प्र1.
पृष्ठ १५१ का चक्र-चित्र क्या दिखाता है ? उसे शब्दों में समझाइए तथा उसका पूरा विवरण सारणी में लिखिए।
उत्तर
उत्तरम् — इदं चक्रं त्रीणि अपि तत्त्वानि एकस्मिन् एव चित्रे दर्शयति — ऊर्ध्वभागे ‘षट् स्थानानि’, अधोभागे ‘षट् करणानि’, दक्षिणभागे ‘पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः’, वामभागे च ‘वर्णाः’ (स्वराः-व्यञ्जनानि) इति।
चित्र को पढ़ने का ढंग — बीच में मुख का चित्र है। उसके चारों ओर इन्द्रधनुष जैसे छह वृत्त-खण्ड हैं। बाहर से भीतर की ओर जाइए —
- सबसे बाहर की चाप पर छह स्थान लिखे हैं — कण्ठः (१), तालु (२), मूर्धा (३), दन्तः (४), ओष्ठः (५), नासिका (६) — और उनसे बने वर्ण-वर्गों के नाम — कण्ठ्याः, तालव्याः, मूर्धन्याः, दन्त्याः, ओष्ठ्याः, नासिक्याः।
- भीतर की छह पट्टियाँ वर्णों के छह भेद हैं — समानाक्षराणि, सन्ध्यक्षराणि (ये दोनों ‘स्वराः’), तथा स्पर्शाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ (ये चारों ‘व्यञ्जनानि’)।
- दायीं ओर की पाँच पट्टियाँ पाँच आभ्यन्तर-प्रयत्न हैं — संवृत (१), विवृत (२), स्पृष्ट (३), ईषत्-स्पृष्ट (४), ईषद्-विवृत (५)।
- नीचे की अलग चाप पर छह करण हैं — कण्ठः (१), जिह्वा-मध्यः (२), जिह्वा-उपाग्रः (३), जिह्वा-अग्रः (४), ओष्ठः (५), नासिका (६); बीच में ‘जिह्वा — करणम्’ तथा ‘स्वस्थानं — करणम्’ लिखा है।
चक्र का पूरा विवरण सारणी-रूप में —
| स्थानम् | करणम् | समानाक्षर-स्वराः | सन्ध्यक्षर-स्वराः | स्पर्शाः | अन्तःस्थाः | ऊष्माणः | अयोगवाहौ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कण्ठः | कण्ठः (स्वस्थानम्) | अ (संवृतः) · आ · अ३ | ए ए३ · ऐ ऐ३ · ओ ओ३ · औ औ३ | क ख ग घ · ङ | — | ह | अः |
| तालु | जिह्वा-मध्यः | इ · ई · इ३ | ए ए३ · ऐ ऐ३ | च छ ज झ · ञ | य | श | — |
| मूर्धा | जिह्वा-उपाग्रः | ऋ · ॠ · ऋ३ | — | ट ठ ड ढ · ण | र | ष | — |
| दन्तः | जिह्वा-अग्रः | ऌ · ऌ३ | — | त थ द ध · न | ल · व | स | — |
| ओष्ठः | ओष्ठः (स्वस्थानम्) | उ · ऊ · उ३ | ओ ओ३ · औ औ३ | प फ ब भ · म | व | — | — |
| नासिका | नासिका (स्वस्थानम्) | — | — | ङ ञ ण न म | — | — | अं |
दो वर्ण दो पंक्तियों में क्यों दिखते हैं: (१) सन्ध्यक्षर ए, ऐ, ओ, औ द्वि-स्थानी हैं — ए और ऐ कण्ठ्य भी हैं और तालव्य भी (कण्ठतालव्यौ); ओ और औ कण्ठ्य भी हैं और ओष्ठ्य भी (कण्ठौष्ठ्यौ)। इसीलिए वे दोनों पंक्तियों में लिखे हैं। (२) व् दन्त्य भी है और ओष्ठ्य भी — दन्त्योष्ठ्यः। (३) पाँचवें वर्ण (ङ ञ ण न म) अपने वर्ग की पंक्ति में भी हैं और नासिक्य पंक्ति में भी, क्योंकि उनमें वायु नाक से भी निकलती है।
यही चक्र कक्षा ८ में भी था: तब उसमें केवल स्थान और करण की चापें थीं। इस कक्षा के चक्र में तीसरी चाप — पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः — जुड़ गई है। दोनों चित्रों को साथ रखकर देखिए, तो दो कक्षाओं का पूरा पाठ्यक्रम एक नज़र में दिख जाएगा।