शारदा अध्याय 11 सर्वं शब्देन भासते

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘सर्वं शब्देन भासते’ इति तालिकायां प्रदत्तानां त्रयोदश-पारिभाषिक-शब्दानाम् अर्थान् लिखत तथा प्रत्येकं शब्दं पाठे कुत्र प्रयुक्तः इति अपि दर्शयत।
उत्तर

यह तालिका इस पाठ की पूरी पारिभाषिक शब्दावली एक ही पन्ने पर रख देती है। पुस्तक इसे चार स्तम्भों में देती है — शब्दः · अर्थः (संस्कृतम्) · हिन्दी · English। नीचे वही चारों स्तम्भ ज्यों के त्यों दिए हैं और साथ में एक पाँचवाँ स्तम्भ जोड़ा गया है — वह शब्द पाठ में कहाँ आया

शब्दःअर्थः (संस्कृतम्)हिन्दीEnglishपाठे प्रयोगः
प्रयत्नःउच्चारणे प्रयुज्यमानं बलम्उच्चारण में प्रयुक्त ‘बल’ अथवा ‘दबाव’‘Effort’ in Speech‘सः प्रयत्नः — आभ्यन्तर-प्रयत्नः इति उच्यते’ (पृ. १४६)
अभ्यन्तरेअन्तःअन्दरInside‘आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं…’ (पृ. १४६)
आभ्यन्तरम्अन्तःस्थितम्अन्दर स्थितInternalआभ्यन्तरो बाह्यश्च’ (पृ. १५८)
आभ्यन्तर-प्रयत्नःअन्तःप्रयत्नः / आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य स्थानं प्रति प्रयुक्तं बलम्मस्तक के अन्दर, करण का — स्थान के प्रति प्रयुक्त ‘बल’ अथवा ‘दबाव’‘Internal-Effort’ in Articulation (exerted by the ‘Tool’ – towards the ‘Place’, inside the Head)पाठस्य मुख्यः विषयः (पृ. १४६–१४९)
स्पृष्टःस्पर्शः कृतःस्पर्श किया हुआTouchedस्पृष्ट-प्रयत्नः’ → स्पर्श-व्यञ्जनानि (पृ. १४६)
ईषत्अल्पम्थोड़ाSlightly / Littleईषत्-स्पृष्ट’ तथा ‘ईषद्-विवृत’ — उभयत्र (पृ. १४६–१४७)
ईषत्-स्पृष्टःअल्पं स्पर्शः कृतःथोड़ा स्पर्श किया हुआSlightly Touchedईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ → अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि (पृ. १४६)
विवृतःउद्घाटितःखुला हुआOpenedविवृत-प्रयत्नः’ → स्वराः (पृ. १४७)
विवरःछिद्रः / अन्तरालःअन्तरालOpening / Gap‘लघुः विवरः’ तथा ‘स्फुटः विवरः’ (पृ. १४७)
ईषद्-विवृतःअल्पम् उद्घाटितःथोड़ा खुला हुआSlightly Openedईषद्-विवृत-प्रयत्नः’ → ऊष्माणः, अयोगवाहौ (पृ. १४७)
संवृतःअविस्तृतःसिकुड़ा हुआConstrained / Contractedसंवृत-प्रयत्नः’ → केवलम् अ-कारः (पृ. १४८)
संकोचःसंकोचनम्सिकुड़नाCompress‘कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये संकोचः भवति’ (पृ. १४८)
संकुचितःसंकीर्णः / संकोचं कृतःसिकुड़ा गयाConstricted / Narrow‘कण्ठः संकुचितः संकीर्णः वा भवति’ (पृ. १४८)
शब्दावली स्वयं एक सीढ़ी है: तीन जोड़ियाँ ध्यान से देखिए — स्पृष्टः ↔ ईषत्-स्पृष्टः (छुआ ↔ ज़रा छुआ), विवृतः ↔ ईषद्-विवृतः (खुला ↔ ज़रा खुला), और संवृतः ↔ विवृतः (सिकुड़ा ↔ खुला)। ‘ईषत्’ का अर्थ ही ‘थोड़ा’ है, इसलिए ‘ईषत्’ जुड़ते ही मात्रा आधी रह जाती है। जिसे ये तीन जोड़ियाँ आ गईं, उसे पाँचों प्रयत्न आ गए — शेष केवल उन्हें वर्णों से जोड़ना है।
सन्धि पर ध्यान: ‘ईषत् + स्पृष्टः’ में ‘त्’ ज्यों का त्यों रहा — ईषत्-स्पृष्टः; किन्तु ‘ईषत् + विवृतः’ में ‘त्’ का ‘द्’ हो गया — ईषद्-विवृतः। कारण जश्त्व सन्धि है : वर्ग के प्रथम वर्ण (त्) के बाद मृदु ध्वनि (व्) आने पर वह उसी वर्ग के तृतीय वर्ण (द्) में बदल जाता है। यही नियम ‘तत् + अपि = तदपि’ में भी काम करता है।
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