शारदा अध्याय 11 आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि, पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः च

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पृष्ठ १५१ का चक्र-चित्र क्या दिखाता है ? उसे शब्दों में समझाइए तथा उसका पूरा विवरण सारणी में लिखिए।
उत्तर

उत्तरम् — इदं चक्रं त्रीणि अपि तत्त्वानि एकस्मिन् एव चित्रे दर्शयति — ऊर्ध्वभागे ‘षट् स्थानानि’, अधोभागे ‘षट् करणानि’, दक्षिणभागे ‘पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः’, वामभागे च ‘वर्णाः’ (स्वराः-व्यञ्जनानि) इति।

चित्र को पढ़ने का ढंग — बीच में मुख का चित्र है। उसके चारों ओर इन्द्रधनुष जैसे छह वृत्त-खण्ड हैं। बाहर से भीतर की ओर जाइए —

  • सबसे बाहर की चाप पर छह स्थान लिखे हैं — कण्ठः (१), तालु (२), मूर्धा (३), दन्तः (४), ओष्ठः (५), नासिका (६) — और उनसे बने वर्ण-वर्गों के नाम — कण्ठ्याः, तालव्याः, मूर्धन्याः, दन्त्याः, ओष्ठ्याः, नासिक्याः।
  • भीतर की छह पट्टियाँ वर्णों के छह भेद हैं — समानाक्षराणि, सन्ध्यक्षराणि (ये दोनों ‘स्वराः’), तथा स्पर्शाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ (ये चारों ‘व्यञ्जनानि’)।
  • दायीं ओर की पाँच पट्टियाँ पाँच आभ्यन्तर-प्रयत्न हैं — संवृत (१), विवृत (२), स्पृष्ट (३), ईषत्-स्पृष्ट (४), ईषद्-विवृत (५)।
  • नीचे की अलग चाप पर छह करण हैं — कण्ठः (१), जिह्वा-मध्यः (२), जिह्वा-उपाग्रः (३), जिह्वा-अग्रः (४), ओष्ठः (५), नासिका (६); बीच में ‘जिह्वा — करणम्’ तथा ‘स्वस्थानं — करणम्’ लिखा है।

चक्र का पूरा विवरण सारणी-रूप में —

स्थानम्करणम्समानाक्षर-स्वराःसन्ध्यक्षर-स्वराःस्पर्शाःअन्तःस्थाःऊष्माणःअयोगवाहौ
कण्ठःकण्ठः (स्वस्थानम्)अ (संवृतः) · आ · अ३ए ए३ · ऐ ऐ३ · ओ ओ३ · औ औ३क ख ग घ · ङअः
तालुजिह्वा-मध्यःइ · ई · इ३ए ए३ · ऐ ऐ३च छ ज झ · ञ
मूर्धाजिह्वा-उपाग्रःऋ · ॠ · ऋ३ट ठ ड ढ · ण
दन्तःजिह्वा-अग्रःऌ · ऌ३त थ द ध · नल · व
ओष्ठःओष्ठः (स्वस्थानम्)उ · ऊ · उ३ओ ओ३ · औ औ३प फ ब भ · म
नासिकानासिका (स्वस्थानम्)ङ ञ ण न मअं
दो वर्ण दो पंक्तियों में क्यों दिखते हैं: (१) सन्ध्यक्षर ए, ऐ, ओ, औ द्वि-स्थानी हैं — ए और ऐ कण्ठ्य भी हैं और तालव्य भी (कण्ठतालव्यौ); ओ और औ कण्ठ्य भी हैं और ओष्ठ्य भी (कण्ठौष्ठ्यौ)। इसीलिए वे दोनों पंक्तियों में लिखे हैं। (२) व् दन्त्य भी है और ओष्ठ्य भी — दन्त्योष्ठ्यः। (३) पाँचवें वर्ण (ङ ञ ण न म) अपने वर्ग की पंक्ति में भी हैं और नासिक्य पंक्ति में भी, क्योंकि उनमें वायु नाक से भी निकलती है।
यही चक्र कक्षा ८ में भी था: तब उसमें केवल स्थान और करण की चापें थीं। इस कक्षा के चक्र में तीसरी चाप — पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः — जुड़ गई है। दोनों चित्रों को साथ रखकर देखिए, तो दो कक्षाओं का पूरा पाठ्यक्रम एक नज़र में दिख जाएगा।
प्र2.
चक्रे ‘षट् करणानि’ इति चापे कानि षट् करणानि क्रमेण लिखितानि सन्ति ? ‘जिह्वा — करणम्’ तथा ‘स्वस्थानं — करणम्’ इति द्वयोः कः भेदः ?
उत्तर

उत्तरम् — षट् करणानि क्रमेण एतानि सन्ति — (१) कण्ठः, (२) जिह्वा-मध्यः, (३) जिह्वा-उपाग्रः, (४) जिह्वा-अग्रः, (५) ओष्ठः, (६) नासिका।

‘जिह्वा — करणम्’ तथा ‘स्वस्थानं — करणम्’ इत्यनयोः भेदः —

करण-प्रकारःकस्मिन् स्थानेकरणम्क्या होता है
जिह्वा — करणम्तालु, मूर्धा, दन्तःजिह्वा-मध्यः, जिह्वा-उपाग्रः, जिह्वा-अग्रःजीभ हिलकर दूसरे अङ्ग (स्थान) तक जाती है
स्वस्थानं — करणम्कण्ठः, ओष्ठः, नासिकाकण्ठः, ओष्ठः, नासिका (स्वयम् एव)जीभ काम नहीं करती; उसी स्थान का एक भाग दूसरे भाग से मिलता है
कण्ठ का उदाहरण सबसे साफ़ है: पुस्तक स्वयं पृष्ठ १४८ पर लिखती है — ‘कण्ठ्य-वर्णानां → स्थानम् अपि कण्ठः (कण्ठस्य पृष्ठ-भागः), करणम् अपि कण्ठः (कण्ठस्य अग्र-भागः)।’ अर्थात् स्थान = पृष्ठ-भाग (जो स्थिर है), करण = अग्र-भाग (जो हिलता है)। यही नियम ओष्ठ में (उत्तरोष्ठ स्थान, अधरोष्ठ करण) और नासिका में लागू होता है। पाणिनीय-शिक्षा इसी को एक सूत्र में कह देती है — ‘शेषाः — स्वस्थानकरणाः’।
याद रखने का सूत्र: जो हिलता है वह करण, जो स्थिर रहता है वह स्थान। ‘प’ बोलिए — नीचे का होंठ ऊपर उठकर ऊपर के होंठ से लगता है; इसलिए अधरोष्ठ करण है और उत्तरोष्ठ स्थान।
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