हुआ। एक ही उपसर्ग दो अलग प्रयत्नों में लगा है — भ्रम से बचने के लिए दूसरे शब्द (स्पृष्ट या विवृत) पर ध्यान दीजिए।