शारदा अध्याय 11 वर्णानां भेद-उपभेदानां परस्पर-भिन्नताः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘वर्णानां द्वौ मुख्य-भेदौ’ इति सारणीम् आधृत्य स्वरस्य व्यञ्जनस्य च मध्ये तिस्रः भिन्नताः लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — पुस्तकस्य सारणी अनुसारं स्वर-व्यञ्जनयोः तिस्रः भिन्नताः —

क्रमःस्वरःव्यञ्जनम्
१.स्वतन्त्रः वर्णः
उच्चारणार्थम् अन्य-वर्णः न आवश्यकः
परतन्त्रः वर्णः
उच्चारणार्थम् आधार-स्वरः आवश्यकः
२.एकमात्रः / द्विमात्रः / त्रिमात्रः वाअर्धमात्रः नित्यम्
३.स्वराः (२१) – विवृत-प्रयत्नः
अ-कारः (०१) – संवृत-प्रयत्नः
स्पर्शाः (२५) – स्पृष्ट-प्रयत्नः
अन्तःस्थाः (०४) – ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः
ऊष्माणः (०४) तथा अयोगवाहौ (०२) – ईषद्-विवृत-प्रयत्नः

(हिन्दी सारांश —) (१) स्वर स्वतन्त्र है, उसे बोलने के लिए किसी और वर्ण की ज़रूरत नहीं; व्यञ्जन परतन्त्र है, उसे सहारे के लिए आधार-स्वर चाहिए। (२) स्वर एक, दो या तीन मात्रा का हो सकता है; व्यञ्जन सदा आधी मात्रा का ही होता है। (३) स्वर का प्रयत्न विवृत (या ‘अ’ में संवृत) है; व्यञ्जन का प्रयत्न स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट अथवा ईषद्-विवृत है।

तीनों भिन्नताएँ एक-दूसरे से निकली हैं: मूल में प्रयत्न है (पंक्ति ३)। स्वर में मार्ग खुला रहता है, इसलिए ध्वनि चलती रह सकती है — इसीलिए स्वर को खींचकर एक, दो या तीन मात्रा का बनाया जा सकता है (पंक्ति २)। और जो ध्वनि अपने बल पर टिक सकती है, उसे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं — इसीलिए वह स्वतन्त्र है (पंक्ति १)। व्यञ्जन में मार्ग रुकता है, इसलिए ध्वनि टिकती नहीं, इसलिए वह आधी मात्रा का रह जाता है और उसे स्वर का सहारा चाहिए। सारणी को ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर पढ़िए — तर्क तभी खुलता है।
लिखकर देखिए: ‘क्’ अकेला लिखना पड़े तो हलन्त लगाना पड़ता है — क्योंकि वह अकेला बोला ही नहीं जा सकता। ‘क् + अ = क’ होते ही वह पूरा अक्षर बन जाता है। इसी से ‘अर्धमात्रः नित्यम्’ की बात सिद्ध होती है — और इसी से यह भी समझ आता है कि देवनागरी में हर व्यञ्जन में ‘अ’ छिपा क्यों माना जाता है।
प्र2.
‘स्वराणां द्वौ भेदौ’ इति सारणीम् आधृत्य समानाक्षर-स्वरस्य सन्ध्यक्षर-स्वरस्य च मध्ये भिन्नतां लिखत। ‘एक-स्थानी’ तथा ‘द्वि-स्थानी’ इत्यनयोः कः अर्थः ?
उत्तर

उत्तरम् — पुस्तकस्य सारणी अनुसारं —

क्रमःसमानाक्षर-स्वरःसन्ध्यक्षर-स्वरः
१.एक-स्थानीद्वि-स्थानी
२.ह्रस्वः उपभेदः भवति
ह्रस्वः एव प्रथमः उपभेदः
अत्र, ह्रस्व-दीर्घ-प्लुताः — त्रयः उपभेदाः
(‘ऌ-वर्णस्य दीर्घा न सन्ति’)
ह्रस्वः उपभेदः न भवति
दीर्घः एव प्रथमः उपभेदः
अत्र, दीर्घ-प्लुतौ — द्वौ उपभेदौ

‘एक-स्थानी’ तथा ‘द्वि-स्थानी’ —

  • एक-स्थानी = यस्य वर्णस्य एकम् एव उच्चारण-स्थानं भवति। यथा — इ, ई (केवलं तालु); उ, ऊ (केवलम् ओष्ठः); ऋ, ॠ (केवलं मूर्धा)।
  • द्वि-स्थानी = यस्य वर्णस्य द्वे उच्चारण-स्थाने भवतः। यथा — ए, ऐ (कण्ठः + तालु = कण्ठतालव्यौ); ओ, औ (कण्ठः + ओष्ठः = कण्ठौष्ठ्यौ)।
सन्ध्यक्षरम्द्वे स्थानेसन्धि-रूपेणअतः ह्रस्वः क्यों नहीं
ए, ए३कण्ठः + तालुअ + इ = ए (गुणः)दो स्वरों के मिलने से बना है, इसलिए वह जन्म से ही दीर्घ है
ऐ, ऐ३कण्ठः + तालुअ + ए / आ + ऐ = ऐ (वृद्धिः)वही कारण
ओ, ओ३कण्ठः + ओष्ठःअ + उ = ओ (गुणः)वही कारण
औ, औ३कण्ठः + ओष्ठःअ + ओ / आ + औ = औ (वृद्धिः)वही कारण
नाम ही उत्तर दे देता है:सन्ध्यक्षर’ का अर्थ है — सन्धि से बना अक्षर। अ + इ मिलकर ए बना, अ + उ मिलकर ओ बना। दो स्वर मिले हैं, इसलिए दो स्थान भी काम करते हैं और इसीलिए वह ध्वनि छोटी (ह्रस्व) हो ही नहीं सकती — वह पैदा ही दीर्घ होती है। दूसरी ओर ‘समानाक्षर’ का अर्थ है — वह अक्षर जिसका अपना ही एक समान रूप है, किसी मेल से नहीं बना; इसीलिए उसमें ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत — तीनों उपभेद मिलते हैं।
अपवाद याद रखिए: ‘ऌ’ समानाक्षर तो है, पर उसका दीर्घ रूप संस्कृत में प्रयुक्त नहीं होता — ‘ऌ-वर्णस्य दीर्घा न सन्ति’। इसीलिए वर्णमाला-पत्र में ‘ऌ ऌ३’ ही छपा है, बीच में ‘ॡ’ नहीं। अभ्यास ५ (घ) ‘ह्रस्वस्य उपभेदाः न भवन्ति’ इसी सारणी की दूसरी पंक्ति से जुड़ा है।
प्र3.
‘व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः’ इति सारणीम् आधृत्य स्पर्श-अन्तःस्थ-ऊष्म-अयोगवाह-व्यञ्जनानां भिन्नतां लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — पुस्तकस्य सारणी अनुसारं —

क्रमःस्पर्श-व्यञ्जनम्अन्तःस्थ-व्यञ्जनम्ऊष्म-व्यञ्जनम्अयोगवाह-व्यञ्जनम्
१.साधारण-व्यञ्जनम्
आधार-स्वरः — पश्चात् पूर्वं वा, उभयत्र संभवति
विशिष्ट-व्यञ्जनम्
आधार-स्वरः — नित्यं पूर्वमेव
२.स्पृष्ट-प्रयत्नःईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नःईषद्-विवृत-प्रयत्नःईषद्-विवृत-प्रयत्नः

(हिन्दी —) स्पर्श, अन्तःस्थ तथा ऊष्म — ये तीनों साधारण व्यञ्जन हैं; इनका आधार-स्वर आगे भी लग सकता है और पीछे भी (क + अ = क, अ + क् = अक्)। अयोगवाह (अनुस्वार, विसर्ग) विशिष्ट व्यञ्जन हैं; इनका आधार-स्वर सदा पहले ही आता है (अं, अः — कभी ‘ंअ’ नहीं)।

यही अन्तर ‘अयोगवाह’ नाम का कारण है: अनुस्वार और विसर्ग वर्णमाला के किसी वर्ग में ‘योग’ (मेल) नहीं रखते — न स्पर्श हैं, न अन्तःस्थ, न ऊष्म — फिर भी अर्थ को ‘वहन’ करते हैं। इसीलिए ‘अ-योग-वाहौ’। लिखकर देखिए — ‘रामः’ में विसर्ग ‘म’ के बाद है, पर उसका सहारा-स्वर उसके पहले वाला ‘अ’ ही है। ‘संस्कृतम्’ में अनुस्वार का सहारा भी उसके पहले वाला ‘स’ का ‘अ’ है। अन्य व्यञ्जनों की तरह इन्हें आगे स्वर लगाकर पूरा अक्षर नहीं बनाया जा सकता।
प्रयत्न की दृष्टि से तीन ही श्रेणियाँ: ध्यान दीजिए — सारणी में चार भेद हैं, पर प्रयत्न केवल तीन — क्योंकि ऊष्म और अयोगवाह दोनों का प्रयत्न एक ही है (ईषद्-विवृत)। पृष्ठ १५२ की पहली सारणी में इन दोनों को एक ही कोष्ठक में जोड़कर दिखाया गया है।
प्र4.
‘अत्र केवलं शुद्ध-स्वराः (अर्थात् निरनुनासिकाः स्वराः) एव गण्यन्ते, न तु अनुनासिक-स्वराः।’ — अस्याः तारांकित-टिप्पण्याः कः आशयः ?
उत्तर

उत्तरम् — अस्याः टिप्पण्याः आशयः अस्ति — यत्र-यत्र स्वराणां सङ्ख्या (२२ इति, अथवा २१ + ०१ इति) गण्यते, तत्र केवलाः शुद्धाः अर्थात् निरनुनासिकाः स्वराः एव गण्यन्ते; अनुनासिकाः स्वराः पृथक् न गण्यन्ते।

(हिन्दी — जहाँ भी स्वरों की संख्या गिनी गई है, वहाँ केवल शुद्ध यानी निरनुनासिक स्वर गिने गए हैं; अनुनासिक स्वर अलग से नहीं गिने गए।)

प्रकारःअर्थःउदाहरणम्गणनायाम्
शुद्धः / निरनुनासिकः स्वरःयस्य उच्चारणे वायुः केवलं मुखात् निर्गच्छतिअ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औगण्यते — कुल २२
अनुनासिकः स्वरःयस्य उच्चारणे वायुः मुखात् नासिकायाः च — उभाभ्यां निर्गच्छतिअँ, आँ, इँ, ईँ … (चन्द्रबिन्दु-युक्ताः)न गण्यते
यह टिप्पणी क्यों आवश्यक थी: संस्कृत में प्रत्येक स्वर के दो रूप सम्भव हैं — निरनुनासिक और अनुनासिक। यदि दोनों गिने जाएँ तो स्वरों की संख्या दुगुनी हो जाती और सारणी का ‘२१ + ०१’ गलत लगने लगता। इसीलिए पुस्तक ने पन्ने के नीचे तारांकित टिप्पणी देकर गिनती का आधार स्पष्ट कर दिया — गिनती का नियम पहले बता देना ही अच्छी सारणी का लक्षण है
ध्यान दें: ‘अनुनासिक स्वर’ और ‘अनुस्वार’ दो अलग चीज़ें हैं। अनुनासिक स्वयं स्वर है जो नाक से भी बोला जाए (चन्द्रबिन्दु — अँ); अनुस्वार एक अलग वर्ण है जो अयोगवाहों में गिना जाता है (बिन्दु — अं) और जिसका स्थान-करण दोनों नासिका हैं। दोनों को मिलाइए मत।
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