कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २ के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
यह पाठ कहाँ से शुरू होता है — पाठ का पहला ही वाक्य पिछली कक्षा की ओर इशारा करता है : ‘पूर्वस्यां कक्षायां मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया कथं भवतीति वयं सामान्यतः दृष्टवन्तः।’ वहाँ यह भी देखा था कि आस्य के भीतर वर्ण बनने के लिए तीन तत्त्व चाहिए — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः। पहले दो तत्त्व कक्षा ८ में विस्तार से पढ़े जा चुके; इस पाठ का वाक्य है — ‘अस्मिन् पाठे (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः इत्यस्य विषये विस्तरेण अवगच्छामः।’ इसीलिए यह ‘शिक्षा २ ’ है। आभ्यन्तर-प्रयत्न क्या है — पुस्तक की परिभाषा है — ‘ आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इति उच्यते। ’ अर्थात् करण (जो अङ्ग हिलता है) स्थान (जो अङ्ग स्थिर है) तक कितने ज़ोर से, कितने पास तक जाता है — यही प्रयत्न है। ‘आभ्यन्तर’ इसलिए कि यह सारा प्रयत्न मुँह के भी
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| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी अर्थ | पाठ में कहाँ / किस काम का |
|---|---|---|---|
| प्रयत्नः | उच्चारणे प्रयुज्यमानं बलम् | उच्चारण में लगाया गया ‘बल’ अथवा ‘दबाव’ | पूरे पाठ का मूल शब्द (पृ. १४६) |
| अभ्यन्तरे | अन्तः | अन्दर | ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं…’ (पृ. १४६) |
| आभ्यन्तरम् | अन्तःस्थितम् | अन्दर स्थित | ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ पद का पूर्वांश |
| आभ्यन्तर-प्रयत्नः | अन्तःप्रयत्नः / आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य स्थानं प्रति प्रयुक्तं बलम् | मुँह के भीतर करण का स्थान की ओर लगाया गया ‘बल’ | पाठ का विषय ही (पृ. १४६) |
| स्पृष्टः | स्पर्शः कृतः | स्पर्श किया हुआ | स्पृष्ट-प्रयत्नः → स्पर्श-व्यञ्जनानि |
| ईषत् | अल्पम् | थोड़ा | ईषत्-स्पृष्ट तथा ईषद्-विवृत — दोनों में |
| ईषत्-स्पृष्टः | अल्पं स्पर्शः कृतः | थोड़ा स्पर्श किया हुआ | ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः → अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि |
| विवृतः | उद्घाटितः | खुला हुआ | विवृत-प्रयत्नः → स्वराः |
| विवरः | छिद्रः / अन्तरालः | अन्तराल, छेद | ‘लघुः विवरः’ (ईषद्-विवृत) तथा ‘स्फुटः विवरः’ (विवृत) |
| ईषद्-विवृतः | अल्पम् उद्घाटितः | थोड़ा खुला हुआ | ईषद्-विवृत-प्रयत्नः → ऊष्माणः, अयोगवाहौ |
| संवृतः | अविस्तृतः | सिकुड़ा हुआ | संवृत-प्रयत्नः → केवलम् अ-कारः |
| संकोचः | संकोचनम् | सिकुड़ना | ‘कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये संकोचः भवति’ (पृ. १४८) |
| संकुचितः | संकीर्णः / संकोचं कृतः | सिकुड़ा गया | ‘कण्ठः संकुचितः संकीर्णः वा भवति’ (पृ. १४८) |
अभ्यास
- पाठः
- (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः
- अङ्गुली-मुरली-दृष्टान्तः तथा पाठस्य उपसंहारः
- वर्णमाला
- आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि, पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः च
- वर्णानां भेद-उपभेदानां परस्पर-भिन्नताः
- सर्वं शब्देन भासते
- स्थानानुसारं वर्णाः
- स्वाध्यायान्मा प्रमदः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः